Author Archives: Kailash Vijayvargiya

पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल इन दिनों राजनीतिक हत्याओं का गढ़ बन गया है। देश के किसी राज्य में राजनीतिक हत्याओं पर यदि अचंभा नहीं होता, तो वो पश्चिम बंगाल ही है। यहाँ राजनीतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे ख़ास तौर पर तीन कारण माने जा रहे हैं। ये हैं बेरोज़गारी, कानून व्यवस्था का ध्वस्त होना और भाजपा की जड़ों का मजबूत होना। अब यहाँ भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। ये साफ़-साफ़ बदले की राजनीतिक कार्रवाई संकेत है। इस राज्य में बरसों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याएं होती रही है। जब कांग्रेस का राज था तब भी, जब वामपंथी सरकार आई तब भी और फिलहाल जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार है तब भी यहाँ कुछ नहीं बदला। अब यहाँ भाजपा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की जा रही है। अभी तक जिस भी पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, वे खामोश क्यों रहे, उन्होंने विरोध का साहस क्यों नहीं किया? ये बहस का अलग मुद्दा हो सकता है! लेकिन, भारतीय जनता पार्टी अन्य पार्टियों की तरह कायरता नहीं दिखाएगी! हम अपने कार्यकर्ताओं पर होने वाले हर हमले का आगे बढ़कर विरोध करेंगे। हमारे कार्यकर्ताओं पर अब यदि हमले होते हैं या उनकी हत्या जैसी नृशंसता होती है, तो हम सड़क पर उतरेंगे! इसका नजारा हमने दिखा भी दिया। फिलहाल पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा और उत्पीड़न चरम पर हैऔर हम पूरी ताकत से इसका विरोध करेंगे।
यहाँ का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वामपंथियों के राज में हुई हिंसा से घबराकर ही यहाँ की जनता ने तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को सत्ता की चाभी सौंपी थी। लेकिन, इसके बाद भी राज्य में कानून व्यवस्था नहीं सुधरी! क्योंकि, सारे हुड़दंगी वामपंथी कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए! आश्चर्य नहीं कि वे उसी तरीके से काम करेंगे, जो वे करते रहे हैं। मतलब यह कि राज्य में बेलगाम राजनीतिक हिंसा का दौर अभी थमा नहीं है! राजनीतिक हत्याएं मुख्य रूप से लोकतंत्र और कानून के खिलाफ सत्ता की मनमानी का हथियार है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को बड़े और कड़े कदम उठाना थे, पर ऐसा नहीं किया जा रहा। दरअसल, राजनीतिक हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान राज्य के शासन ढांचे में संपूर्ण बदलाव से ही संभव है। स्पष्टतः ये पश्चिम बंगाल संवैधानिक मशीनरी के असफल होने का संकेत है। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा की घटनाओं से राज्य के हालातों को समझा गया था। अभी भी ये सिलसिला थमा नहीं है। अब तो ये राजनीतिक हिंसा स्कूलों तक पहुँच गई। देश में ऐसा कभी हुआ नहीं था, पर इस राज्य में हो रहा है। लेकिन, ये हिंसात्मक राजनीति अब सहन नहीं होगी। यहाँ के युवा जाग गए हैं, वे अच्छी तरह समझ गए कि अब इस सरकार को उखाड़ फैंकने का वक़्त आ गया है! … और इंतजार नहीं!

इस राज्य में जल्दी ही

‘दो पत्ती’ मुरझाएगी और भाजपा का ‘कमल’ खिलेगा!

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें
लोकतंत्र के महायज्ञ का पावन दिन है। आपका दिया एक वोट प्रदेश के आने वाले 5 साल का भविष्य तय करेगा! प्रदेश में किस पार्टी सरकार रहेगी, इस बात निर्णय आपका यही वोट तय करेगा। अपने इस वोट के महत्व को पहचानिए! इस लोकतांत्रिक कार्रवाई में सभी को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। मतदान करना हर भारतीय नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, कोशिश की जाना चाहिए कि हर स्थिति में इसका उपयोग हो! लोकतंत्र प्रति सजग और जागरूक लोग इसमें अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। उन्हें ऐसे लोगों को मताधिकार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, जो चुनाव वाले दिन वोट डालने के बजाए घरों में रहना या मौज-मस्ती पसंद करते हैं। बेहतर होगा कि लोग अपने घरों से निकलकर मताधिकार का प्रयोग करेंगे, तभी अच्छे जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचेंगे। मतदाताओं के जागरूक होने पर ही देश में एक अच्छी सरकार बनेगी, प्रदेश के विकास को आगे बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत भी है। इस सत्य को भी स्वीकारा जाए कि मतदान नहीं करने वाले लोग बनने वाली सरकार पर कोई आरोप, प्रत्यारोप भी नहीं लगा सकते। क्योंकि, चुनी हुई सरकार में उनकी हिस्सेदारी जो नहीं थी। युवा लोग अपने आसपास के क्षेत्रों में इस बात का बीड़ा उठाएं कि कोई भी मतदान से वंचित न हो!
प्रदेश के मतदाता 28 नवंबर को मतदान तो करें ही, इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका वोट सही उम्मीदवार और सही पार्टी चुने! क्योंकि, आपका सही फैसला ही प्रदेश और देश में विकास की धारा को गति देगा! मतदान से पहले अपने मन-मस्तिष्क में यह विचार अवश्य कर लें कि आपको निरंतर विकास करने वाली सरकार चाहिए या प्रदेश को बर्बाद करने वाली पार्टी की सरकार? भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होकर आपको ऐसा कोई फैसला नहीं करना है, जिस पर बाद में आपको अफ़सोस हो! क्योंकि, विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके लिए लम्बा समय और कठिन श्रम लगता है। बीते डेढ़ दशकों में प्रदेश का चेहरा जिस तरह बदला है, वो किसी से छुपा नहीं है। सरकार ने लोगों की मूलभूत जरूरतें पूरी करने की हर हरसंभव कोशिश की है। सड़क, बिजली, पानी, सबको भोजन और सबको छत देने के लिए कई योजनाएं बनाई और क्रियांवित की गईं! मध्यप्रदेश को बीमारू राज्य की फेहरिस्त से उबारकर विकास की धारा में ले आना आसान चुनौती नहीं था, पर ये चमत्कार भी हुआ। आज मध्यप्रदेश हर क्षेत्र में विकास कर रहा है। लेकिन, इस विकास का जारी रहना बहुत जरुरी है! यदि विकास पहिया धीमा हो गया या थम गया तो उसका फिर गति पकड़ना मुश्किल होगा! ऐसे कई अनुत्तरित सवालों का एक ही जवाब है कि मध्यप्रदेश में उसी पार्टी की सरकार को फिर मौका दें, जो विकास के प्रति संकल्पित है।

ये है अमिताभजी की दिलदारी

दुनिया में जो भी महान व्यक्ति हुए हैं, वे सिर्फ अपनी सामाजिक पहचान से नहीं, बल्कि अपने कर्म और सदाशयता की वजह से महान कहलाए! महान लोगों की इस सूची में मेरे नजरिए से एक नाम है हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन का!

परदे पर तीन दशक तक इस अभिनेता ने ‘एंग्रीमैन’ की भूमिका निभाई! लेकिन, निजी जीवन में अमिताभजी की पहचान एक ऐसे व्यक्ति का रही है, जो गुमनाम रहकर लोगों की मदद करते हैं। बॉलीवुड के ये महानायक जीवन में नए-नए प्रयोग करने के लिए भी जाने जाते हैं। वे अपनी परदे की पहचान से अलग भी कई ऐसे काम ऐसे करते हैं, जो उनकी शख्‍स‍ियत को कई गुना बढ़ा देता है। वे समाज सेवा के क्षेत्र में भी नए प्रयोग करते रहते हैं। किसानों के प्रति उनकी संवेदना का भाव तो इतना प्रबल है कि वे उनका दर्द नहीं देख पाते। उन्होंने पहले कर्नाटक, आँध्रप्रदेश, महाराष्ट्र के किसानों के कर्ज चुकाए। अब वे अपने जन्म स्थली राज्य उत्तरप्रदेश के किसानों की मदद के लिए आगे आए हैं। ये अमिताभ के धनवान होने का नहीं, बल्कि उनके संवेदनशील और उनके बड़प्पन का प्रतीक है। देश में पैसे वाले तो हज़ारों हैं, पर ऐसा दिलवाला कोई नहीं, जिसका दिल किसानों की पीड़ा समझता हो!

उन्होंने उत्तर प्रदेश के 1,398 किसानों का 4.05 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज चुकाने का फैसला किया है। अपने इस कदम के लिए अमिताभजी ने बैंक ऑफ इंडिया के साथ ‘ओटीएस’ यानी ‘वन टाइम सेटलमेंट’ किया है। 26 नवंबर को वे किसानों से मिलकर उन्हें खुद बैंक के कर्ज मुक्ति पत्र सौंपेंगे। इसके लिए अमिताभजी ने करीब 70 किसानों को मुंबई बुलवाया और इसके लिए ट्रेन का एक पूरा डिब्बा अपनी तरफ से बुक किया। इससे पहले उन्होंने महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के सैकड़ों किसानों का भी कर्ज चुकाया था।

नियमित लिखे जाने वाले अपने ब्लॉग में इस महान एक्टर ने लिखा भी है। ‘किसानों को बैंक का कर्ज चुकाने में परेशानी हो रही थी! कर्ज का बोझ बढ़ने की वजह से वे खुदकुशी जैसा बड़ा कदम उठाने को मजबूर हो रहे थे। किसानों को इस कदम से रोकने का एक ही रास्ता था कि उनका कर्ज चुका दिया जाए!’

मुझे याद है कि अमिताभजी अपने इस काम को प्रचारित करना नहीं चाहते थे। लेकिन, ‘केबीसी’ शो में आए एक अतिथि ने अमिताभजी की इस अच्छाई का जिक्र कर दिया था। उन्होंने उसी समय बताया था कि कर्नाटक में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान, वे कहीं रुके थे। सुबह उन्होंने अखबार देखा तो एक किसान की खुदकुशी की खबर पढ़ी। उससे मन विचलित हो गया और तभी फैसला किया था कि इनके लिए कुछ करूँगा, इसीलिए इस काम शुरुआत कर्नाटक से हुई।

उन्होंने किसानों के अलावा देश के लिए सीमा पर जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के 44 परिवारों की भी सरकारी एजेंसियों के जरिए आर्थिक मदद की। उन्होंने अपने ब्लॉग में इस बारे में लिखा था ‘ये बहुत संतोषजनक अनुभव’ रहा था। ये महान अभिनेता ‘कौन बनेगा करोड़पति कर्मवीर’ में पहुंचे अजीत सिंह की भी वह मदद करेंगे। अजीत सिंह लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेले जाने से बचाने में जुटे हैं। इसके अलावा अमिताभजी ने सरबनी दास रॉय को भी मदद देने का निर्णय लिया है, जो मानसिक रूप से बीमार लोगों की मदद करती हैं। अमिताभजी का ये कदम ऐसे लोगों के लिए प्रेरणा है, जो समाज के लिए कुछ करना तो चाहते हैं, पर उन्हें वो राह नजर नहीं आती, जो किसी के आँसू पौंछने तक पहुंचे!

मध्यप्रदेश में चौथी बार इसलिए बनेगी भाजपा सरकार!

मध्यप्रदेश में चौथी बार इसलिए बनेगी भाजपा सरकार!

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार सच और झूठ का फैसला होना है। सच वो जो प्रदेश की जनता ने 15 साल में देखा है और झूठ वो कांग्रेस हमेशा बोलती आई है। कांग्रेस का वचन-पत्र उसी झूठ का प्रतीक है। प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का आधार बहुत मजबूत है। इतना मजबूत कि उसे झूठे वादे डिगा नहीं सकते।

डेढ दशक तक जनता के सुख-दुःख में सहभागी रही मध्यप्रदेश सरकार ने अपने वादों और घोषणाओं से आगे जाकर काम किए हैं। प्रदेश में चौथी बार भाजपा ही अपनी सरकार बनाएगी, इसमें कोई शक नहीं! मुझे विश्वास है कि प्रदेश सरकार के कामकाज से जनता में उसके प्रति विश्वास प्रबल हुआ है। जनता का यही विश्वास इस बार के विधानसभा चुनाव में उसकी जीत का आधार बनेगा।

भाजपा हमेशा ही राजनीति से परे हटकर विकास का ध्यान रखती आई है। क्योंकि, विकास ही किसी सरकार के कामकाज के मूल्यांकन का सबसे बड़ा पैमाना होता है। सिर्फ मध्यप्रदेश ही नहीं, जहाँ भी भाजपा सरकारें हैं, वहाँ विकास को लेकर कभी कोताही नहीं बरती गई। लगातार तीन बार मध्यप्रदेश के मतदाताओं द्वारा भाजपा को सरकार बनाने का मौका देना ही इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है, कि जनता के दिल में भाजपा के प्रति विश्वास काफी गहरा है। इतना गहरा कि ये प्रतिद्वंदी के झूठे प्रलोभनों और दिवा स्वप्नों से भी वो डिगने वाला नहीं!

