युवा और हम समझें माँ बेटी बहन की गरिमा

हाल ही में युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानंद जयंती मनाई गई। उम्मीद है युवा उनके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर अपने आचरण का उन्नयन जरूर करेंगे। स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, गौतम बुद्ध और ऋषि-मुनियों का हमारा यह देश समृद्ध संस्कृति वाला देश है। इसमें यदि हमें, विशेषतः युवाओं को कलंकित करने वाले कोई हादसे सामने आयें तो हमारा अंतःकरण आहत होना स्वाभाविक है।

विगत कुछ दिनों में बंगलुरु, दिल्ली आदि नगरों में नववर्ष पर कुछ महिलाओं, युवतियों के साथ उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली हरकतें हुई और पूरा देश शर्मसार हुआ। ऐसे अनेक, अप्रिय कारनामे निश्चित ही हमें कई मुद्दों पर सोचने, चिंतन करने पर विवश करते हैं।

निस्संदेह हमारा आज का युवा वर्ग प्रेक्टिकल है,सकारात्मक है, आगे बढ़ने की चाहत उसमें है। लेकिन इस चाहत में अंधे होकर उसने गति इतनी तेज कर दी है कि भारतीय संस्कृति पीछे छूटती जा रही लगती है, लुप्त होती सी लग रही है। विभिन्न माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं और संस्कारों की चकाचौंध में अंधा,वह खुद को तो नहीं खो रहा है? यह चिंतन करना भी उसके लिए जरूरी है।

ऐसा तो नहीं, कि कामनाएं इतनी फैला दी हैं कि पवित्र भावनाओं के लिए शायद कोई जगह ही न रही। वे आज़ादी का अर्थ “जीवन के हर मूल्य से आज़ादी” से तो नहीं ले रहे हैं?

संस्कृति की दुहाई देने वाले देश में, युवा अपनी ही संस्कृति का मखौल तो नहीं बना रहा? गलत को मान्यता दे रहा और उचित का तिरस्कार तो नहीं कर रहा?

आधुनिकता का अन्धानुकरण कर भावावेश में गलत दिशा में तो नहीं जा रहा! विदेशी संस्कृति से बुराई तो नहीं ले रहा! इस पर चिंतन और सुधार की गुंजाइश जरूर नज़र आती है

हमारे संस्कार तो बताते हैं कि भौतिकवादी-बौद्धिकता यदि हमारी सामाजिक समरसता, पवित्रता, नैतिकता का मूल्य चुका कर आये तो हम प्रायः इसे स्वीकारते नहीं हैं। अच्छे की प्रशंसा कर हम उसे स्वीकारते हैं, पर बुरे को गुलाबों से ढककर अच्छा कहने का प्रयास हमें प्रिय नहीं।

अब स्वामी विवेकानंद के इस कथन पर भी ध्यान दें- हमारे देश में माँ, बहन,बेटी का जीवन मात्र बाह्य अभिव्यक्ति की वस्तु है ही नहीं। वे तो हमारे आतंरिक,पारिवारिक और सामाजिक जीवन को समृद्ध बनाती हैं। इसका प्रमाण यही है कि आज भी भारतीय महिलाओं के कारण ही त्याग, पवित्रता, दया, संतोष,सेवा आदि गुणों का अस्तित्व देश में प्रभावी है।
वह माँ ही है जो परिवार के जरिये मार्गदर्शन देती है।हमें संस्कार देकर दुनिया में आगे बढ़ने की योग्यता देती है।अपने परिवार में सीखें,अपनी माँ और भारतमाता को शर्मसार करने वाली हरकतें तो न करें।
अंत में यही कहूँगा –

देश की परंपरा आगे ले जाना है तुम्हे, और उज्ज्वल, और प्रखर,
और ज्योतिर्मय बनाकर,कि बाट जोहती हैं अगली पीढियां।

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