अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

खतरनाक साजिश के तहत JNU में नफ़रत फ़ैलाने वाले पोस्टर हाल ही फिर से लगाए गए .

दुखद और निराशाजनक घटनाक्रम है यह। आज भी अभिव्यक्ति की आज़ादी का ढोंग करते हुए जेएनयू के गिने चुने छात्र, कश्मीर की आज़ादी के पोस्टर चिपका रहे हैं । सरेआम देश को तोड़ने की धमकी दे रहे हैं। ऐसी धमकी से निश्चय ही हमारी एकता ज्यादा बढती है। पर ज्वलंत सवाल यह है कि ये कैसी शिक्षा है जो आपको राष्ट्रद्रोह करना सिखा रही है? राष्ट्र के प्रति आप में नफरत के बीज बो रही है?

क्या किसी भी राष्ट्र का निर्माण इसके प्रति नफ़रत फ़ैलाने वालों द्वारा, कभी हो सकता है?

एक स्वर में समझदार बोलेंगे नहीं, पर सच यह है कि आज देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में नफरत फैलाने और वातावरण दूषित करने की खतरनाक साज़िश चल रही हैं। अगर इस चिंगारी को समय रहते न रोका गया तो आगे यह भयानक आग बन देश को भस्म करने की हिमाकत करेगी। विपत्ति छोटी हो तभी उसे कुचल देना हितकारी होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देश में तूफ़ानकारी, हुडदंगी चर्चा का दौर जारी है, ऐसी बहसों का अंत प्रायः कड़ुवाहट भरा और देश की मानसिकता विकृत करने वाला ही देखा गया है। ऐसी विकृत परिस्थितियों से पार पाने के सन्दर्भ में मैं यहाँ तीन जरूरी तथ्यों पर गौर करने का आग्रह करता हूँ:-

सिखाने वाली ऐतिहासिक घटनाओं पर एक नज़र डालें और सीख जरूर लेवें :-

एक अरसे पहले हमारे देश में अंग्रेजों ने हमें जीता था। प्रश्न है, क्या असल में उन्होंने ही हमें जीता था? नहीं, उन्होंने नहीं। उनकी तरफ से सैनिक बनकर हमारे भाई, भारतीयों ने हमें हराया था।
जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में निहत्थों पर गोलियां चलवाई, क्या सभी गोलियां अंग्रेजों ने चलाई? नहीं, भारतीयों ने ही भारतीयों पर गोलियां चलाई।

सवाल है, भारतीय सैनिकों ने ऐसा करने से मना क्यों नहीं किया?
इसलिए कि उन्होंने देश का, देशवासी अपने भाइयों का नहीं, केवल अपना स्वार्थ देखा। उन्होंने विवेक, राष्ट्रहित जैसे मूल्यों का मर्म समझा ही नहीं, नतीजा क्या हुआ?
हम भुगत चुके हैं, तो फिर हमारा विवेक ऐसे इतिहास से शिक्षा क्यों नहीं लेता।
विडम्बना है, आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देकर कुछ लोगों, राजनीतिक दलों और तथाकथित स्वयंभू बुद्धिजीवियों द्वारा कुछ भी अनर्गल बेख़ौफ़ बोला या किया जा रहा है, जो राष्ट्र हित में तो कतई नहीं है।

असीम नहीं है अभिव्यक्ति का हमारा अधिकार.

प्रायः हम संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में हमारे मौलिक अधिकारों से जुड़ी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते हैं, लेकिन भूलते हैं कि अनुच्छेद 19 (2) मौलिक अधिकारों पर उचित प्रतिबन्ध भी लगाता है। मौलिक अधिकारों के साथ-साथ यह अनुच्छेद मौलिक कर्तव्यों की भी बात करता है…
संविधान का अनुच्छेद 51 (A) मौलिक कर्तव्य से संबंधित है, इसे पढ़ने का कष्ट कोई नहीं करता.
हमारा संविधान भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का निरंकुश अधिकार किसी को नहीं देता है।
संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में उन तथ्यों का उल्लेख है, जिनके अंतर्गत राज्य, भाषण और अनर्गल अभिव्यक्ति पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
किसी ऐसे भाषण या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है जिससे:

  • देश की सुरक्षा को खतरा हो।
  • विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध आहत हों।
  • देश की शान्ति, कानून व्यवस्था खराब होवे।
  • शालीनता, नैतिकता पर आंच आये।
  • अदालत की अवमानना हो।
  • किसी अपराध के लिए प्रोत्साहन मिले और भारत की एकता अखंडता संप्रभुता को खतरा हो।
  • संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, ताकि विचारों संबंधी चर्चा हो, राष्ट्र व्यक्ति समाज समृद्ध होवे।
आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बस एक घटिया और राजनैतिक प्रचार का हथकंडा बन कर रह गई है।

जवाब दें, अफजल गुरू के समर्थन में नारेबाजी, हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभियान कैसे हो सकता है?
अफज़ल गुरु को सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा दी।
इस पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मुहर लगी, और कांग्रेस के कार्यकाल में फांसी हुई, ऐसे में न्यायपालिका और राष्ट्रपति के आदेश के खिलाफ जाने वाले अफजल के समर्थकों को आतंकवाद के समर्थक नहीं तो और क्या कहा जाए।

भाषण या अभिव्यक्ति की आज़ादी उच्चतम न्यायलय के खिलाफ जाने का अधिकार कहाँ देती है?
JNU में हो रही संविधान की ऐसी अवमानना दु:खद और खतरनाक है।
JNU की ऐसी घटनाओं को जिस तरह राजनैतिक गलियारों और तथाकथित बुद्धिजीवियों का समर्थन मिलता है वह शर्मनाक है।

ऐसे मामलों में विपक्षी और वामपंथी दलों का रवैया भी हतप्रभ करने वाला है।
कमाल तो यह हुआ कि अफज़ल गुरु केस में जेएनयू के विद्यार्थिओं के समर्थन में राहुल गाँधी वहां पहुँच गए और बदनुमा जोश में कह गए कि विद्यार्थियों की आवाज़ नहीं दबाना चाहिए।

न्यायपालिका की अवमानना करने वालों के पक्ष में ऐसा कहना क्या आतंकवाद को बढ़ावा देना नहीं है? ऐसे प्रोत्साहन के चलते ही आज फिर JNUमें नफरत के पोस्टर लग रहे हैं।

सोचें जरूर, दुखद इतिहास अपने को फिर से दोहराए,ऐसा अवसर किसी को न देवें ! सजग, सावधान रहें।

( याद रखें:- राष्ट्र का निर्माण इससे प्रेम करने वालों के कन्धों पर टिका होता है.}

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