इस बार प्रतिद्वंदी कांग्रेस को ये ग़लतफ़हमी है कि प्रदेश की जनता भाजपा को हटाकर उसे मौका देगी! सपने देखना बुरी बात नहीं है। कांग्रेस नेताओं को भी ऐसे सपने देखने का पूरा हक़ है, लेकिन वे खुद मूल्यांकन करें कि जनता ऐसा क्यों करे? केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल और मध्यप्रदेश में डेढ़ दशक के भाजपा सरकार के कार्यकाल की तुलना क्या कांग्रेस की किसी भी सरकार कार्यकाल से की जा सकती है? आपसे भी सवाल करूँ तो आपका जवाब भी वही होगा जो मैं सोचता हूँ।

भाजपा सरकार की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उसका कामकाज जनता को दिखाई देता है। जब भाजपा सरकार जनता की जरुरत और भावना के अनुरूप काम कर रही है, तो फिर जनता किसी ऐसी पार्टी को सरकार बनाने का मौका क्यों दे, जिसके एक बड़े नेता को ‘बंटाढार’ का तमगा मिला हुआ है! एक समय था जब देशभर में मध्यप्रदेश ख़राब सड़कों के लिए बदनाम था, आज वो स्थिति नहीं है। बिजली को लेकर शहर में स्टूडेंट से लगाकर गाँव के किसान तक परेशान थे! आज मध्यप्रदेश में बिजली का उत्पादन इतना है कि हम दूसरे राज्यों को रोशन कर रहे हैं। समाज में झूठ की गंदगी फैलाने, लोगों को भरमाने और झूठे वादे करने वालों की कमी नहीं है। चुनाव की इस फ़िज़ां में चारों तरफ झूठ के बादल छाए हुए हैं। ऐसे कई नेता हैं, जो जनता को मूर्ख बनाने के लिए झूठ का सहारा ले रहे हैं। ऐसे में उम्मीद की किरण सिर्फ भाजपा ही है जिसने जो वादा किया वो पूरा किया!

उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष
उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा
– कैलाश विजयवर्गीय
आज आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है। इस महान भारतीय आत्मा को शत-शत नमन। भारतीय राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। वे राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी तो थे ही, देश की आजादी के संघर्ष में भी उन्होंने जो योगदान दिया। उससे कहीं ज्यादा समर्पण उन्होंने आजाद भारत को एक करने में लगाया। जिस अदम्य उत्साह और असीम शक्ति से उन्होंने नव गणराज्य की शुरूआती समस्याओं का समाधान खोजा, उसी का नतीजा है कि उन्होंने हर भारतीय के दिल में अमिट स्थान बना लिया। उनकी नीतिगत दृढ़ता के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें ‘सरदार’ और ‘लौह पुरुष’ की उपाधि दी थी।
आज उन्हें विशेष रूप से याद करने का कारण ये भी है कि उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद के नजदीक उनकी विशाल प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ का अनावरण करने जा रहे हैं। उनकी 182 मीटर ऊँची ये प्रतिमा भी उसी लौहे की बनी है, जैसे उनके इरादे थे। अनावरण के साथ ही ये दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा में दर्ज हो जाएगी, ठीक सरदार पटेल के इरादों की तरह! यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर बनी है। इसकी आधारशिला 31 अक्तूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138 वीं वर्षगांठ के मौके पर रखी गई थी। तब आज के हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसे मणिकांचन संयोग ही माना जाना चाहिए, कि आज जब ये प्रतिमा अनावृत हो रही है, सरकार पटेल की ही तरह नीतिगत दृढ़ता के धनी नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। इस लौह प्रतिमा के लिए हमारी भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश के किसानों, मजदूरों से लोहा इकट्ठा करने का अभियान चलाया था। प्रतिमा बनाने वाली कंपनी एलएंडटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक एस एन सुब्रमण्यन के मुताबिक ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ जहां राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक है, वहीं यह भारत के इंजीनियरिंग कौशल तथा परियोजना प्रबंधन क्षमताओं का सम्मान भी है।
स्वतंत्रता संग्राम से लगाकर एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिस तरह की भूमिका निभाई, इतिहास के उस कालखंड को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनका जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव प्रेरणा के रूप में देश के सामने है और हमेशा रहेगा। राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का उन्होंने युवावस्था में जो निर्णय लिया था, उस पथ पर वे जीवन पर्यन्त नि:स्वार्थ भाव से चले। आज के युवाओं के लिए उनका जीवन प्रेरणास्पद है।
उनके जीवन का एक प्रसंग जो मैंने कहीं पढ़ा है, मुझे हमेशा स्मरण हो आता है। जिस तरह भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म कौशल को योग रूप में समझाया है। अर्थात अपने दायित्व का पूरी कुशलता, क्षमता के साथ निर्वहन करना चाहिए। सरदार पटेल ने भी इसी आदर्श को आजीवन अपनाया। वे जब वकील के रूप में अपना दायित्व निभा रहे थे, उसमें भी उन्होंने मिसाल कायम की। वे जब एक मामले में न्यायाधीश के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला! जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया, चेहरे पर कोई भाव लाए बिना! पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया। उस टेलीग्राम में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी। यह उनके लौह पुरुष होने का एक उदाहरण है। इस बात का परिचय उनके आजादी के बाद के कार्यों से ही नहीं मिला, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी, जिसका प्रभाव उनके हर कदम में जीवनभर दिखाई दिया।
आजादी के बाद भारतीय रियासतों के विलय की अहम् जिम्मेदारी सरदार पटेल को सौंपी गई थी। उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए छोटी-बड़ी 600 रियासतों का भारत में विलय कराया। देशी रियासतों का विलय आजाद भारत की पहली सबसे बड़ी उपलब्धि थी। निर्विवाद रूप से इसका पूरा श्रेय ही सरदार पटेल को जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे देश की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे। वे जानते थे, कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक संतुलित विकास को कोई खतरा नहीं है। गांव से शहरों की और पलायन भी नहीं होगा। रोजगार के अवसर गांव में ही उपलब्ध होंगे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण भी सरदार पटेल को राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान मिला है। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में संगठन कुशलता, राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट निष्ठा थी। ऐसे महान व्यक्ति को एक बार फिर प्रणाम!

भारतीय राजनीति के बाजीगर, जिन्होंने हारना नहीं सीखा

“भारतीय राजनीति के बाजीगर, जिन्होंने हारना नहीं सीखा”

जब कभी भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाहजी के रणनीतिक कौशल, चुनाव प्रबंधन, नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता, प्रतिद्वंदी पर आक्रामक हमले जैसी उनकी कुशलता पर एक पूरा अध्याय लिखा पड़ेगा। क्योंकि, वे इस सभी विधाओं के पारंगत खिलाड़ी हैं। उन्हें हारना नहीं आता! हारकर जीतना भी वे जानते हैं। यदि उन्हें भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, तो उन्हें चुनाव प्रबंधन का बाजीगर भी कहना होगा। उन्होंने पार्टी को हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहना भी सिखा दिया। वे कभी विश्राम नहीं करते। उनकी प्रबल इच्छाशक्ति ने पार्टी में अलग ही ऊर्जा का संचार किया है। आरएसएस के कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को उन्होंने जिस तरह साकार किया है, वो उनके भविष्य के मजबूत इरादों का संकेत है।

– कैलाश विजयवर्गीय
भारतीय जनता पार्टी देश में अगले पचास साल तक सत्ता में रहेगी। ये बात कहने का साहस और आत्मविश्वास यदि किसी में है तो वो हैं पार्टी अध्यक्ष श्री अमित शाह। उनकी ये बात सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं में ही उत्साह का संचार नहीं करती, बल्कि विपक्ष के लिए भी एक चुनौती है। राजनीतिक रूप से मुखर मानी जाने वाली भाजपा आज पहले की अपेक्षा ज्यादा संगठित और अनुशासित मानी जाती है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं अमित शाहजी का अपना तरीका है। श्री शाह को आज भाजपा का सबसे ताकतवर अध्यक्ष माने जाने का कारण ये है कि वे न केवल रणनीतिकार हैं, बल्कि पार्टी के प्रभावशाली प्रचारक भी हैं। उन्होंने पार्टी को हमेशा इलेक्शन मोड़ में रहना सिखा दिया। मैंने काफी नजदीक से देखा है कि एक चुनाव ख़त्म होने के बाद वे कभी विश्राम की मुद्रा में दिखाई नहीं दिए। उनकी इसी ऊर्जा ने पार्टी को हमेशा मैदान में बनाए रखा है।
कामकाज के नजरिए से भी देखा जाए तो अमित शाह पिछले करीब दस अध्यक्षों से बिलकुल अलग हैं। भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपेयी 18 साल तक पार्टी के कर्ताधर्ता रहे। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने पार्टी की बागडोर संभाली। पहली बार जब एनडीए सत्ता में आई, तो कुशाभाऊ ठाकरे, जना कृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण पार्टी के अध्यक्ष बने। इन दिग्गजों को पार्टी के मुखिया की कुर्सी पर बैठाने के पीछे विचारधारा यह थी कि पार्टी के नेता सरकार और राजनीति संभालें और आरएसएस के लोग पार्टी और संगठन के बीच एक सेतु का काम करें। श्री नितिन गडकरी और श्री राजनाथ सिंह दो ऐसे अध्यक्ष रहे हैं, जिन्होंने राजनीति और संगठन दोनों को संभाला। इन दोनों को आरएसएस का साथ भी बखूबी से सहयोग मिला। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष के तौर पर श्री अमित शाह का नजरिया थोड़ा अलग हैं। वे रणनीतिक रूप से आक्रामक हैं और कार्यकर्ताओं की सुनते भी हैं। उनके फैसलों और उन फैसलों को कार्य रूप में परिणित करने में वजन दिखाई देता है। साथ ही आरएसएस में भी उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी वैचारिक और नीतिगत जुगलबंदी का फ़ायदा जितना पार्टी को अपने विस्तार में मिला, उतना ही संघ को भी मिला।
अपने स्पष्ट दृष्टिकोण और रणनीति के अद्भुत कौशल के कारण ही उन्हें 2010 में भाजपा का महासचिव और उसके पश्चात लोकसभा चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। चुनाव के नजरिए से समय कम था, पर जिनकी इच्छाशक्ति प्रबल हो, उनके लिए लक्ष्य कभी मुश्किल नहीं होता। अमितजी ने बहुत थोड़े समय में उत्तर प्रदेश में भाजपा को पुनर्जीवित किया। इसका सबूत 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब भाजपा और उसके सहयोगियों ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 लोकसभा सीटों पर झंडा गाड़ दिया। सिर्फ संख्यात्मक रूप से ही सीटें नहीं बढ़ाई, बल्कि भाजपा के मत प्रतिशत में भी ढाई गुना वृद्धि की। 2014 का लोकसभा चुनाव तो पूरी तरह श्री नरेंद्र मोदी और श्री अमित शाह के रणनीतिक कौशल का ही परिणाम था। प्रचार, जनसंपर्क, अभियान और नए मतदाताओं की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेकर एक ऐसी रणनीति बनाई गई, जिसने इन चुनावों में भाजपा को अभूतपूर्व विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगठनात्मक क्षमताओं के कारण ही उन्हें चुनाव का कुशल रणनीतिकार समझा जाता है। अमितजी की गिनती उन चुनिंदा राजनीतिज्ञों में होती है, जिनका राजनीतिक इतिहास प्रभावशाली रहा है। पार्टी में उन्हें अपने सिद्धांतों और आदर्शों पर अडिग रहने के लिए भी जाना जाता है। अमितजी में न केवल बेहतरीन संगठनात्मक क्षमता है, बल्कि वे आक्रामक सामरिक योजना के लिए भी जाते हैं। वे ऐसे जमीनी नेता हैं, जो अपने आदर्शों के प्रति दृढ़तापूर्वक प्रतिबद्ध रहे हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं रही, लेकिन उनके परिवार में मानवीयता का समावेश था, जिससे उनके भीतर समाज सेवा की इच्छा जागृत हुई। 14 साल की उम्र में ‘तरुण स्वयसेवक’ के रूप में उन्होंने आरएसएस की सदस्यता ग्रहण की थी। इसके बाद तो उनके जीवन की दिशा ही बदल गई।
अमितजी को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कट्टर समर्थक माना जाता है। लेकिन, इन दोनों की शख़्सियत का मूल्यांकन किया जाए तो कई मामलों में दोनों एकदम जुदा हैं। लोगों को जहाँ मोदीजी की स्पष्ट वाकपटुता और आक्रामक भाषण शैली प्रभावित करती है, वहीँ अमितजी को बंद कमरे में सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर समझा जाता हैं। मैंने कई बार देखा कि वे नेताओं की भीड़ से अलग रहना ही पसंद करते हैं। उनका ये एकाकीपन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। जहाँ तक राजनीतिक रणनीति की बात है, तो वे कभी भी किसी योजना को अधूरा नहीं छोड़ते! वे ज़मीनी हकीकत को विस्तार से जानकर ही किसी योजना को अंतिम रूप देते हैं। उनकी इसी कार्यशैली का नतीजा है कि भाजपा को हर चुनाव में बेहतरीन नतीजे मिले हैं।
आज लोग मानते हैं कि भाजपा का सबसे बड़ा पावर सेंटर अमित शाहजी हैं। यदि ऐसा माना जाता है तो इसमें गलत भी क्या है! नरेंद्र मोदी को यदि दिमाग मान लिया जाए तो अमित शाहजी उसी दिमाग की रक्तवाहिनियां हैं, जो उनके विचारों और योजनाओं को भाजपा रूपी शरीर के हर कोने तक पहुंचाती है। ऊर्जावान दिमाग और संगठनात्मक शक्ति की इस अनमोल जोड़ी ने आरएसएस के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को काफ़ी हद तक पूरा करके भी दिखाया है। आज यदि देश का ज्यादातर हिस्सा भाजपा के झंडे से रंगा नजर आ रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं इसी जोड़ी का हाथ है। ये अमितजी की ही रणनीति थी कि पार्टी ने असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में जीत हांसिल की। वे कभी हार नहीं मानते और हारी हुई बाजी जीतना भी उन्हें आता है। क्योंकि, वे राजनीति के बाजीगर जो हैं। गोवा में कांग्रेस को पीछे छोड़कर वहाँ सरकार बनाने में कारनामा उनकी आक्रामक शैली और त्वरित फैसले का सबसे बेहतरीन उदाहरण माना जा सकता है। बिहार का विधानसभा चुनाव हारकर भी उन्होंने उस हार को जीत में कैसे बदला, ये भी देश देख चुका है। उन्हें शतरंज खेलना बहुत पसंद है। वे गुजरात चेस एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं। माना जाता है कि शतरंज खिलाड़ी प्रतिद्वंदी का दिमाग पढ़कर योजना बनाने में माहिर होता है और अमितजी की इस काबलियत का कोई सानी नहीं है। उनकी हर चाल प्रतिद्वंदी को रक्षात्मक होने के लिए मजबूर कर देती है। आने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाला लोकसभा चुनाव उनकी संगठनात्मक क्षमताओं का परिचायक होगा। आज अमित शाहजी का जन्मदिन है। इस पावन दिन पर उन्हें बधाइयाँ और शुभकामनाएं।

