आखिर क्यों है यह बौखलाहट ?


आखिर हम जा कहां रहे है? देश की नब्ज़ का हाल बताने वाला थर्मामीटर कहां टिक रहा है? क्या इशारा कर रहा है? समझने की जरूरत है । बेंगलुरू में नववर्ष की बेला में, एक महिला के साथ दो व्यक्तियों ने बदतमीज़ी की इंतेहा कर दी । बचाने वाला कोई नहीं दिखा । देश के सुप्रीमकोर्ट ने एक जनवरी को आदेश जारी किया कि सार्वजनिक चुनाव में जाति, धर्म आदि के नाम पर लाभ लेना वर्जित रहेगा । दूसरे ही दिन एक दल की प्रमुख ने जाति आदि के टैग के साथ उम्मीदवारों का वर्गीकरण घोषित किया। और–और -पश्चिम बंगाल में भाजपा प्रदेश कार्यालय, केंद्रीय मंत्री बाबुल सूप्रियो के आवास, भाजपा के एक कार्यक्रम पर तृणमूल कांग्रेस के निरंकुश गुंडों ने क्रूरता से हमला किया, तोडफोड़ मचाई और आगजनी कर उश्रंखलता की पराकाष्ठा कर दी । और इस तरह अपना आतंकी चेहरा उजागर किया। सवाल है हम क्या चाहते हैं? स्वतंत्रता या उश्रंखलता,स्वानुशासन या अराजकता? इस परिप्रेक्ष्य में पश्चिम बंगाल के घटनाक्रम पर नज़र कराने से खुद को रोक नही पा रहा हूँ ।

नोटबंदी व भ्रष्टाचार उन्मूलन को लेकर पूरादेश जहाँ मोदीजी की नेकनीयत पर विश्वाश के साथ पूरे दिल से उनके साथ खड़ा है; वहीँ ऐसा देखकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की कुंठित बौखलाहट उनके दल के वीभत्स प्रदर्शन के रूप में प्रकट हो रही है।

शायद ईर्ष्या एवं बौखलाहटवश वे खुद को असमंजस के ऐसे चौराहे पर खड़ी पा रही हैं, जहां विवेक शून्य होकर सही-गलत के निर्णय की स्थिती में वे हैं नहीं। अन्दर आग है मोदीजी और केंद्र सरकार के विरोध की; अन्दर भय है, अपने सांसदों के हज़ारों-करोड़ों के भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ होने का भय है। केंद्र सरकार के आगमी बजट में सकारात्मक कल्याणकारी प्रभाव की संभावना का, और इसे लेकर खुद के नीचे की ज़मीन खिसकने का अंदेशा। ऐसे भय के साए में अपना सोचा न हो पाने पर; सनकी और अधीरता के आधीन व्यक्ति अधम हरकतों पर उतर आता है । ऐसा ही पश्चिम बंगाल में भी हो रहा है ।

वहां की मुख्यमंत्री को हजारों करोड़ों के चिटफंड घोटाले के मामले में टी एम सी सांसद सुदीप बन्दोपाध्याय की, सी बी आई द्वारा गिरफ़्तारी हजम नहीं हो रही । यदि हज़ारों करोड़ डकारे गये हैं तब सी बी आई हलक में से निकालने का प्रयास कर रही है, तो मुख्यमंत्रीजी को घबराहट क्यों ? कानून को अपना काम क्यों नहीं करने देना चाहती ?

मुख्यमंत्री कानून का रखवाला होता है, यदि वही कानूनों का मज़ाक बनाये तो आमजन के दुर्भाग्य का अंत कहाँ? बागड़ ही अगर खेत को खाने लग जाये तो खेत का विनाश
तय है।

गीता में कहा गया है:
यद्याचरति श्रेष्ठः, तत्त देवेत्तरो जन:।
सः यत्प्रमाणं कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते ।

(ऊँचे पदासीन लोग जैसे आचरण करते हैं, आम लोग वैसे ही अनुसरण करते हैं।)

जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री विवेक खो रहीं हैं, उनके प्रलापों में केंद्र-सरकार, भाजपा के खिलाफ अनर्गल जहर उगला जा रहा है; तब उनके अनुयायी भाजपा कार्यालय पर, केंद्रीय मंत्री के आवास पर आक्रमण तोड़फोड़ करते हैं।
कार्यक्रम में आगजनी करते हैं, तो ऐसे कुकृत्यो को कोई भी आखिर कैसे न्योयोचित ठहराएगा? आमजन भी नहीं।पश्चिम बंगाल में धींगामुश्ती, गुंडई व अन्याय की पराकाष्ठा हो रही है। इससे आमजन भी भयभीत है।

समझना जरुरी है, कि जिसका स्वयं का व्यक्तित्व बौना है, वह दूसरों को ऊचाई कैसे देगा? जो खुद जोड़-तोड़ करता है, वह सत्य की बात कैसे करेगा! जो अन्याय का जनक है वह न्याय का मार्ग कैसे दिखा सकता है?

ऐसे में यदि पश्चिम बंगाल में आम जनमानस निराश है, तो इसमें अस्वाभाविक क्या है ?
पर भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल ऐसे व्यवधानों से गिरने वाला नहीं। बल्कि मोदीजी की नेक नियत से प्रेरित, उनके अनुयायी भाजपाई सद्कर्म कीं राह पर निडर बढ़ रहे हैं। कारवां बढ़ रहा है। संघर्ष में पीठ दिखाकर पलायनवादी होना मोदीजी व उनके अनुयाइयों की तासीर में है ही नहीं।

पश्चिम बंगाल की आग से भाजपाइयों में संघर्ष की, प्रदेश के सदभावपूर्ण विकास की, जो चिंगारी उठी है, वहां के हर नागरिक के जेहन में वह ज़रूर फैलेगी और तय है भाजपा का परचम वहाँ लहराने से कोई रोक नहीं पाएगा।

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