शौक़ नहीं मज़बूरी है, स्वच्छता अभियान ज़रूरी है।

मैं अपने कार्य में व्यस्त था, उसी वक्त कुछ मच्छर आए और मेरा खून चूसने लगे।

मेरी प्रतिक्रिया स्वाभाविक सी थी, हाथ उठा और चटाक; एक-दो मच्छर निपट गए!

फिर क्या था… बाकि मच्छरों ने शोर मचा दिया कि “मैं असहिष्णु हूँ!”

मैंने कहा…
इसमें असहिष्णुता कहाँ से आई??
अब तुम खून चूसोगे, तो मैं मारूंगा ही!!

वो रोने लगे, बोले… “खून चूसना हमारी आज़ादी है!”

“आज़ादी” शब्द कहने की देर थी, एक पल में उनके पक्ष में कई बुद्धिजीवी उतर आए और वाद-विवाद करने लगे!

नारेबाजी तक शुरू हो गई…
“कितने मच्छर मारोगे, हर घर से मच्छर निकलेगा”.???

अख़बारों में बुद्धिजीवियों के दिल दहला देने वाले तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख आना शुरू हो गए।
तर्क था कि… मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे, लेकिन ये कहाँ सिद्ध हुआ है कि वो खून चूस रहे थे???

और माना कि अगर थोड़ा चूसा भी था, तो भी इसे गलती मान सकते है, किन्तु यह ‘देहद्रोह’ की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता, क्योंकि ये “मच्छर” काफी प्रगतिशील रहे हैं… कई देहों पर बैठना इनका ‘सरोकार’ रहा है।

मैंने फिर कहा… “कुछ भी हो,
मैं इन्हें अपना खून नहीं चूसने दूंगा!”

तो मुझ पर चढ़ बैठे, बोले…
मुझे “एक्सट्रीम देहप्रेम” है!
मैं तानाशाह हूँ…
कट्टरपंथी हूँ…
बहस से बच रहा हूँ…???

मैं बोला…
तुम्हारा उदारवाद, तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता!

जवाब मिला…
थोड़ा खून चूसने देने से मैं मर थोड़े ही जाता, लेकिन मैंने 2 मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली! उन्हें “फेयर ट्रायल” का मौका तक नहीं दिया!

रहा सहा…
कुछ राजनेता और आ गए
पहली मुलाकात में ही
उन मच्छरों को अपने बगीचे की ‘बहार’ का बेटा बताने लगे।

हैरान-परेशान हो, मैंने पूछ लिया…
“ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाएगा, और मलेरिया से तुरंत न सही बाद में बीमारी और कमज़ोरी से मौत तक हो जाती है!

इस पर जवाब ये…
“तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं, तभी तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर खुद के ‘फासीवादी’ फैसले को ठीक ठहरा रहे हो।”

मैंने बताना चाहा कि…
“मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है, यह साइंटिफिक तथ्य है, मैंने पहले अतीत में भी ये झेल़ा है।”

उन्हें या तो साइंटिफिक शब्द समझ नहीं आया, या फिर उन्होंने उसे इग्नोर करना बेहतर समझा।

वो तथ्य को दरकिनार कर बोले…
“तुम मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा के लिए इतिहास को बहाना बना रहे हो, तुम्हे वर्तमान में जीना चाहिए।”

पूरे हंगामे के शोर के बीच…
उन्होंने माहौल बिगाड़ने के आरोप का ठीकरा भी मेरे सर पर फोड़ दिया।

अब मेरे ही कान में घुसकर…
मेरे ही ख़िलाफ़…
सारे मच्छर बेख़ौफ़ हो भिन्नाने लगे…
“लेके रहेंगे आज़ादी… लेके रहेंगे आजादी… खून चूसने की आज़ादी”।

जितना मैं खून चूसे जाने पर परेशान हुआ था, उससे कई गुना ज़्यादा मैं इस निरर्थक विवाद से परेशान हो चुका था।

आख़िर मुझे याद आए…तुलसी बाबा “सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती…”

मैंने काला हिट उठाया…
ओटले से छत तक,
बाग़ से नाली तक…
उनके हर सीक्रेट अड्डे पर दे मारा.!!!
एक तेज भिन्न-भिन्न हुई…
फिर सब शांत।

तब से…
न कोई बहस न कोई विवाद,
न कोई आज़ादी, न कोई बर्बादी,
न कोई क्रांति, न कोई सरोकार!
अब सब कुछ बिलकुल ठीक है।

अर्थ यह है कि स्वस्थ देह के लिए “स्वच्छता अभियान” बहुत ज़रुरी है।

समझ रहे हो ना।

( यह मुझे मेरे एक पत्रकार मित्र प्रतीक श्रीवास्तव ने भेजी हैं )

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