*नवरात्रि के 9 दिन और नारी शक्ति की आराधना*

माता दुर्गा को शक्ति का भंडार माना जाता है। यही कारण है कि उनकी पूजा से अनंत ऊर्जा की प्राप्ति होती है। नवरात्रि की पूजक माता दुर्गा के नौ रूप हैं, सभी रूप अपने अंदर शक्ति को समेटे हैं। शक्ति साधना के इस पर्व में 9 देवियों की, तीन महादेवियों की दश महाविद्या की साधना आदि का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि नवरात्रि में माता दुर्गा के 9 शक्ति रूपों की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। भक्ति करने वाले के जीवन में सकारात्मकता संचारित होती है। हिन्दू धर्मग्रंथों और शास्त्रों के मुताबिक शक्ति पूजन के बिना देव पूजा भी अधूरी है। शक्ति की आराधना के बिना तो शिव को भी शव के सदृश समझा गया हैं। इस शक्ति की महत्ता का अहसास इसी एक सच से लग जाता है। शक्ति के बिना तो योग सिद्धि की भी प्राप्ति संभव नहीं। यही कारण कि नवरात्रि में शक्ति स्वरूप माता दुर्गा की पूजा ही शुभ मानी गई है।
कहा जाता है कि समाज में शक्ति की प्रतीक नारी के प्रति संवेदनाओं का विस्तार जरुरी है। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का हम सम्मान करें। परिवार में रहने वाली माता, पत्नी, बेटी, बहन या अन्य रिश्तों में हम शक्ति गुण ढूंढें और उनका सम्मान करें। इसलिए कि नारी में जितनी शक्ति, ऊर्जा, दृढ़ता और समर्पण होता है, उसका पुरुष में सर्वथा अभाव होता है। आज नारी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से ही समाज में स्वयं को स्थापित कर सकी है। शास्त्रों ने इसी मातृशक्ति की आराधना के लिए हमें साल में 9 विशेष दिन दिए हैं। देखा जाए तो वास्तव नौ-दुर्गा के ये दिन नारी शक्ति के सम्मान का उत्सव है। दुर्गा पूजा का ये उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान और शक्ति का स्मरण कराता है, साथ ही समाज के अन्य शक्ति केंद्रों को भी नारी शक्ति के सम्मान के लिए प्रेरित करता है।
शक्ति का आशय ऊर्जा। ऊर्जा को यदि अपने मुताबिक संचालित करना है, तो उस पर आधिपत्य करना जरुरी है। शक्ति को जीतकर उसे हम अपने अधीन कर सकते हैं! लेकिन, यह संभव नहीं था! यही कारण है कि ऊर्जा से कृपा पाने के लिए उसे माता शब्द से उद्धृत किया गया। इसका सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि शक्ति में वात्सल्य का भाव जागा और ऐसी स्थिति में सिर्फ स्तुति से ही माता की कृपा प्राप्त होने लगी। इसलिए वैदिक साहित्य और भारतीय आध्यात्म शक्ति की उपासना प्रायः माता के रूप में की गई है। शक्ति के तामसिक रूपों में हाकिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी आदि की पूजा भी तांत्रिक और साधक माता रूप में ही करते हैं। क्योंकि, माता शब्द से उनकी आक्रामकता में कमी आती है। भक्ति में कोई त्रुटि होने पर भी माता भक्त को पुत्र समझकर क्षमा कर देती है।
बंगाल में नारी-पूजा की परंपरा प्राचीनकाल से प्रचलित है। इसलिए वहां शक्ति की पूजा करने वाले शाक्त संप्रदाय का काफी असर है। दूसरी और वहां वैष्णव संत भी हुए हैं, जो राम और कृष्ण की आराधना में यकीन रखते हैं। पहले इन दोनों संप्रदायों में अकसर विवाद होते थे। लेकिन, धीरे-धीरे शाक्तों और वैष्णव संप्रदाय में सामंजस्य कायम हुआ। सदियों पहले राम को दुर्गा की आराधना करते हुए दिखाने से भी विवाद हुए! लेकिन, समय, काल और परिस्थितियों ने दोनों संप्रदायों के बीच समरसता कायम की। इससे भगवान राम का नायकत्व तो स्थापित हुआ ही, शक्ति रूपा नारी की अहमियत भी बरकरार रही। पिछली पांच शताब्दियों में दुर्गा पूजा और दशहरा न केवल बंगाल बल्कि देश के दूसरे इलाकों का भी महत्वपूर्ण त्यौहार बन चुका है। क्योंकि, शक्ति का पूजन जिस अपरिमित ऊर्जा का संचार करता है, वो कहीं और से प्राप्त नहीं की जा सकती!

एक साथ चुनाव की जरूरत

एक साथ चुनाव की जरूरत

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की विधानसभाओं के चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर ज्यादातर राजनीतिक दल चुनावी मोड में हैं। इन तीन विधानसभा चुनावों के बाद देश एक बार फिर जल्दी ही लोकसभा के लिए चुनावी मोड में होगा। अगले वर्ष सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना, ओडिसा और आंध्र प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होंगे। अगले वर्ष ही कुछ समय बाद हरियाणा और महाराष्ट्र की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। 2020 में झारखंड, दिल्ली और बिहार में विधानसभा के चुनाव होंगे। 2021 में जम्मू-कश्मीर,असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुद्दूचेरी में विधानसभाओँ के चुनाव होंगे। लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के अलावा सभी राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव भी होगें। यानी हर दो-तीन महीने बाद देश चुनावी मोड में होगा, सरकारें साइलेंट मोड में होंगी और नौकरशाही फ्लाइट मोड में चलेगी। ऐसी स्थिति से बचाने के लिए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के विचार पर देश में बहस छेड़ी गई है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह ने इसी मुद्दे पर विधि आयोग को एक पत्र सौंपा है। इस पत्र में उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए लिखा है वहां 365 दिनों में से 307 दिनों तक चुनावों के कारण आचार संहिता लगी रही। इस कारण विकास कार्यों में रुकावट आई और ऐसी स्थिति कई राज्यों में रही। श्री शाह ने सुझाव दिया है कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक व्यय में कमी आएगी और विकास कार्यों में तेजी आएगी। साथ ही राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च में भी कमी आएगी।

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव नया नहीं है। देश में 1952, 1957, 1962 और 1967  के आम चुनावों के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव होते रहे हैं। 1967 के लोकसभा चुनाव के साथ हुए विधानसभा चुनावों में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था। आठ विधानसभाओं में पहली बार विपक्ष की संविद सरकारें बनीं। 1967 से पहले देश में गैर कांग्रेसवाद का नारा बुलंद हुआ था। विपक्ष ने मिलजुलकर कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने दिया। संयुक्त विपक्ष की सरकारें ज्यादा समय तक नहीं चल पाईं तो मध्यावधि चुनाव की शुरुआत हुई। 1969 में कांग्रेस टूटने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देते हुए लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने का फैसला लिया और 1971 में पांचवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इस तरह लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की परम्परा समाप्त हो गई। इंदिरा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत मिला तो 18 विधानसभाओं को भंग करके मध्यावधि चुनाव कराए गए। 1977 में लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कई राज्यों की विधानसभाओं को भंग करके चुनाव कराए गए। 1980 में जनता पार्टी के विघटन और इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद फिर से विधानसभाओं को भंग करके चुनाव कराए गए। इस स्थिति में एक साथ चुनाव का कराने का सबसे पहले चुनाव आयोग ने 1983 में सुझाव दिया। 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया। समय-समय पर कुछ राजनीतिज्ञ भी एक साथ चुनाव कराने का सुझाव देते रहे। 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने चुनावों में बढ़ते खर्च के मद्देजनर लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव कराने का सुझाव दिया। श्री आडवाणी ने 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भी एक देश-एक चुनाव का सुझाव दिया। 2012 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी को पत्र भेजकर चुनाव सुधार के लिए कदम उठाने की अपील की थी। इस मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह से भी चर्चा की थी। तब श्री सिंह ने इस मुद्दे पर सहमति जताई थी। श्री आडवाणी ने बार-बार होने वाले मध्यावधि चुनावों को लेकर भी लोकसभा और विधानसभाओं की अवधि तय करने का सुझाव भी दिया था। तब चुनाव आयोग या केंद्र सरकार ने इस सुझाव पर कोई ध्यान नहीं दिया। 2015 में ससंदीय समिति ने भी एक साथ चुनाव कराने के लिए अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी देश की जनता के सामने यह सुझाव रखा और सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर चर्चा करने का अनुरोध किया। डा.प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति रहते हुए कुछ अवसरों पर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर सहमति जताई। राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने भी इस मुद्दे पर सहमति जताई। भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह ने चुनावी खर्च में तेजी से हो रही बढ़ोतरी को लेकर भी एक साथ चुनाव कराने का सुझाव आगे बढ़ाया है। चुनाव में खर्चों में बढ़ोतरी को लेकर सभी दल इसमें कटौती करने के पक्ष में हैं। 1952 के लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों पर दस करोड़ खर्च हुए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव पर ही सरकार ने 4500 करोड़ खर्च किए। एक अनुमान के अनुसार राजनीतिक दलों की तरफ से 30 हजार करोड़ खर्च करने का हिसाब लगाया गया है। 1999 से लेकर 2014 के आम चुनावों के दौरान 16 बार ऐसा हुआ है कि छह महीनों के भीतर ही विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं।

मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष एकजुट होने की कोशिश में हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, कम्युनिस्ट, तेलुगूदेशम पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी एक राष्ट्र-एक चुनाव के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात करने वाली समाजवादी पार्टी ने एक साथ चुनाव कराने पर रजामंदी जताई है। तेलंगाना राष्ट्र समिति, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और शिरोमणि अकाली दल भी एक साथ चुनाव कराने पर सहमत हैं। कुछ दल इस मसले पर संविधान संशोधन की जरूरत बता रहे हैं। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने वीवीपीएटी मशीनों की कमी के आधार पर एक साथ चुनाव कराने में असमर्थता जताई है। 1952 में हुए लोकसभा और विधानसभाओं के चनाव की तुलना में आज हमारे पास ज्यादा संसाधन हैं। देश में और राज्यों में कई गुणा सुरक्षा बल हैं। परिवहन के साधन बहुत बढ़े हैं। पहले के मुकाबले सूचना तेजी से दी जा सकती हैं। चुनावों पर नजर रखने के पूरे संसाधन हैं। कांग्रेस और कुछ दलों को लगता है कि एक साथ चुनाव हुए तो नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। मोदी के नाम पर राजग के दलों को राज्यों में लाभ हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक राष्ट्र-एक चुनाव का सुझाव देश की तेजी से विकास करने और चुनाव खर्च में कमी लाने के मकसद से की है। राजनीति के शिखर पुरुष पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल विहारी वाजपेयी ने 1996 में विश्वासमत के दौरान कहा था कि ‘सत्ता का खेल तो चलेगा..सरकारें आएंगी जाएंगी। पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी भी इसी उदेश्य को लेकर आगे बढ़ रही है। चुनाव में जनता किसे चुनेगी, यह जनता का अधिकार है। हमारा कर्तव्य है कि हम देश को तेजी से तरक्की के रास्ते पर लाने के लिए एक राष्ट्र-एक चुनाव के सुझाव पर एकजुट हों।

अतुलनीय अटल जी कैलाश विजयवर्गीय

अतुलनीय अटल जी

प्रशंसकों ने तो श्रद्धांजलि दी ही, साथ पूरे देश को उनका जाना झकझोर गया। विदेशों में उनके प्रशंसकों को उनका जाना खल रहा है। पाकिस्तान की जनता भी उनके न रहने से स्तब्ध रह गई। सभी को लगा कि उनके बीच से एक ऐसी महान शख्सियत चली गई, जिसने भारतीय राजनीति को नये आयाम दिए। विश्व में कूटनीति की नई परिभाषा गढ़ी। अटल इरादों के विशाल ह्रद्य वाले अटलजी राजनीति में शुचिता, पवित्रता,नैतिकता, पारदर्शिता और सौहार्दता के लिए देशवासियों के मन में हमेशा छाये रहेंगे। 12 साल से मौन अटलजी के महाप्रयाण पर करोड़ों लाखों ने उन्हें विदाई दी। महाप्रयाण के अवसर पर नम हुईं करोड़ों आंखें हमें बताती हैं कि अटलजी का न रहना, एक राजनीतिक युग के समाप्त होने जैसा है। अटलजी ने चाहे 12 साल से एक शब्द नहीं बोला था, पर भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय करोड़ों कार्यकर्ताओं के पास उनसे जुड़ा कोई न कोई संस्मरण जरूर था। गांव-देहात के कार्यकर्ता हो या प्रदेश की राजधानी के कार्यकर्ता हो या दिल्ली के। सभी अटलजी का जिक्र आते ही अपने-अपने संस्मरण सुनाने लगते। कितना विशाल संपर्क था अटलजी का। एक बार जिस शहर में गए, वहां सैंकड़ों लोगों के दिलों में बस जाते थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा आकर्षण था, जो बरबस ही सबको अपनी ओर खींच लेता था। उनके विरोधी भी उनकी इस बात के कायल थे। भाजपा के विरोधी दलों के नेताओं के पास भी अटलजी के सहयोग के बहुत से संस्मरण हैं। भाजपा के धुर विरोधी रहे लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने तो अपनी किताब में अटलजी के महान व्यक्तित्व का उल्लेख किया है। माकपा के प्रमुख नेता रहे सोमनाथ चटर्जी का जो काम तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी टालती रहीं, उसे अटलजी ने दो घंटे में कर दिखाया।

अटलजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते। महात्मा गांधी हो या पंडित जवाहर लाल नेहरू। डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी हो या पंडित दीनदयाल उपाध्याय। इनमें से किसी से भी अटलजी की तुलना नहीं हो सकती। अटलजी की तुलना अगर होगी तो स्वयं अटलजी से ही होगी। अटल वाकई बहुत बड़े थे। भारतीय राजनीति में उन्होंने स्वयं को बेशक कभी बहुत बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया पर उनके कार्यों और विचारों के आधार पर हम उन्हें बहुत बड़ा मानते हैं। पहली बार ही लोकसभा में पहुंच कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को चुनौती देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को सुनकर उन्हें कहना पड़ा था यह युवक अवश्य प्रधानमंत्री बनेगा। राजनीति में कभी उन्होंने पद पाने की लालसा नहीं जताई। भाजपा में तो वे प्रारम्भ से ही एक स्वाभाविक पसंद थे। भाजपा का हर कार्यकर्ता और शुभचिंतक ही नहीं देश की जनता की भी चाहत थी कि अटलजी लालकिले से झंडा फहरायें। 13 दिन की सरकार चलाने के बाद देशवासियों ने उन्हें 13 महीने और फिर पांच साल सरकार चलाने का अवसर दिया। यह अवसर उनके विचारों और कार्यों के कारण ही मिला। देश की समस्याओं को लेकर चिंता करने वाले और उनका हल निकालने में जुटे रहने वाले अटलजी उदास पलों में भी लोगों को हास्य से भर देते थे। उनका कहना था कि चुनौतियों का हंसकर सामना करेंगे तो चिंताएं भी ज्यादा देर तक नहीं टिकेगी।

अटलजी पर प्रधानमंत्री रहते हुए कोई दाग नहीं लगा पाया। इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल रहा। साढ़े चार साल के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार पर कोई उंगली नहीं उठा पाया। अटलजी के व्यक्तित्व के तमाम पहलू हमें मोदीजी में दिखाई देते हैं। लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि मोदीजी अटलजी के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। रोजाना वे अटलजी के स्वास्थ्य की रिपोर्ट लेते। महीने में एक बार उन्हें देखने घर जाते और परिवार को उनके शीघ्र स्वस्थ होने का ढांढस बताते। पूरे देश की जनता ने देखा कि अटलजी के निधन के बाद अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रोटोकाल को तोड़ते हुए सुरक्षा नियमों की परवाह न करते हुए पैदल चलते रहे। एक पुत्र की भांति उन्होंने अटलजी को विदाई दी। देश हैरान कि ऐसा इस देश में किसी ने नही देखा कि अपने आदर्श रहे एक महान व्यक्तित्व को किसी प्रधानमंत्री ने ऐसी विदाई दी हो। मोदी के साथ उनके मंत्रिमंडल के सभी साथी और सांसद भी साथ थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी साथ-साथ चलते रहे। ऐसे नजारे ने भी माहौल को और भावुक बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने जिस गति से आधार बढ़ाया है, उसे देखकर हर कोई यही कहता है कि अटल-अडवाणी ने दो सदस्यों की भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया तो मोदी-शाह की जोड़ी ने पार्टी को देश के हर कोने में पहुंचा दिया। सचमुच अटलजी के एकदम सही उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी को देशवासियों ने राष्ट्र को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए नेतृत्व सौंपा है। अटलजी की लेखनी, वाणी और कर्म हमारे लिए हमेशा प्रेरणा के माध्यम रहेंगे। आने वाली पीढ़ियों के लिए अटलजी एक नए सशक्त और समृद्ध भारत की नींव रखने के लिए जाने जाएंगे।

सोमनाथ चटर्जी की अंतिम कसक-पश्चिम बंगाल में मर गया है लोकतंत्र

सोमनाथ चटर्जी की अंतिम कसक-पश्चिम बंगाल में मर गया है लोकतंत्र

लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी हमेशा लोकतंत्र के पक्षधर रहे। अंतिम सांस लेने तक वे दो साल से बीमारी से जूझ रहे थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान लोकतंत्र पर हुए आघात को लेकर उन्होंने अपनी बीमारी की हालत में भी बार-बार चिंता जताई थी। पश्चिम बंगाल में कुछ समय पहले हुए पंचायत चुनावों में विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन न करने की ममता बनर्जी सरकार की कारगुजारी पर सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि राज्य में कोई लोकतंत्र नहीं रह गया है और राज्य उस स्थिति की तरफ बढ़ रहा है, जहां संविधान के अनुच्छेद 356 को लागू करने की मांग की जा सकती है। यह अवश्विसनीय है। यहां तक कि लोगों को उनके न्यूनतम अधिकारों से भी जबरन वंचित किया जा रहा है। यहां लोकतंत्र नाममात्र भी नहीं बचा है। यह न केवल खेदजनक है, बल्कि गहरी चिंता का विषय है। तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की गुंडागर्दी, ममता सरकार के प्रशासनिक और पुलिस के अधिकारियों की विवशता और राज्य चुनाव आयोग की मनमानी को लेकर दुखी हुए सोमनाथ दा ने तो राज्य चुनाव आयुक्त को तीन बार हटाने की मांग भी कर दी थी। पश्चिम बंगाल की हालत पर यह उनकी अंतिम टिप्पणी थी कि जिस तरह पंचायत चुनाव कराया जा रहा है उससे लगता है कि बच्चों का खेल हो रहा है। सरकार जो बोल रही है राज्य चुनाव आयोग वही सब कर रहा है। उनका कहना था कि राज्य चुनाव आयुक्त को चुनाव में सुरक्षा इंतजामों की जानकारी भी नहीं है। उनका कहना था कि राज्य चुनाव आयुक्त मजबूर हैं तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

दस बार लोकसभा के सदस्य रहे सोमनाथ चटर्जी 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे। 1996 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का खिताब पाने वाले सोमनाथ चटर्जी अपनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के रवैये से भी नाखुश थे। 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का कम्युनिस्टों ने विरोध किया था। सर्वसम्मति से लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए सोमनाथ चटर्जी को माकपा की तरफ से इस्तीफा देने के लिए विवश किया गया था। 2004 में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लोकसभा अध्यक्ष के लिए उनका नामांकन किया गया था। लोकसभा अध्यक्ष बनाने के दूसरे प्रस्ताव का पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने समर्थन किया था। 2008 में कम्युनिस्टों के मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-एक सरकार से समर्थन लेने के बाद 22 जुलाई 2008 को विश्वास मत के दौरान किए गए लोकसभा के संचालन के लिए बहुत तारीफ हुई। विदेशी सरकारों के इशारे पर राजनीति करने वाली माकपा को सोमनाथ चटर्जी का यह रवैया कि लोकसभा अध्यक्ष किसी पार्टी का नहीं होता है, भाया नहीं। कहा जाता है कि चीन के दखल के बाद माकपा ने उन्हें पार्टी से निकाला। इसके बाद सोमनाथ चटर्जी राजनीति में सक्रिय नहीं रहे। जो गलती आपातकाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ के दवाब में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन करके की थी, उसी तरह की गलती माकपा ने 2008 में चीनी दवाब में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का विरोध करके की। नतीजा 2011 में पश्चिम बंगाल की जनता ने कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर कर दिया।

यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा की सदस्य रहते हुए राज्य की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार पर मुस्लिम घुसपैठियों की मदद देने का आरोप लगाते हुए सोमनाथ चटर्जी पर टिप्पणी की थी। ममता ने लोकसभा से इस्तीफा भी दिया था। जिस तरह से ममता ने इस्तीफा दिया, उसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। सोमनाथ चटर्जी मजदूरों के अधिकारों के लिए हमेशा लड़ते रहे। गरीबों के मुद्दे को उन्होंने संसद में बड़ी मजबूती से उठाया। बार-बार कमजोर वर्गों की आवाज संसद में उठाते रहे। सोमनाथ दा संसद में बहस के दौरान राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों को बड़ी गंभीरता, पूरे तथ्यों और जोरदार ढंग से रखते थे। संसद में उन्हें बड़े ध्यान से सुना जाता था। सोमनाथ चटर्जी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भी प्रशंसक रहे थे। अपनी किताब में उन्होंने आपातकाल के बाद विदेश मंत्री बने वाजपेयी द्वारा उनका पासपोर्ट एक दिन में दिलाने में मदद करने पर प्रशंसा की थी। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने उनका पासपोर्ट दोबारा नहीं बनने दिया था। आपातकाल से दुखी सोमनाथ लोकतंत्र की दुर्दशा के कारण विदेश जाना चाहते थे पर पासपोर्ट की अवधि समाप्त होने के कारण उनका पासपोर्ट नहीं बन पा रहा था। आपातकाल का विरोध करने वाले कुछ ही कम्युनिस्ट थे, जिनमें सोमनाथ चटर्जी प्रमुख थे। सोमनाथ चटर्जी ने पंचायत चुनाव के दौरान ममता सरकार की मनमानी और तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की गुंडागर्दी के कारण राष्ट्रपति शासन लगाने का सुझाव दे दिया था। उनकी टिप्पणी के बाद अब तो साफ लग रहा है कि ममता सरकार का जाना ही पश्चिम बंगाल की जनता की उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

