उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष
उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा
– कैलाश विजयवर्गीय
आज आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है। इस महान भारतीय आत्मा को शत-शत नमन। भारतीय राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। वे राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी तो थे ही, देश की आजादी के संघर्ष में भी उन्होंने जो योगदान दिया। उससे कहीं ज्यादा समर्पण उन्होंने आजाद भारत को एक करने में लगाया। जिस अदम्य उत्साह और असीम शक्ति से उन्होंने नव गणराज्य की शुरूआती समस्याओं का समाधान खोजा, उसी का नतीजा है कि उन्होंने हर भारतीय के दिल में अमिट स्थान बना लिया। उनकी नीतिगत दृढ़ता के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें ‘सरदार’ और ‘लौह पुरुष’ की उपाधि दी थी।
आज उन्हें विशेष रूप से याद करने का कारण ये भी है कि उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद के नजदीक उनकी विशाल प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ का अनावरण करने जा रहे हैं। उनकी 182 मीटर ऊँची ये प्रतिमा भी उसी लौहे की बनी है, जैसे उनके इरादे थे। अनावरण के साथ ही ये दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा में दर्ज हो जाएगी, ठीक सरदार पटेल के इरादों की तरह! यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर बनी है। इसकी आधारशिला 31 अक्तूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138 वीं वर्षगांठ के मौके पर रखी गई थी। तब आज के हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसे मणिकांचन संयोग ही माना जाना चाहिए, कि आज जब ये प्रतिमा अनावृत हो रही है, सरकार पटेल की ही तरह नीतिगत दृढ़ता के धनी नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। इस लौह प्रतिमा के लिए हमारी भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश के किसानों, मजदूरों से लोहा इकट्ठा करने का अभियान चलाया था। प्रतिमा बनाने वाली कंपनी एलएंडटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक एस एन सुब्रमण्यन के मुताबिक ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ जहां राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक है, वहीं यह भारत के इंजीनियरिंग कौशल तथा परियोजना प्रबंधन क्षमताओं का सम्मान भी है।
स्वतंत्रता संग्राम से लगाकर एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिस तरह की भूमिका निभाई, इतिहास के उस कालखंड को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनका जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव प्रेरणा के रूप में देश के सामने है और हमेशा रहेगा। राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का उन्होंने युवावस्था में जो निर्णय लिया था, उस पथ पर वे जीवन पर्यन्त नि:स्वार्थ भाव से चले। आज के युवाओं के लिए उनका जीवन प्रेरणास्पद है।
उनके जीवन का एक प्रसंग जो मैंने कहीं पढ़ा है, मुझे हमेशा स्मरण हो आता है। जिस तरह भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म कौशल को योग रूप में समझाया है। अर्थात अपने दायित्व का पूरी कुशलता, क्षमता के साथ निर्वहन करना चाहिए। सरदार पटेल ने भी इसी आदर्श को आजीवन अपनाया। वे जब वकील के रूप में अपना दायित्व निभा रहे थे, उसमें भी उन्होंने मिसाल कायम की। वे जब एक मामले में न्यायाधीश के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला! जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया, चेहरे पर कोई भाव लाए बिना! पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया। उस टेलीग्राम में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी। यह उनके लौह पुरुष होने का एक उदाहरण है। इस बात का परिचय उनके आजादी के बाद के कार्यों से ही नहीं मिला, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी, जिसका प्रभाव उनके हर कदम में जीवनभर दिखाई दिया।
आजादी के बाद भारतीय रियासतों के विलय की अहम् जिम्मेदारी सरदार पटेल को सौंपी गई थी। उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए छोटी-बड़ी 600 रियासतों का भारत में विलय कराया। देशी रियासतों का विलय आजाद भारत की पहली सबसे बड़ी उपलब्धि थी। निर्विवाद रूप से इसका पूरा श्रेय ही सरदार पटेल को जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे देश की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे। वे जानते थे, कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक संतुलित विकास को कोई खतरा नहीं है। गांव से शहरों की और पलायन भी नहीं होगा। रोजगार के अवसर गांव में ही उपलब्ध होंगे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण भी सरदार पटेल को राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान मिला है। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में संगठन कुशलता, राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट निष्ठा थी। ऐसे महान व्यक्ति को एक बार फिर प्रणाम!

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