टीका टिप्पणी के बजाय समाधान में सहयोग करे पूरा देश

Kailash Vijayvargiya


रविवार को उरी में, हुए पाक-आतंकी हमले में 18 भारतीय जवान शहीद हो गये, जिसका अत्यंत दुःखद है। मैं सह्रदय सभी शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। मैं उनके परिवारों के प्रति संवेदना अभिव्यक्त करते हुए उनके बुलंद हौसले और उनके बच्चों के बहादुरी पूर्ण जज्बे को तहेदिल से नमन करता हूँ।

इस दुःखद घटना से सम्पूर्ण देश को आघात पहुँचा है। एक सर्वे के मुताबिक करीब 60 फीसदी देशवासी पाक-आतंकवाद से निपटने में सेना का इस्तेमाल करना चाहते हैं। इनका उत्साहपूर्ण सुझाव सर-आँखों पर, इस मामले में हम, हमारे देश की सरकार और माननीय प्रधानमंत्री जी की बहुआयामी सक्रियता को देख रहें हैं।

जैसे आहत शेर पूरी क्षमता से प्रत्याक्रमण करता है, वैसा ही कुछ अब होना तय है। जैसे शेर अपने शिकार पर ध्यान केन्द्रित कर, पहले उसे अलग-थलग करता है, फिर आकस्मात हमला करता है। देश की सरकार भी ठीक ऐसी ही रणनीति अपनाती नज़र आ रही है। अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर कूटनीति से पाक को अलग-थलग करना, उसके पश्चात सेना को उचित अवसर पर आक्रमण की स्वतंत्रता देना।

भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ श्री नरेश चंद्राजी जैसे अनुभवियों ने भी ऐसी नीति का पक्ष लिया है। उनका भी मानना है कि, ऐसी समस्याओं को बिना सोचे समझे जल्दबाजी में निपटने हेतु कूद पड़ना बुद्धिमानी नहीं होगी। आवेश में लिए गये, ऐसे निर्णयों में प्रायः सफलता संदिग्ध होती है।

इधर हमारे सैन्य अभियान के महानिदेशक ने सेना का इरादा स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने दृढ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा कि आतंकी हमले का जवाब अब सेना जरुर देगी। इसके स्थान और समय का फैसला भी सेना स्वयं लेगी। ऐसे में हमसे अपेक्षा है कि, हम हमारी सेना व सरकार के इरादों पर धैर्यपूर्वक विश्वास अवश्य करें।

यह राष्ट्रहित व राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी समस्या है। अतः हमारे प्रधानमंत्री जी ने इस संदर्भ में सर्वमत से पुख्ता निर्णय लेने हेतु सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, यह लोकतंत्र के अनुकूल भी है।

स्वामी विवेकानंद ने भी “संघे शक्ति: कलयुगे” (कलियुग में संघटन में ही शक्ति है) का सिद्धांत वाक्य स्वीकारा था।

लेकिन उन्होंने इस सिद्धांत के प्रति भारतियों की बेरुखी भी बताई थी। उनका कथन था, “हम समाज व देशहित के लिए संगठित और अनुशासित कार्य करने के बजाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता व हित के कार्य में रुचि लेते हैं। हम झूठे आत्माभिमान की दुहाई देकर संगठित-अनुशासित कार्य का तिरस्कार करते हैं।”

ऐसे में स्वामी जी का आग्रह था, कि हमें देशहित में संगठित और अनुशासित कार्य करने की प्रवृति, भारतीयों के खून में लाना चाहिए, जिसका अभाव उन्होंने बताया था। शायद यह सही भी है। देश के समक्ष खड़ी वर्तमान पाक-आतंकी समस्या के संदर्भ में, जनता को और खासकर सभी राजनैतिक दलों को मिलजुल कर आगे की रणनीति बनाना चाहिए। एकजुट होकर समरसता से उसे अंजाम तक पहुँचाना उपयुक्त होगा। जैसे एक बड़ी मशीन के सभी पुर्जे समरसता से कार्य करते हैं, तभी सोचा गया फल मिलता है। अगर एक छोटा सा पुर्जा भी अकड़ जाए तो मशीन सुचारू रूप से नहीं चलती।

उम्मीद है पूरा देश इस समस्या के समाधान में सहयोग करेगा, बजाय एक दूसरे पर टीका टिप्पणी कर ऊर्जा का अपव्यय करने के।

जय हिन्द!
भारत माता की जय।

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