संसद में राहुल की नौटंकी

संसद में राहुल की नौटंकी

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण खत्म करते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट पर जाकर उनके गले पड़ते हैं। इसके बाद अपनी सीट पर आते हैं और कांग्रेस के सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ कुटिल मुस्कान फेंकते हुए एक आंख मारते हैं। लोकसभा का यह पूरा नजारा देश ने देखा। लोगों को लगा यह संसद है या कॉलेज की कैंटीन। सच में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रित गठबंधन की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर जिस तरह लोकसभा में बहस की शुरुआत हुई, उससे तो यही लगा कि विपक्ष के नेताओं के पास मुद्दे ही नहीं है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन पर राफेल सौदे पर बेसिरपैर के आरोप लगाए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इस मुद्दे पर निर्मला सीतारमन को सफाई का मौका दिया तो उन्होंने कागजात दिखाते हुए बताया कि यूपीए सरकार और फ्रांस सरकार के बीच सौदे की शर्तों को गोपनीय रखने का करार हुआ था। राहुल गांधी के पास निर्मला सीतारमन की सफाई पर कोई जवाब देते नहीं बना। राहुल को केवल नौटंकी करनी थी, उन्होंने की और सिंधिया को तरफ यही देखकर आंख मारी कि बना दिया पप्पू।
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा शुरुआत करते जिस तरह तेलुगू देशम पार्टी के सांसद जयदेव गल्ला ने कहा कि हम धमकी ने श्राप दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि अविश्वास प्रस्ताव की कोई जरूरत ही नहीं थी। भाजपा के राकेश सिंह ने आंकड़ों के साथ मजबूती से अपनी बात रखी। देश की जनता जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक आधार पर किसी प्रदेश, इलाके, वर्ग या समुदाय के साथ कोई भेदभाव नहीं करते हैं। उनका ही नारा है सबका साथ-सबका विकास। तेलुगू देशम के सदस्यों ने राजनीतिक समीकरणों के कारण ही मोदी सरकार पर हमला बोला है। आंध्र प्रदेश के साथ बुंदेलखंड से भी ज्यादा भेदभाव हुआ, इससे तो पूरे विपक्ष की धार को उन्होंने भौंथरा बना दिया। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड का जिस तरह से विकास हुआ, वह देश के सामने है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का योगी सरकार में तेजी से विकास हो रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने उनके भाषण पर उन्हें बधाई दी। राहुल गांधी इस कथन पर भाजपा के सदस्य केवल मुस्करा ही सकते थे। अकाली बादल की हरसिमरत कौर पर उन्होंने मुस्कराने की बात कही। उनकी इस बाद हरसिमरत ने कहा कि पप्पी-झप्पी लगने का इलाका नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्षी दलों के हमलों के बीच सहज रूप से मुस्कराते रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष के नेता जुमलेबाजी की बात करते रहे। केंद्र सरकार पर कोई ठोस आरोप नहीं लगा पाया। राहुल गांधी ने महिलाओं पर अत्याचार की बात की। उनका कहना था कि दुनिया में महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में छवि खराब हुई। राहुल जी यह भूल गए कि जितना ध्यान मोदी सरकार ने महिलाओं पर दिया, आज तक किसी सरकार ने नहीं दिया। पांच करोड़ परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन देकर उन्हें धुएं से मुक्ति दिलाई है। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों से बचाया गया है। अविश्वास चर्चा पर विपक्षी दलों की बहस को देखकर यही लगा कि इन दलों के पास मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं है। सदन में बहस को गिरता स्तर देखकर यही लगता है कि विपक्ष के नेता क्या चौराहे पर भाषण दे रहे हैं।
नाजुक मौकों पर सटीक निर्णय-मोदी के कायल हुए लोग

नाजुक मौकों पर सटीक निर्णय-मोदी के कायल हुए लोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों के प्रति संवेदनशीलता की झलक देश ने पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की रैली के दौरान पंडाल गिरने से घायलों को अस्पताल जाकर उनकी हालत देखने और हौंसला बंधाने पर देखी। पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के ऐतिहासिक शहर मेदिनीपुर में 16 जुलाई को आयोजित भाजपा की विशाल रैली कई मायनों में ऐतिहासिक रही। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से रैली में पंडाल गिरने से घायल हुए लोगों को लेकर संवेदनशीलता दिखाई, उसे लेकर लोग कायल हुए हैं। प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को देखने का यह पहला अवसर नहीं है, ऐसी बातें हम लोग पहले भी कई बार देख चुके हैं। संवदेनशीलता के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबो, किसानों, मजदूरों और महिलाओँ को अपनी नीतियों और योजनाओं में प्राथमिकता दी है। रैली में घायलों के इलाज और उनकी देखरेख की व्यवस्था पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष को सौंपकर ही प्रधानमंत्री रवाना हुए। रवाना होने के बाद भी प्रधानमंत्री लगातार घायलों की जानकारी लेते रहे। यह सब बातें मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुंची और लोगों ने प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को महसूस भी किया। रैली के दौरान पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने और अस्पताल पहुंचाने की संवेदनशीलता को भाजपा की रैली के दौरान मंच पर उपस्थित हम सब ने उनकी नाजुक मौके पर सूझबूझ, धैर्यता, कर्तव्यपरायणता और तुरंत फैसले की क्षमता को नजदीक से देखा। प्रधानमंत्री मोदी की छवि हमेशा उचित निर्णय लेने की रही है। संकट के समय सही फैसले लेकर वे हमेशा बाजी पलट देते हैं।

राजनीतिक हमलों को लेकर सटीक जवाब देने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने मंच से पंडाल गिरने के दौरान और बाद में जिस तरह सूझबूझ से निर्णय लिया और सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए, उससे एक बड़ा हादसा टल गया और कई लोगों की जानें बच गईं। पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपनी दूरदर्शिता के कारण किसी तरह की भगदड़ होने या अफरातफरी मचने का माहौल नहीं बनने दिया। हम लोगों को भी नाजुक मौके पर उनकी सूझबूझ, धैर्य और दृढ़ता के साथ कार्य करने से सीख मिलती है। हमें यह तो पता ही है कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं है। किसी कार्ययोजना में प्रधानमंत्री न की बजाय की संभावनाओं पर विचार करते हैं। हमने यह भी देखा है कि मोदीजी रैली में अतिउत्साही लोगों को खंभों पर चढ़ने से भी रोकते हैं। याद कीजिए पटना की 27 अक्टूबर 2013 को गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ‘हुंकार रैली’ की। रैली के पहले गांधी मैदान में पांच और पटना जंक्शन पर दो बम धमाके हुए। इन धमाकों में आधा दर्जन लोग मारे गए थे और 83 घायल हुए थे। उस समय गांधी मैदान खचाखच भरा हुआ था। अचानक धमाकों पर धमाकों होने लगे। मोदीजी धैर्य के साथ भाषण देते रहे। कोई भगदड़ नहीं मची। अगर भगदड़ मचती तो कई जाने जा सकती थीं।

लोगों ने यह तो देखा कि मेदिनीपुर में कृषक कल्याण सभा को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान मंच के बाईं ओर मुख्य प्रवेश द्वार के बगल में लगाया गया पंडाल अचानक गिर गया। उस समय सभा में ढाई लाख से ज्यादा लोग मौजूद थे। गिरने वाले पंडाल के नीचे ही 20 हजार से ज्यादा लोग बैठे हुए थे। इनमें महिलाओं की तादाद भी बहुत थी। पंडाल गिरने से 24 महिलाएं घायल हुईं है। सभा के दौरान रिमझिम बारिश के बीच प्रधानमंत्री मोदी मंच पर पहुंचे। दोपहर 12.30 बजे प्रधानमंत्री मंच पर पहुंचे, उस समय तक कॉलेजिएट मैदान खचाखच भर गया था। लोग उत्सुकता से प्रधानमंत्री को सुनने का इंतजार कर रहे थे। रैली के लिए तीन पंडाल बनाए गए थे। तीनों पंडालों के खचाखच भरने और भारी संख्या में लोगों के मैदान के बाहर जमा होने के कारण हम सब बहुत प्रसन्न थे। भाजपा की तरफ से इतनी विशाल रैली अभी तक पश्चिम बंगाल में नहीं हुई थी।

प्रधानमंत्री मोदी जब भाषण दे रहे थे तो उन्होंने पंडाल गिरते देख लिया था। अपने भाषण के बीच पंडाल गिरते हुए देखकर उन्होंने यह आभास नहीं होने दिया कि बड़ी दुर्घटना हो गई है। प्रधानमंत्री ने भाषण जारी रखते हुए लोगों से कहा भी कि कोई खास बात नहीं है। अपने भाषण के दौरान ही अपने सुरक्षा अधिकारियों और स्वास्थ्य सेवाओं में लगे अधिकारियों को तुरंत उन्होंने कुछ ही पलों में संदेश भी पहुंचा दिया। लोगों ने देखा कि अचानक प्रधानमंत्री ने कुछ सैंकिड के लिए एक सुरक्षा अधिकारी के कान में कुछ फुसफुसाया और फिर भाषण देने लगे। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए घायलों को निकालने का काम बिना शोरशराबे के शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री के निर्देश पर उनके साथ चलने वाले स्वास्थ्य विभाग के दस्ते ने भी घायलों का इलाज तुरंत शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री भाषण देते रहे और उन्हें घायलों की हर खबर लगातार अधिकारी पर्ची के माध्यम से देते रहे। भाषण के दौरान प्रधानमंत्री पर्ची पर नजर डालते हुए अपना भाषण देते रहे। प्रधानमंत्री ने एक पंडाल में जमा हुए 20 हजार लोगों के अलावा दो अन्य पंडालों में बैठे 2.30 लाख लोगों को इस दुर्घटना का आभास तक नहीं होने दिया। मंच पर बैठे लोगों को धुकधुकी लगी हुई थी कि कहीं भगदड़ न मच जाए, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अगर भगदड़ मच जाती तो एक बड़ी दुर्घटना हो सकती है। भागती भीड़ के कारण कुछ भी हो सकता था। कुछ लोग कुचल भी सकते थे। 55 मिनट बाद प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। तुरंत मंच से उतरकर प्रधानमंत्री प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को साथ लेते हैं और अस्पताल पहुंच जाते हैं। बिना सुरक्षा इंतजामों के बीच प्रधानमंत्री अस्पताल पहुंचने पर लोग हैरान हो जाते हैं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके प्रधानमंत्री उनका हालचाल पूछने अस्पताल पहुंच गए। प्रधानमंत्री ने अपनी इन्हीं खूबियों के कारण किसी तरह की अफरातफरी का माहौल ही नहीं बनने दिया। प्रधानमंत्री ने घायलों से उनका हालचाल जाना, उन्हें हिम्मत बंधाई और आटोग्राफ दिए। प्रधानमंत्री ने वाकई जनता का दिल जीत लिया। इसका एक दुखद पहलू यह भी है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस इस दौरान कहीं भी नहीं दिखाई। पश्चिम बंगाल सरकार कोई सबक लेने के बजाय इस मुद्दे पर राजनीति करने पर आमादा है।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं।

बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर लगे रोक, भारत की सभ्यता, कला और संस्कृति से समृद्ध भारतीय फिल्म उद्योग को किसी नकलची जैसे नाम की जरूरत नहीं ..

बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर रोक लगे

भारतीय फिल्मों की आज दुनियाभर में धूम मची हुई है। बाहुबलि दो और दंगल ने कमाई के मामले रिकार्ड तोड़ दिए। दंगल ने 1600 करोड़ से ज्यादा तो बाहुबलि दो ने लगभग २ हजार करोड़ का कारोबार किया । भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के अनुसार भारतीय फिल्म उद्योग का कारोबार 165 अरब से ज्यादा का हो गया है। दो दर्जन से ज्यादा भाषाओं और बोलियों में भारत में फिल्में बनती हैं। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा भारतीय सिनेमा जगत को उद्योग का दर्जा देने के बाद बहुत बदलाव आया है। भारतीय सिनेमा को संगठित माफिया से मुक्ति मिली है। अपराधियों के निवेश करने पर रोक लगी है। भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बन रही फिल्में नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। नई-नई तकनीक, कहानी और लोगों के बीच पहुंच बनाने के कारण फिल्में लोकप्रिय हो रही हैं।

कारोबार के नए कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद भारतीय सिनेमा पर विदेशी फिल्में और खासतौर पर हॉलीवुड की नकल करने के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में भारतीय सिनेमा की जानी-मानी हस्ती सुभाष घई ने एक मुलाकात में बताया कि मुंबई के सिनेमा जगत को बॉलीवुड कहने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीबीसी ने एक बार मुंबइयां फिल्मों को हॉलीवुड की नकल बताते हुए बॉलीवुड बताया था। मुंबई के फिल्म जगत ने बीबीसी के मजाक को अपनाते हुए मुंबई फिल्म जगत को बॉलीवुड कहना शुरु कर दिया। मीडिया ने इसे तेजी से बढ़ाया। हैरानी की बात है कि दादा साहब फाल्के, वी शांताराम, सत्यजीत रे, राजकपूर से लेकर नए-नए फिल्मकार दुनिया में भारतीय सिनेमा की एक अलग पहचान बनाने मे कामयाब हुए हैं और वहीं हम गुलामी के प्रतीक और नकलची होने का तमगा लगाए बॉलीवुड शब्द को ढोने पर खुश हो रहे हैं। मुंबई फिल्मजगत की नकल करते हुए तेलुगू फिल्म जगत को टॉलीवुड, तमिल फिल्म इंडस्ट्री कॉलीवुड, मलयाली फिल्मी दुनिया को मॉलीवुड, कन्नड़ फिल्म उद्योग को सैंडलवुड और पंजाबी फिल्म जगत को पॉलीवुड कहा जा रहा है। इस सबसे यही साबित हो रहा है कि भारतीय फिल्में हॉलीवुड की नकलची है।

दुनियाभर में भारतीय फिल्मों की साख बढ़ रही है और हम खुद गुलाम मानसिकता के कारण अपने को नकलची साबित कर रहे हैं। बड़े बजट की फिल्मों की तुलना अगर हम छोटे बजट की फिल्मों के साथ करें तो स्थिति बहुत अच्छी है। छोटे बजट की फिल्में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। भारतीय फिल्मों की पुरानी कहानियों को छोड़ कर छोटे बजट की नई-ऩई फिल्मों ने बेहतर प्रदर्शन नए-ऩए कलाकारों को आगे बढ़ने का मौका दिया है। ऐसे में हमें अपनी मौलिकता को बढावा देने के लिए बॉलीवुड, टॉलीवडु, क़ॉलीवुड, मॉलीवुड से जैसे गुलामी के प्रतीक शब्दों से निजात पाना होगा। हम ऐसे शब्द प्रयोग करें, जिससे भारत की सभी भाषाओं और बोलियों की फिल्मों को प्रतिष्ठा मिले।

बॉलीवुड शब्द से फिल्मी जगत की जानी-मानी हस्तियां खुश है ऐसा भी नहीं है। अमिताभ बच्चन, कमल हासन जैसे बड़े कलाकार पहले ही बॉलीवुड शब्द को लेकर खुश नहीं है। अमिताभ बच्चन तो कई बार इस शब्द को लेकर नाखुशी जता चुके हैं। कमल हासन भी बॉलीवुड शब्द से बहुत चिढ़ते हैं। मुलाकात में सुभाष घई ने भी बॉलीवुड शब्द को लेकर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी फिल्म जगत के अलावा अन्य फिल्मों के लोग भी बॉलीवुड जैसे तमगे को बदलकर भारतीय फिल्म जगत जैसा शब्द चाहते हैं। अब समय आ गया है कि गुलाम मानसिकता के प्रतीक बॉलीवुड के प्रयोग को पूरी तरह बंद कर दें। इस कार्य में फिल्म उद्योग के लोगों की बड़ी भूमिका होगी। उन्हें तुंरत इस शब्द का प्रयोग बंद करके भारतीय फिल्में, हिन्दी फिल्में, मराठी फिल्में, बंगाली फिल्में, तमिल, तेलुगू, मलायम, कन्नड की फिल्में, भोजपुरी, पंजाबी, गुजराती, असमी, ओडिसी आदि फिल्में कहना शुरु करेंगे तो हमारी भाषाओं और बोलियों को दुनियाभर में ज्यादा मान-सम्मान मिलेगा। गुलाम मानसिकता से निकलने के लिए मीडिया के लोगों को भी आगे आना होगा। मीडिया ने भी हॉलीवुड की तर्ज पर बनने वाली फिल्मों के मजाक उड़ाने के सिलसिले को बॉलीवुड जैसे शब्दों के इस्तेमाल को बढ़ाया है । फिल्म उद्योग से जुड़े सभी लोगों को भारतीय फिल्मों की अस्मिता को बचाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस दिशा में कार्य करना होगा।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जिस तरह 1998 में भारतीय सिनेमा को उद्योग का दर्जा देकर कई नई दिशा दी, उसी तरह अब भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड की नकलची होने के आरोप से निकालने के लिए इस तरह के शब्दों पर रोक लगाने की शुरुआत करनी होगी। हम सब जानते हैं कि संगठित अपराधियों के चंगुल में फंसे भारतीय सिनेमा को उबारने के लिए राजग सरकार ने उद्योग का दर्जा दिया है। उद्योग का दर्जा मिलने के बाद फिल्मों के निर्माण में बैंकों से पैसा मिलने लगा तो गैरकानूनी धंधे में लगे लोगों का निवेश कम होता गया। फिल्म जगत माफिया सरगनाओं से भी मुक्ति मिली है। अब यही सही समय है कि फिल्म उद्योग को गुलामी के प्रतीक को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर हॉलीवुड की नकलची होने के तमगे से बचाना होगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं।)

राहुल जी, स्वस्थ राजनीति करने के लिए आप भी फिटनेस मन्त्र को अपनाइए.ये देश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य के लिए है बिना किसी नुकसान के ...

फिटनेस अच्छी सेहत के लिए है … राजनीति के लिए नहीं

केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने लोगों को फिट रखने के लिए एक मुहिम शुरु की है। उन्होंने ट्वीटर पर एक वीडियो अपलोड किया है। इस वीडियो में वह अपने दफ्तर में व्यायाम करते दिखाई दे रहे हैं। हम फिट तो इंडिया फिट हैशटेग से उन्होंने फिटनेस चैलेंज शुरु किया है। चैलेंज के लिए राठौड़ ने लोगों से व्यायाम करते हुए अपना-अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर जारी करने की अपील की है। उनका कहना है कि ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली है। प्रधानमंत्री के लगातार देश की जनता के लिए काम करने की सक्रियता से प्रेरित राज्यवर्धन कहते हैं कि प्रधानमंत्री में जबरदस्त ऊर्जा है। प्रधानमंत्री दिन-रात लगातार काम करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री से प्रेरित होकर चाहता हूं सभी लोग अपना व्यायाम करते हुए वीडियो बनाए और दूसरों को प्रेरित करें। हम सब स्वस्थ रहें, इस ध्येय को लेकर ही राज्यवर्धन ने यह मुहिम शुरु की है।

महात्मा गांधी हमेशा अरस्तु के इस कथन से कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है, लोगों को स्वस्थ और स्वच्छ रहने की प्रेरणा देते थे। महात्मा गांधी ने स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और संयम से जीने का मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि स्वस्थ वहीं है जिसे कोई बीमारी न हो। उन्होंने लोगों को ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की प्रेरणा दी। स्वच्छ रहने के साथ ही उन्होंने शरीर को सही रखने के लिए सप्ताह में एक दिन उपवास करने और शाहाकारी बनने के लिए लोगों को मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि दिन में इतना परिश्रम करें कि रात को लेटते ही नींद आ जाए। ओलंपिक में रजत पदक हासिल करने वाले राज्यवर्धन ने स्वस्थ रहने के लिए लोगों को हम फिट तो इंडिया फिट मुहिम चलाई है। अपनी मुहिम के लिए उन्होंने विराट कोहली, रितिक रोशन और सायना नेहवाल को चैलेंज दिया था। उनके चैलेंज को स्वीकार करते हुए विराट कोहली ने कसरत की और मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए महेंद्र सिंह धोनी, अपनी पत्नी और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज दिया। विराट ने लिखा भी कि ”मैं राठौर सर का दिया फिटनेस चैलेंज स्वीकार करता हूं। अब मैं ये चैलेंज अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा, हमारे पीएम नरेंद्र मोदी और धोनी भाई को देता हूं। विराट कोहली की इस पहल पर सबसे पहले पीएम मोदी का ट्वीट आया और उन्होंने लिखा कि विराट का चैलेंज स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है कि विराट का चैलेंज स्वीकार है। मैं जल्द ही वीडियो के जरिए अपना फिटनेस चैलेंज शेयर करूंगा।

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह चैलेंज स्वीकार करना नहीं भा रहा है। राहुल गांधी ने फिटनेस मंत्र पर राजनीति शुरु कर दी है। अपने को महात्मा गांधी का अनुयायी बताने वाले कांग्रेस के नेता राज्यवर्धन की लोगों को स्वस्थ रखने की मुहिम से पता नहीं क्यों इतने परेशान हो गए हैं ? राहुल गांधी ने हम फिट तो इंडिया फिट’ चैलेंज अब राजनीतिक चैलेंज में तब्दील कर दिया। राहुल गांधी ने कहा कि “मुझे यह देखकर खुशी हुई कि आपने विराट कोहली का चैलेंज मंजूर किया। एक चैलेंज मेरी तरफ से भी। पेट्रोल-डीजल के दाम घटाएं, नहीं तो फिर कांग्रेस देशभर में आंदोलन करेगी और आपको ऐसा करने के लिए मजबूर करेगी, आपके जवाब का इंतजार रहेगा। राहुल गांधी को राजनीति करने के लिए केवल आलोचना ही करनी है। होना तो यह चाहिए था कि देश के लोगों को जागरूक करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को प्रधानमंत्री की पहल का स्वागत करना चाहिए। महात्मा गांधी जानते थे कि गांवों में रहने वाले गरीब लोग रोजी-रोटी के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं और उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रहता है। इसीलिए उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा पर जोर दिया। लोगों को संयमित जीवन का मंत्र दिया।

हमारे देश में स्वस्थ रहने के लिए जागरुकता बढ़ी है। हर शहर में सुबह-शाम पार्कों में सैर करने वालों की संख्या बढ़ी है। लोगों की योग और ध्यान में लगातार दिलचस्पी बढ़ी है। दफ्तरों में भी फिट रहने के लिए जिम बनाए गए हैं। भागदौड़ की जिंदगी में लोग स्वस्थ रहे इसके लिए बार-बार जागरूकता बढ़ाई जा रही है। हम देख रहे हैं कि भागदौड़ की जिंदगी में युवा बीमार हो रहे हैं। युवाओं में मधुमेह और दिल की बीमारी बढ़ी है। हाल ही में 13 साल के एक बच्चे की मधुमेह से मौत हो गई। ऐसे हालातों में स्वस्थ रहने के लिए अगर खेल मंत्री स्वस्थ रहने का मंत्र दे रहे हैं तो इसमें आलोचना की करने का क्या बात है? राहुल की देखादेखी राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव भी राजनीति करने लगे। युवा नेताओं का तमगा लगाने वाले इन नेताओं को कम से कम सेहत के मुद्दे पर तो राजनीति नहीं करना चाहिए। लगता तो यही है कि गांधीजी के नाम पर राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता उनके स्वस्थ रहने के मूलमंत्र को भूल गए। राहुल गांधी आप भी रोजाना व्यायाम करें ताकि स्वस्थ शरीर के साथ आपका मस्तिष्क भी स्वस्थ रहे। देश की सेहत के लिए यह बहुत जरूरी है।

लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक विषयों पर बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया। कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी। कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कर्नाटक में शपथ ग्रहण पर नहीं लगी रोक

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया।

कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी।

कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

माननीय नरेंद्र मोदी जी ने बंगाल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को लेकर चिंता प्रकट कर इस ओर सभी को एकजुट हो विचार करने पर ध्यान आकर्षित किया है।

