*नवरात्रि के 9 दिन और नारी शक्ति की आराधना*

माता दुर्गा को शक्ति का भंडार माना जाता है। यही कारण है कि उनकी पूजा से अनंत ऊर्जा की प्राप्ति होती है। नवरात्रि की पूजक माता दुर्गा के नौ रूप हैं, सभी रूप अपने अंदर शक्ति को समेटे हैं। शक्ति साधना के इस पर्व में 9 देवियों की, तीन महादेवियों की दश महाविद्या की साधना आदि का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि नवरात्रि में माता दुर्गा के 9 शक्ति रूपों की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। भक्ति करने वाले के जीवन में सकारात्मकता संचारित होती है। हिन्दू धर्मग्रंथों और शास्त्रों के मुताबिक शक्ति पूजन के बिना देव पूजा भी अधूरी है। शक्ति की आराधना के बिना तो शिव को भी शव के सदृश समझा गया हैं। इस शक्ति की महत्ता का अहसास इसी एक सच से लग जाता है। शक्ति के बिना तो योग सिद्धि की भी प्राप्ति संभव नहीं। यही कारण कि नवरात्रि में शक्ति स्वरूप माता दुर्गा की पूजा ही शुभ मानी गई है।
कहा जाता है कि समाज में शक्ति की प्रतीक नारी के प्रति संवेदनाओं का विस्तार जरुरी है। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का हम सम्मान करें। परिवार में रहने वाली माता, पत्नी, बेटी, बहन या अन्य रिश्तों में हम शक्ति गुण ढूंढें और उनका सम्मान करें। इसलिए कि नारी में जितनी शक्ति, ऊर्जा, दृढ़ता और समर्पण होता है, उसका पुरुष में सर्वथा अभाव होता है। आज नारी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से ही समाज में स्वयं को स्थापित कर सकी है। शास्त्रों ने इसी मातृशक्ति की आराधना के लिए हमें साल में 9 विशेष दिन दिए हैं। देखा जाए तो वास्तव नौ-दुर्गा के ये दिन नारी शक्ति के सम्मान का उत्सव है। दुर्गा पूजा का ये उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान और शक्ति का स्मरण कराता है, साथ ही समाज के अन्य शक्ति केंद्रों को भी नारी शक्ति के सम्मान के लिए प्रेरित करता है।
शक्ति का आशय ऊर्जा। ऊर्जा को यदि अपने मुताबिक संचालित करना है, तो उस पर आधिपत्य करना जरुरी है। शक्ति को जीतकर उसे हम अपने अधीन कर सकते हैं! लेकिन, यह संभव नहीं था! यही कारण है कि ऊर्जा से कृपा पाने के लिए उसे माता शब्द से उद्धृत किया गया। इसका सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि शक्ति में वात्सल्य का भाव जागा और ऐसी स्थिति में सिर्फ स्तुति से ही माता की कृपा प्राप्त होने लगी। इसलिए वैदिक साहित्य और भारतीय आध्यात्म शक्ति की उपासना प्रायः माता के रूप में की गई है। शक्ति के तामसिक रूपों में हाकिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी आदि की पूजा भी तांत्रिक और साधक माता रूप में ही करते हैं। क्योंकि, माता शब्द से उनकी आक्रामकता में कमी आती है। भक्ति में कोई त्रुटि होने पर भी माता भक्त को पुत्र समझकर क्षमा कर देती है।
बंगाल में नारी-पूजा की परंपरा प्राचीनकाल से प्रचलित है। इसलिए वहां शक्ति की पूजा करने वाले शाक्त संप्रदाय का काफी असर है। दूसरी और वहां वैष्णव संत भी हुए हैं, जो राम और कृष्ण की आराधना में यकीन रखते हैं। पहले इन दोनों संप्रदायों में अकसर विवाद होते थे। लेकिन, धीरे-धीरे शाक्तों और वैष्णव संप्रदाय में सामंजस्य कायम हुआ। सदियों पहले राम को दुर्गा की आराधना करते हुए दिखाने से भी विवाद हुए! लेकिन, समय, काल और परिस्थितियों ने दोनों संप्रदायों के बीच समरसता कायम की। इससे भगवान राम का नायकत्व तो स्थापित हुआ ही, शक्ति रूपा नारी की अहमियत भी बरकरार रही। पिछली पांच शताब्दियों में दुर्गा पूजा और दशहरा न केवल बंगाल बल्कि देश के दूसरे इलाकों का भी महत्वपूर्ण त्यौहार बन चुका है। क्योंकि, शक्ति का पूजन जिस अपरिमित ऊर्जा का संचार करता है, वो कहीं और से प्राप्त नहीं की जा सकती!

Comments

comments