शतावधानी प्रधानमंत्री जी – सर्जिकल स्ट्राइक नं . २

एक सज्जन थे रायचंद भाई| महात्मा गांधीजी के सहयोगी और सलाहकार, जिन्हें गांधीजी शतावधानी कहते थे| शतावधानी, यानि वह जो एक साथ सौ बातें सुनकर उन्हें याद रखे, उचित उत्तर दे, सलाह दे और हर मोर्चे पर चोकन्नेपन से एक्शन लेवे.

कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी की एक अरसे बाद हमारे देश को सौभाग्य से शतावधानी प्रधानमंत्री जी मिले हैं| मोर्चा कोई भी हो, सेना, डिजिटलइजेशन, भ्रष्टाचार नियंत्रण, विदेशी साख, आर्थिक ग्रोथ, या काले धन का ही मामला क्यों न हो, हर जगह प्रधानमंत्री जी की प्रभावी उपस्थिति महसूस की जा रही है|

फ़िलहाल 500 और 1000 के नोट बंदकर नए नोट की जो प्रक्रिया जारी है, इस पूरी कवायद को सर्जिकल स्ट्राइक नं 2 कहा जा रहा है| सच है, सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक नं 1 भी देशहित से प्रेरित थी, और नोट में बदलाव की प्रकिया भी एक तीर से कई निशाने साधने वाली स्ट्राइक साबित होगी| ऐसी साहसिक, दूरदर्शी स्ट्राइक के लिये प्रधानमंत्री जी को देश नमन कर रहा है|

एक्सपर्ट भी प्राय: स्वीकार कर रहे हैं कि, आर्थिक क्षेत्र के शुद्धिकरण के लिये उठाए गए उक्त वांछित कदम में प्रधानमंत्री जी का आत्मविश्वास, नैतिक साहस, उनकी दूरदृष्टी और प्रबंधकीय कौशल नजर आता है | यह कदम कालेधन की समस्या के समाधान में सहयोग के अलावा आतंकियों की फंडिंग, बढ़ती महंगाई आदि के नियंत्रण में भी प्रभावी रहेगा।

इस निर्णय से देश की अर्थव्यवस्था के साथ आम लोगों को क्षणिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, पर इस के दूरगामी परिणाम अवश्य सुखद ही होंगे| इस योजना को गहनता से देखें तो आपको प्रधानमंत्रीजी की विगत लम्बे समय से चलने वाली अतिगोपनीय भरी रणनीतिक तैयारी और इसी के साथ शासन पर उनका उपयुक्त नियंत्रण नजर आएगा|

रही बात कुछ प्रतिपक्षियों की, उनकी हताशा दर्शाने वाली निराशाजनक प्रतिक्रियाओं कि, तो इस मामले में उनकी सोच इस तरीके से समझें |

एक हंस समुद्र से आकर एक कुएं की मुंडेर पर बैठा |
कुएं के भीतर से एक मेंढक ने पूछा- भाई कहां से आ रहे हो?
बहुत दूर से – हंस ने कहा|
मेंढक ने कुएं में दो-चार छलांग लगाकर पूछा– इतनी दूर से?
हंस: नहीं, समुद्र पार से|
मेंढक ने कुएं में ही तीन–चार चक्कर लगाए और बोला– इतनी दूर से|
हंस- हंसा, फिर बोला, तुम कुएं में रहकर समुद्र पार का अंदाजा नहीं लगा सकते|
मेंढक झुंझलाकर बोला– ऐसी भी क्या दुरी होगी, झूठ की भी कोई सीमा होती है|

“अब मेंढक को हंस क्या और कैसे समझाए?”

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