पश्चिम बंगाल- लोकतंत्र के सीने में घाव ,चिंतनीय।PM नरेंद्र मोदी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा, आगजनी, बमधमाके, लूटमार, सरकारी तंत्र की मनमानी आदि को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के मतदान के दिन ही 19 लोगों की मौत हुई। उसके अगले दिन हुई हिंसा में पांच और लोग मारे गए। मतदान के दिन ऐसा कोई इलाका नहीं था जहां हिंसा न हुई हो। खूनी चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री ने यह अपील भी की है कि लोकतंत्र के सीने पर घाव देने वाले विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा। उन्होंने नामांकन से लेकर मतदान तक की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई और कहा कि पंचायत चुनाव में लोकतंत्र की हत्या की गई है। बंगाल की पिछली शताब्दी को देखें जिसने  देश को मार्गदर्शन देने का काम किया है। ऐसी महान भूमि को राजनीतिक स्वार्थ के लिए लहुलूहान कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल की जनता का दुख सबके सामने रखा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी, मनमानी और विपक्षी दलों पर अत्याचारों को लेकर सभी राजनीतिक दल आक्रोश जता रहे हैं। रोजाना जगह-जगह विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। मतदान के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता, प्रशासन और पुलिस हत्या, आगजनी, बम धमाके आदि की घटनाओं को मामूली बता रहे हैं।

दुनियाभर में भारत के लोकतंत्र के उदाहरण दिए जाते हैं, लेकिन यहां हाल ही में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में धनबल के बढ़ते इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद की गई। साथ ही 24.43 लाख रुपये की 5 लाख 26 हजार 766 लीटर शराब जब्त की गई है। इसके अलावा व्हिस्की की 8640 बोतलें भी जब्त की गई हैं। चुनाव आयोग के अनुसार चार करोड़ से ज्यादा का सोना भी पकड़ा गया।14 करोड़ 91 लाख 62 हजार 715 रुपये कीमत के अन्य सामान भी बरामद किए गए हैं। 219 वाहनों को जब्त भी किया गया है। कर्नाटक के राजराजेश्वरी नगर विधानसभा क्षेत्र के एक फ्लैट से दस हजार मतदाता पहचान पत्र बरामद होने के बाद चुनाव आयोग ने इस सीट पर मतदान स्थगित कर दिया है। अब इस सीट पर 28 मई को मतदान होगा। आयोग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिये तमाम वस्तुयें बांटने और भारी मात्रा में फर्जी मतदाता पहचान पत्रों की बरामदगी जैसी अन्य घटनाओं की शिकायतें शुरुआती जांच में ठीक पाये जाने के बाद यह फैसला किया है। राजनीतिक दलों के बीच कुर्सी कब्जाने की होड़ के कारण चुनाव में धन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुना खर्च हुआ है। जाहिर है चुनाव आयोग की सख्ती से सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद होने के बावजूद चुनाव में धन का इस्तेमाल हुआ।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि कोई चुनाव जीते, कोई हारे लेकिन ‘लोकतंत्र के सीने पर घाव उभारने के विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा, सभी को सोचने पर मजबूर करता है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में 34 फीसदी सीटों पर विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन ही नहीं करने दिया गया। नामांकन न करने देने और अन्य शिकायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट को पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि निष्पक्षता नहीं बरती जा रही है। मतदान के दौरान हिंसा रोकने के निर्देश देने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने पूरे इंतजाम नहीं किए। यह सब बूथों पर जबरन कब्जा करने के लिए किया गया। बूथों पर कब्जे के दौरान तमाम स्थानों पर पुलिस वाले मूकदर्शक बने रहे।

मतदान के दिन विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को जिंदा जला दिया गया। कुछ स्थानों पर हिंसा मतदान के दो दिन बाद भी जारी है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों की चेतावनी न मानने वाले लोगों के घरों को जलाया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वालों को धमकी के कारण दूसरे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों में लौटने से डर रहे है। भाजपा के अलावा माकपा के प्रमुख नेताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का विरोध किया है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी सरकार की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं पर बड़े नेता चुप क्यों हैं?

अब समय आ गया है कि रक्तरंजित चुनावों को लेकर सभी को सोचना है। क्या कोई शासक दल कुर्सी कब्जाने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेता रहेगा ? तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वाले लोगों को घऱों में रहना दूभर हो गया है। उनके कारोबार को बंद कराया जा रहा है। घरों को जलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में लहूलुहान लोकतंत्र की तरफ देश का ध्यान आकर्षित किया है। प्रधानमंत्री की चिंता को लेकर अब समाज के सभी वर्गों को इस मुद्दे पर सोचना होगा।

लोकतंत्र का काला अध्याय पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव ,हिंसा

प बंगाल- लोकतंत्र की हत्या

दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र की शक्ति का डंका बजता है। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत के चुनावों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को नामांकन भरने के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने पर फटकारा भी। राज्य चुनाव आयोग की पहले नामांकन की तारीख बढ़ाने और फिर वापस लेने के फैसले पर भी सवाल उठाये। पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन भी नहीं किया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में पंचायत के चुनाव के दौरान आम लोगों के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। चुनाव में नामांकन भरने के दौरान हिंसा का सहारा लेकर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सरकार और पुलिस के संरक्षण में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को नामांकन भरने से रोका। भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों के उम्मीदवारों को डराने के लिए बम फेंके गए, सरेआम पिटाई की गई, दलों के दफ्तर फूंक दिए गए। राज्य चुनाव आयोग द्वारा नामांकन भरने से रोकने की शिकायतों के बावजूद राज्य चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को 34 फीसदी से ज्यादा यानी 20 हजार पंचायत सीटों पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र में इतिहास में एक काला अध्याय माना जाएगा।

इस तरह से पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक गुंडों ने हिंसा फैलाकर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को चुनाव में हिस्सा न लेने देने के लिए प्रशासन और पुलिस ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का पूरा साथ दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की सरकार में महिलाओं की इज्जत भी लगातार तार-तार हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी की ताजा घटना ने सब को झकझोर कर रख दिया है। नादिया की एक महिला भाजपा प्रत्याशी के घर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने मारपीट की। प्रत्याशी के न मिलने पर उनकी छह महीने की गर्भवती देवरानी के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं इस कृकत्य को छिपाने के लिए सरकारी अस्पताल ने ममता बनर्जी के डर से उसका इलाज करने से भी मना कर दिया। इस गर्भवती महिला का इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा है और बच्चे के जीवित बचने की संभावना न के बराबर है। चुनाव में जीत का परचम फहराने के लिए तृणमूल समर्थकों द्वारा दलितों और अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या कर ममता बनर्जी पंचायत चुनाव में किसी भी तरह जीत दर्ज कर अगले लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर दावा पेश करने वाली हैं। हैरानी की बात है कि हाई कोर्ट के तमाम निर्देशों के बावजूद पंचायत चुनाव में सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। हत्या, मारपीट, बमबारी और बलात्कार की लगातार जारी घटनाओं के बीच सरकारी संरक्षण में तृणमूल समर्थकों ने पंचायत चुनाव में एक तिहाई सीटों पर जीत हासिल कर ली है। कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए सत्ता हासिल करने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अब उन्हें भी विरोधियों का खात्मा करने की नीति में पीछे छोड़ दिया है।

राज्य चुनाव आयोग ने जानकारी दी है कि तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में 34.2 फीसदी सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है। इसी तरह का खेल 2003 के पंचायती चुनावों में कम्युनिस्टों की सरकार के समय खेला गया था। तब कम्युनिस्टों ने 11 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबले के जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी कम्युनिस्टों से तीन गुणा ज्यादा बढ़ गई हैं, इस कारण कम्युनिस्टों के मुकाबले उनका पतन भी जल्दी होगा। अबकी बार तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में लगभग 20 हजार सीटों पर जीत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सभी जिलों में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वाममोर्चो के कार्यकर्ताओं को चुनाव में नामांकन करने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया। जहां-जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नामांकन भरा, वहां उन्हें भगाने की कोशिश की गई। घरों में तोड़फोड़ की गई। बड़ी संख्या में भाजपा समर्थकों को दूसरी जगह जाकर शरण लेनी पड़ रही है। तृणमूल समर्थकों की बमबारी, हत्या, बलात्कार आदि की घटनाओं के बावजूद भाजपा ने पंचायत चुनाव में नामांकन करने में कम्युनिस्टों को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा की बढ़ती ताकत के कारण निर्विरोध जीते गए हमारे उम्मीदवारों को धमकाकर तृणमूल में शामिल करने की कोशिश की जा रही है।

 

पश्चिम बंगाल में 3,358 ग्राम पंचायतों की 48,650 सीटों, 341 पंचायत समितियों की 9,217 सीटों और 20 जिला परिषदों की 825 सीटों 14 मई को होने वाले चुनाव पर कलकत्ता हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद संशय है। लेकिन पंचायत चुनाव में दाखिल नामांकन पत्रों को देखे तो तृणमूल की तरफ से एक हजार, भाजपा ने 782, माकपा ने 537 और कांग्रेस की तरफ से 407 पर्चे सही पाए गए हैं। पंचायत समितियों के लिए तृणमूल कांग्रेस के 12,590 उम्मीदवार, भाजपा के 6,149, माकपा के 4400 और कांग्रेस के 1740 उम्मीदवार मैदान में हैं। ग्राम पंचायतों के लिए तृणमूल ने 58,978, भाजपा ने 27,935, माकपा ने 17,319 और कांग्रेस ने 7,313 नामांकन दाखिल किए हैं। उम्मीदवारों की संख्या में तो भाजपा ने कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों को पीछे छोड़ ही दिया है साथ ही तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का जवाब देने में में भाजपा ने पूरी हिम्मत दिखाई है। भाजपा के कार्यकर्ता तृणमूल समर्थकों की तमाम कोशिशों के बावजूद नामांकन पत्र भरने में सफल रहे हैं पर तृणमूल उम्मीदवारों के 34 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबला जीतने की घोषणा से पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पर्याप्त सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही  है। केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने की बजाय दूसरे राज्यों से फोर्स मांगी जा रही है। पंचायत चुनाव के लिए 58 हजार से ज्यादा बूथों पर मतदान होगा और राज्य के पास 46 हजार हथियार वाले और 12 हजार लाठीदार पुलिस वाले हैं। सरकार के पास एक बूथ पर दो सुरक्षाकर्मी तैनात करने का इंतजाम भी नहीं है। जब नामांकन भरने के दौरान जितनी हिंसा तृणमूल समर्थकों ने फैलाई है, उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि मतदान के दिन क्या हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से पूरी कोशिश हो रही है कि विरोधियों का चुनाव से सफाया कर दिया जाए। हिंसा की तमाम घटनाओं के खिलाफ जगह-जगह भाजपा, माकपा और कांग्रेस की तरफ से धरना-प्रदर्शन भी हुए पर वामदलों और कांग्रेस के बड़े नेताओं की चुप्पी क्या साबित कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी बार-बार ममता बनर्जी की तारीफ तो कर रहे हैं पर अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई पर चुप क्यों हैं। इसी तरह वामदलों के नेताओं ने भी ममता सरकार पर कोई हमला नहीं बोला है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की ममता सरकार की मनमानी का जवाब दे रही है। ममता बनर्जी के पूरी तरह से राहुल गांधी को नकारने के बावजूद उनकी चुप्पी क्या साबित कर रही है। शायद विपक्षी दलों की एकता के नाम पर राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की बलि देना भी मंजूर कर लिया है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या को लेकर उठे सवालों का जवाब वहां की जनता आने वाले दिनों में जरूर देगी।

BJP

विचारधारा का बढ़ता दायरा

भारतीय जनता पार्टी 38 वर्ष में 11 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के साथ आज दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। भाजपा के तौर पर हमारी राजनीतिक यात्रा चाहे 38 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई हो वास्तव में हमारी राजनीतिक जड़े 1951 में जनसंघ की स्थापना के समय से ही पूरे देश में विकसित होती रहीं हैं। 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक परम पूज्यनीय गुरु गोलवलकर जी की प्रेरणा से 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। डॉ.मुखर्जी पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में उद्योग और आपूर्ति मंत्री थे। डॉ. मुखर्जी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली और नेहरू के बीच हुए समझौते से नाराज होकर 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। 1951-52 के पहले आमचुनाव में डॉ.मुखर्जी सहित जनसंघ के तीन सदस्य चुने गए थे।

 

जम्मू-कश्मीर में हर भारतीय से अनुमति पत्र लेने के निर्णय के विरोध में डॉ.मुखर्जी ने 1953 में सत्याग्रह प्रारम्भ किया और बिना अनुमति कश्मीर पहुंचे। कश्मीर में गिरफ्तारी के बाद 22 जून 1953 में वे देश के लिए न्यौछावर हो गए। डॉ.मुखर्जी के बलिदान के बाद देश में हजारों कार्यकर्ताओं ने जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना खून बहाया। आज भाजपा के 15 राज्यों में मुख्यमंत्री हैं और छह राज्यों में हम मिलीजुली सरकारें चला रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बार-बार कहा है कि यह सब हमारे कार्यकर्ताओं के बलिदान और परिश्रम के कारण हुआ है।

