लोन माफी का सच


विजय माल्या के बैंक-ऋण संबंधी झूठी खबरें फैलाना एक बार फिर यह सिद्ध कर रहा है कि…
देश-विरोधी ताकतें जनता को भ्रमित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।

इस संबंध में दो मुद्दे अहम् हैं:

पहला- Write Off और Waive Off की बात,
दूसरा- कांग्रेस के शासन काल में माल्या को दिए गए ऋण के समय नियमितताएं-अनियमितताएं।

दोनों को ठोस तथ्यों के साथ देखते हैं:

पहला मुद्दा

(क) माल्या के ऋण को माफ़ या “Waive Off” नहीं किया गया है, उसे बैंकिंग के सामान्य और मान्य व स्थापित दिशा-निर्देशों के तहत ‘Write Off’ किया गया है और वसूली की सारी प्रक्रियाएं यथावत जारी हैं।

(ख) “Write Off” और Waive Off” दो अलग अलग चीज़ें हैं। ब्याज न चुका पाने की स्थिति में ऋण “नॉन परफोर्मिंग एसेट (NPA)” बन जाता है और तब “Write Off” के तहत उसे ऋण खाते से हटा कर AUCA (Advance Under Collection Account) खाते में डाल दिया जाता है। इससे ऋण ख़त्म नहीं हो जाता और वसूली की प्रक्रियाएं जारी रहती हैं जैसे न्यायालय, डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल, सर्फेसी एक्ट, नीलामी, आदि. जबकि Waive Off का अर्थ होता है वसूली की सारी प्रक्रियाओं की सफलता या असफलता के बाद आधिकारिक रूप से उस ऋण का AUCU से drop off कर दिया जाना यानि ऋण का समाप्त मान लिया जाना।

(ग) NPA-ऋण को Write Off कर के ऋण-खाते से अलग करना इसलिए ज़रूरी होता है ताकि
(i) बैंक के बैलेंस शीट में ब्याज भर रहे ऋणों (परफोर्मिंग एसेट) की शुद्ध और सही तस्वीर दिख सके, नहीं तो NPA-ऋण ईमानदारी वाले Non-NPA में मिल जाने के कारण सही आकलन नही हो पाएगा
(ii) “परफोर्मिंग एसेट” के गलत रूप से बढ़ा हुआ दिखने के कारण बैंक अपने ऋण देने की पूरी क्षमता या उसके करीब पहुँच चुका दिखेगा और इसलिए नए ज़रूरतमंदों को ऋण बिलकुल ही या उचित मात्रा में नहीं मिल पाएगा।

स्पष्ट है, माल्या के ऋण माफ़ या Waive Off नहीं किये गए हैं और उनकी वसूली की सारी प्रक्रियाएं यथावत जारी हैं।

दूसरा मुद्दा

कांग्रेस के शासन काल में माल्या को दिए गए ऋण की प्रक्रियाओं की।
बैंकिंग अन्य सभी व्यवसायों की तरह एक “कैल्कुलेटेड रिस्क” का व्यवसाय है और इस सम्बन्ध में माल्या के ऋण पर तीन बिंदु ध्यानाकर्षण योग्य हैं:
(क) क्या माल्या को ऋण देते समय सारे नियमों और ‘ड्यू डिलिजेंस’ का पालन किया गया था?
(ख) ऋण देने के बाद क्या माल्या के प्रोजेक्ट की ‘मोनिटरिंग’ की गई थी?
(ग) क्या वसूली की सारी कोशिशें की जा रही थी?

तो इन पर तथ्य यूं हैं:
(1) 2005 से 2011 तक यानि कांग्रेस के कार्यकाल में सात वर्ष तक लगातार घाटे में रहने के बावजूद किंगफिशर को 17 सरकारी बैंकों ने 7000 करोड का ऋण सैंक्शन किया जिसका कई किश्तों में भुगतान हुआ।
(2) सन 2010 के कांग्रेस के कार्यकाल में ही किंगफिशर के बुरी स्थिति में होने के बावजूद उसके ऋण को “री-स्ट्रक्चर” किया गया।
(3) कांग्रेस के कार्यकाल में ही जनवरी 2011 में NPA हो जाने के बावजूद इसकी आधिकारिक घोषणा एक साल की देरी के बाद जनवरी 2012 में की गई।
(4) कांग्रेस के कार्यकाल में ही 2012 से 2014 के मध्य तक NPA होने के बावजूद वसूली के लगभग कोई कदम नहीं उठाए गए।
(5) मध्य 2014 में आयी एन.डी.ए सरकार के शासन में पहली बार माल्या पर “विल्फुल डिफौल्टर” का टैग लगाया गया (जिसे कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया), उनकी संपत्तियां “अटैच” की गयीं, सीबीआई ने मुकदमा किया, और ईडी ने मणी-लाउन्डरिंग का केस किया।

भारतीय मीडिया के एक बड़े तबके पर आँख मूँद कर भरोसा न करें,
सोशल मीडिया भी अपनी विश्वसनीयता तेजी से खो रहा है, अतः पूर्वाग्रह को छोड़ कर पहले खबरों की पड़ताल आधिकारिक स्त्रोतों से कर लें।

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