पुरातन को अलविदा कर, नवीन बदलाव का स्वागत करें।


हमारे अन्दर नए उत्साह का संचार करते हुए,नए अंदाज़ में जीवन जीने के सन्देश के साथ आ रहे नववर्ष की सभी विश्वबंधुओं को शुभकामनाएँ। नववर्ष में आप सभी को समृद्धि, मन की शांति एवं आनंद की मनवांछित प्राप्ति होवे।

नववर्ष यानी पुरातन का समापन और नवींन बदलाव का आगमन। नवीन बदलाव हम ही लाते हैं, अतः हम सभी प्रायः नए वर्ष का स्वागत पूरे जोशो खरोश से करते हैं। इस दिन खासकर युवा वर्ग उमंग-उत्साह के सांतवें आसमान पर रमण करता है। इसी के आवेग में बदलाव के लिए अनेक संकल्प किये जाते हैं। पर व्यवहारिक धरातल पर अधिसंख्य जन इन्हें पूरा करने में सफल होते कम ही नज़र आते हैं। जब तक मन, वचन, कर्म से संकल्पों के प्रति एकाग्रता नहीं होगी, तब तक वे प्रामाणिक होंगे नहीं और हम सफल होंगे नहीं

हम धीरे धीरे उन्हें भूलने लगते हैं और तब वे औपचारिकता मात्र बनकर रह जाते हैं। ऐसे में बेहतर होगा हम थोड़ा गहन चिंतन, मनन पर उतरें। यह भी देखें कि 31 दिसम्बर और 1 जनवरी के दिनों को पाश्चात्य संस्कृति की तर्ज पर मनाना केवल धूम धड़ाका और बेतुकी धमाल बन कर ही न रह जाये।

हम उत्सवधर्मी, सहिष्णु, सभी संस्कृतियों का सम्मान करने वाले हैं। तो नववर्ष को उत्साह से ज़रूर मनावें पर दृढ़ संकल्पों के साथ इसे सार्थक बनाने के अपने प्रयासों को भी ढीला न करें।

नववर्ष के इस अवसर पर मैं यहाँ विषयांतर करते हुए थोडा अपनी संस्कृति की ओर भी आपकी नज़र चाहूँगा।

पिछले सप्ताह कनाडा से आये एक विद्वान् का कथन मेरे दिल को छू गया। उन्होंने कहा-भारतीय सभ्यता-संस्कृति इतनी समृद्ध और सार्वभौम है कि विश्वभर को वह सार्थक जीवन शैली सीखा सकती है। इसे तो पाश्चात्य या अन्य संस्कृतियों के अनुकरण की जरूरत ही कहाँ है? और इस कथन से प्रभावित में नववर्ष को लेकर कुछ इस तरह सोचने को विवश हुआ हूँ।

हमारे ऋषि मुनियों और महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन, मास, वर्ष, युगादि का प्रारम्भ हुआ। इसी तिथि को हम गुड़ीपडवा भी कहते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग इस तिथि से हमारी भारतीय संस्कृति में नववर्ष का प्रारंभ होना जानते जरूर हैं, पर विडंबना है कि हम इसे मनाते कम ही हैं। जब कि यह तिथि पृकृति से तालमेल के साथ नववर्ष के इस विचार को सार्थक करती है: “नववर्ष यानी पुरातन का समापन, नए बदलाव का आगमन।”

यह तिथि वसंत के आगमन का समय है, जब वृक्ष -पौधे पुराने पत्ते त्यागते हैं और नए अंकुरित पल्लवित होते हैं। आम बोरा रहे, पलाश खिल रहे, वायु में सुगंध मादकता की ,मस्ती की अनुभूति हो रही है। पक्षियों का कलरव, कोयल की कूक, इन सभी से यह लगता है कि बड़े उत्सव की साजसज्जा है यह सब। तो फिर इस उत्सव में भी सम्मिलित होकर हमें अपनी संस्कृति -सभ्यता की धरोहर के रूप में गुड़ीपडवा के दिन भी नववर्ष का आगमन क्यों नहीं मनाना चाहिए?

ज्ञातव्य यह भी है कि १ जनवरी से नववर्ष मनाने की परिपाटी रोम के तानाशाह जुलियस सीज़र ने ईसा पूर्व ४५ वर्ष में की थी। अब इस सन्दर्भ में आप यह भी अवश्य विचारें कि एक तानाशाह की परिपाटी पर तो हम चल ही रहे हैं, तो फिर अपनी संस्कृति को समृद्ध करने वाली विरासत को भी क्यों न अपनाएं ?

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