 

विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा ही कार्यकर्ताओं की एकमात्र पार्टी है। देश में एकमात्र लोकतांत्रिक दल भाजपा ही है। कांग्रेस समेत ज्यादातर दल आज वंशवाद और जातिवाद के आधार पर राजनीति में टिके रहने की कोशिश रहे हैं तो भाजपा सबका साथ-सबका विकास नारे को लेकर चप्पे-चप्पे पर छा रही है।

 

देश में आज राष्ट्रपति,  उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और 15 राज्यों में मुख्यमंत्री भाजपा के कार्यकर्ता हैं। छह राज्यों में सहयोगी दलों की सरकारें हैं लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। राज्यसभा में 69 सदस्यों के साथ भाजपा सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। राज्यसभा में पहली बार भाजपा के 69 सदस्य पहुंचे हैं। यह सब भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की तपस्या का परिणाम है। हमारे नेताओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण, बलिदान और त्याग के कारण ही आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

 

डॉ.मुखर्जी के बाद जनसंघ को विस्तार को कुछ झटका तो लगा पर कार्यकर्ताओं के दम पर पार्टी बढ़ती रही है। जनसंघ को दूसरा झटका पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बलिदान से लगा। देश की आजादी के बाद देश की एकता और अखंडता के लिए किसी भी राजनेता का ये पहला बलिदान था। पंडित दीनदयालजी की हत्या के बाद माननीय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिह भंडारी, प्यारेलाल खंडेलवाल और अन्य नेताओं के मार्गदर्शन में जनसंघ आगे बढ़ती रही। 1975 में आपातकाल में सबसे ज्यादा अत्याचार राष्ट्रीय सेवक संघ और जनसंघ के कार्यकर्तांओं ने सहे। 1977 में देश में लोकतंत्र की स्थापना की खातिर जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। लंबे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 6 अप्रैल 1980 को भाजपा की स्थापना हुई और अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। भाजपा डॉ.मुखर्जी के आदर्शों और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मार्ग पर आगे बढ़ती रही। भाजपा पर इस दौरान कई संकट आए पर धीरे-धीरे भाजपा का असर पूरे देश में बढ़ता रहा।

 

2004 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के बाद केंद्र पर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का कब्जा रहा। 2014 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने नया इतिहास रचा। लोकसभा में पहली बार भाजपा को 282 सीटों पर कामयाबी तो मिली साथ ही 30 साल बाद किसी राजनीतिक दल को भी सदन में पूर्ण बहुमत मिला। माननीय मोदीजी के नेतृत्व में देश को ऐसी पहली सरकार भी मिली कि जिसके किसी मंत्री पर कोई दाग नहीं लगा पाया।

 

मोदी सरकार ने वोट बैंक की परवाह न करते हुए नोटबंदी, कालेधन के खिलाफ कार्रवाई, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने जैसे फैसले किए। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, महिला, बुजर्ग, बच्चे और समाज के कमजोर तबकों की तरक्की के लिए योजनाओं की शुरुआत की। यही कारण है मोदी सरकार के कार्यों और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जमीनी राजनीतिक रणनीति के कारण पार्टी के 2014 के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में भाजपा की मुख्यमंत्री बने। गोआ और गुजरात में फिर से भाजपा जीती। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा सरकारें हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस अब केवल कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और पुद्दूचेरी तक सिमट गई है। कम्युनिस्टों का लगातार पतन हो रहा है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद कम्युनिस्टों की सरकार अब केवल केरल में है। जाति और मजहब को लेकर राजनीति करने वाले दल भी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान हैं। देश में तीसरे मोर्चे बनाने की कवायद चल रही है।

 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में पार्टी की सरकार बनने के बाद कहा था कि अभी भाजपा का स्वर्ण युग नहीं आया है। उन्होंने कहा है कि केरल, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी का स्वर्ण युग आएगा। इस समय कर्नाटक में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि वहां भाजपा की सरकार बनेगी। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान होकर कभी दिल्ली की तरफ दौड़ लगाती है तो कभी दूसरे राज्यों में विपक्षी नेताओं से फोन पर बात करती हैं। भाजपा के खिलाफ आवाज उठाने वाली ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का गला घोंट दिया है।

 

भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को झूठे मामले बनाकर जेल भेजा जा रहा है। भाजपा कार्यकर्तोओं पर जानलेवा हमले किए जा रहे हैं। हमारे कई कार्यकर्ताओं हिंसक वारदातों में बलिदान हुए हैं। कर्नाटक, केरल जैसे राज्यों में भी हमारे कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक में कहा भी है कि कार्यकर्ताओं का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

 

भाजपा स्थापना दिवस पर देशहित हेतु सदैव बलिदान देने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को भावभीनी श्रद्धाजंलि। साथ ही भाजपा की राजनीतिक यात्रा में भागीदार बने, करोड़ो साथियों को नए संघर्ष हेतु शुभकामनाएं।

 

आईए! देश में नई राजनीति का प्रारम्भ करने वाले मोदी और शाह की अगुवाई में हम अभी से आगामी आमचुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए एकजुट होकर लग्न के साथ कार्य करें।

आओ, नव संवत पर उत्सव मनाएं!

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हमारा नव संवत प्रारम्भ होगा। 18 मार्च 2018 को भारत के विभिन्न प्रांतों में नवदुर्गा की आराधना के साथ ही नव संवत्सर मनाया जाएगा। आप सभी को नव संवत 2075 की बहुत बहुत शुभकामनाएं। आजकल कुछ कारणों से अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार हर साल 31 दिसंबर की रात को नया साल मनाने की परम्परा तेजी से बढ़ी है। हम लोग रात के गहरे अंधकार में नए साल का स्वागत करते हैं। क्या रात को हम नए वर्ष की शुरुआत कर सकते हैं? कुछ वर्षों से यह बात भी देखने में आई हैं कि बड़ी संख्या में अंग्रेजों के नए साल पर बधाई या शुभकामना के संदेश में लोगों ने यह भी कहा कि अपना नया वर्ष तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरु होगा। नव संवत्सर का शुभारम्भ आईये हम उत्सव मनाकर करें।

भारत में नव संवत को पर्व या त्योहार की तरह मनाने की प्राचीन परम्परा है, जो कुछ कारणों से हम भूल गए। हिन्दू पंचांग पर आधारित विक्रम संवत या संवत्सर उज्जनीयि के सम्राट विक्रमादित्य ने प्रारंभ किया था। कल्प, मनवंतर, युग, संवत्सर आदि कालगणना का आधार माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि भारत का सबसे प्राचीन संवत है कल्पाब्ध। सृष्टि संवत और प्राचीन सप्तर्षि संवत का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। युग भेद से सतयुग में ब्रह्म-संवत, त्रेता में वामन-संवत और परशुराम-संवत तथा श्रीराम-संवत, द्वापर में युधिष्ठिर संवत और कलि काल में कलि संवत एवं विक्रम संवत प्रचलित हुए। पुराणों में उल्लेख है सतयुग का प्रारम्भ नव संवत से ही हुआ था। इसका उल्लेख अथर्ववेद तथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलता है। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि से कलियुग संवत का प्रारम्भ हुआ था। पुराणों में बताया गया है कि नव संवत को ही भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। भगवान राम का राज्याभिषेक भी नव संवत के दिन हुआ था।

यह माना जाता है कि इन सबके आधार पर सम्राट विक्रमादित्य ने संवत्सर को काल गणना के आधार पर प्रारम्भ कराया था। हैं। संवत्सर यानी 12 महीने का कालविशेष। उस समय उज्जनीयि के नागारिकों के लिए सम्राट की तरफ से कई घोषणाएं की थी। गरीबों को उपहार दिए गए। ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। पुराणों में वर्णन है कि नव संवत पर देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों आदि की पूजन किया जाता था। पूजन के माध्यम से हम सुख, समृद्धि, शांति, आरोग्य और सामर्थ्य की कामना करते हैं। नव संवत पर देवी उपासना से रोगों से मुक्ति है, शरीर स्वस्थ रहता है। भारत के प्रांतों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक प्रथम सर संघचालक परम पूज्यनीय डॉ. केशवराव हेडगेवार का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 1946 (1 अप्रैल 1889) को हुआ था।

नव संवत को उत्सव की तरह मनाएं। घरों को रंगोली से सजाए। दिन का प्रारम्भ मां दुर्गा की आऱाधना से शुरु करें। रात को घरों में मिट्टी के दिए जलाएं। बंधु-बांधवों के साथ भजन-कीर्तन करें और उपहार के तौर पर प्रसाद बांटे। दिन में परिवार के साथ बैठकर खीर, पूड़ी, हलवा और पकवान ग्रहण करें। प्राचीन भारत की गरिमा को स्मरण करने के लिए गोष्ठियों का आयोजन करें। आईये, नव संवत पर हम सब भारतवासी अपने देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एक साथ मिलजुल कर काम करने का संकल्प लें। यह अवसर ऐसा होगा कि जब हम अपनी जड़ों की तरफ लौटेंगे तो हमें वैज्ञानिक आधार पर बने संवत के अनुसार कार्य प्रारम्भ करने से अपने – अपने लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। इसी संकल्प के साथ एक बार सभी देशवासियों को नव संवत पर बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

– कैलाश विजयवर्गीय

त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय- मोदी-शाह के कार्यों ने दिलाई सबसे बड़ी जीत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति ने त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत गढ धराशायी कर दिया।

मेघालय और नगालैंड में भाजपा गठबंधन की बड़ी जीत हुई है। कांग्रेस का त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सफाया हो गया। त्रिपुरा में तो कांग्रेस को कोई सीट ही नहीं मिली। त्रिपुरा की 20 जनजाति सीटों में कम्युनिस्ट एक भी सीट नहीं जीत पाए।

2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 फीसदी वोट मिले थे और इस बार केवल दो फीसदी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत, अब तक सबसे बड़ी जीत है।

त्रिपुरा में कम्युनिस्टों के सफाये ने साबित कर दिया है कि किसी भी राज्य में अब जनता निरकुंश सरकारों को सहन नहीं करेगी। यह दिखाई दे रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार और ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार भी अब चलता होगी। त्रिपुरा में भाजपा की जीत ने पश्चिम बंगाल और केरल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं का हौंसला बुलंद कर दिया है। हमें पूरी उम्मीद है आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए पूरी ईमानदारी से कार्य किया। असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के बाद अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भी भाजपा की सरकारें होंगी। नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली पूर्वोत्तर के विकास पर ध्यान दिया। पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में रही सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाने वाली राशि का इस्तेमाल ही नहीं किया।
जनता विकास के लिए तरसती रही। मोदी सरकार के कार्यों और नीतियों में आस्था जताते हुए त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड की जनता ने यह एतिहासिक निर्णय सुनाया है। अगर त्रिपुरा की बात करें तो वहां पिछले 25 साल से माकपा की सरकार थी। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने प्रपंच करके अपनी छवि एक साधारण और ईमानदार नेता की बना रखी थी। जनता ने उनके भ्रष्टाचार और निरकुंश होने की पूरी पोल खोल दी है। सभी जानते हैं कि त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पहले ताकत के बल पर चुनावों में धांधली करके जीतते रहे हैं। इस बार जनता ने राज्य में कम्युनिस्टों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए कम्युनिस्टों को चुनावों में धांधली करने का मौका ही नहीं दिया।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी त्रिपुरा में ऐसी चुनावी रणनीति बनाई कि कम्युनिस्ट धराशायी हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को बार-बार त्रिपुरा भेजा। बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों में मंत्रियों ने दौरे किए। जनता से मुलाकात की, उनकी समस्याओं का जाना और निराकरण किया। पहली बार पूर्वोत्तर की जनता ने प्रधानमंत्री को बार-बार इतने नजदीक से देखा।

प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को पूरे देश की पार्टी बना दिया है। ध्यान देने वाली बात है कि 2013 के चुनाव में भाजपा को कम्युनिस्टों के गढ़ में केवल डेढ़ फीसदी वोट मिले थे। इस बार भाजपा गठबंधन को लगभग 50 फीसदी मत मिले हैं।

भाजपा को खुद 42 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह त्रिपुरा की आधी जनता ने भाजपा वोट दिया है। पहले कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल से साफ और अब त्रिपुरा से, बस अब बचे हैं केरल में हैं। अब देश की जनता विकास के एजेंडे पर चलना चाहती है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय की जनता ने बता दिया है कि अब उन्हें विकास करने वाली सरकारें चाहिए। ये तीनों राज्य भी केंद्र सरकार के साथ मिलकर तेजी से विकास की तरफ बढेंगे।