बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर लगे रोक, भारत की सभ्यता, कला और संस्कृति से समृद्ध भारतीय फिल्म उद्योग को किसी नकलची जैसे नाम की जरूरत नहीं ..

बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर रोक लगे

भारतीय फिल्मों की आज दुनियाभर में धूम मची हुई है। बाहुबलि दो और दंगल ने कमाई के मामले रिकार्ड तोड़ दिए। दंगल ने 1600 करोड़ से ज्यादा तो बाहुबलि दो ने लगभग २ हजार करोड़ का कारोबार किया । भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के अनुसार भारतीय फिल्म उद्योग का कारोबार 165 अरब से ज्यादा का हो गया है। दो दर्जन से ज्यादा भाषाओं और बोलियों में भारत में फिल्में बनती हैं। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा भारतीय सिनेमा जगत को उद्योग का दर्जा देने के बाद बहुत बदलाव आया है। भारतीय सिनेमा को संगठित माफिया से मुक्ति मिली है। अपराधियों के निवेश करने पर रोक लगी है। भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बन रही फिल्में नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। नई-नई तकनीक, कहानी और लोगों के बीच पहुंच बनाने के कारण फिल्में लोकप्रिय हो रही हैं।

कारोबार के नए कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद भारतीय सिनेमा पर विदेशी फिल्में और खासतौर पर हॉलीवुड की नकल करने के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में भारतीय सिनेमा की जानी-मानी हस्ती सुभाष घई ने एक मुलाकात में बताया कि मुंबई के सिनेमा जगत को बॉलीवुड कहने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीबीसी ने एक बार मुंबइयां फिल्मों को हॉलीवुड की नकल बताते हुए बॉलीवुड बताया था। मुंबई के फिल्म जगत ने बीबीसी के मजाक को अपनाते हुए मुंबई फिल्म जगत को बॉलीवुड कहना शुरु कर दिया। मीडिया ने इसे तेजी से बढ़ाया। हैरानी की बात है कि दादा साहब फाल्के, वी शांताराम, सत्यजीत रे, राजकपूर से लेकर नए-नए फिल्मकार दुनिया में भारतीय सिनेमा की एक अलग पहचान बनाने मे कामयाब हुए हैं और वहीं हम गुलामी के प्रतीक और नकलची होने का तमगा लगाए बॉलीवुड शब्द को ढोने पर खुश हो रहे हैं। मुंबई फिल्मजगत की नकल करते हुए तेलुगू फिल्म जगत को टॉलीवुड, तमिल फिल्म इंडस्ट्री कॉलीवुड, मलयाली फिल्मी दुनिया को मॉलीवुड, कन्नड़ फिल्म उद्योग को सैंडलवुड और पंजाबी फिल्म जगत को पॉलीवुड कहा जा रहा है। इस सबसे यही साबित हो रहा है कि भारतीय फिल्में हॉलीवुड की नकलची है।

दुनियाभर में भारतीय फिल्मों की साख बढ़ रही है और हम खुद गुलाम मानसिकता के कारण अपने को नकलची साबित कर रहे हैं। बड़े बजट की फिल्मों की तुलना अगर हम छोटे बजट की फिल्मों के साथ करें तो स्थिति बहुत अच्छी है। छोटे बजट की फिल्में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। भारतीय फिल्मों की पुरानी कहानियों को छोड़ कर छोटे बजट की नई-ऩई फिल्मों ने बेहतर प्रदर्शन नए-ऩए कलाकारों को आगे बढ़ने का मौका दिया है। ऐसे में हमें अपनी मौलिकता को बढावा देने के लिए बॉलीवुड, टॉलीवडु, क़ॉलीवुड, मॉलीवुड से जैसे गुलामी के प्रतीक शब्दों से निजात पाना होगा। हम ऐसे शब्द प्रयोग करें, जिससे भारत की सभी भाषाओं और बोलियों की फिल्मों को प्रतिष्ठा मिले।

बॉलीवुड शब्द से फिल्मी जगत की जानी-मानी हस्तियां खुश है ऐसा भी नहीं है। अमिताभ बच्चन, कमल हासन जैसे बड़े कलाकार पहले ही बॉलीवुड शब्द को लेकर खुश नहीं है। अमिताभ बच्चन तो कई बार इस शब्द को लेकर नाखुशी जता चुके हैं। कमल हासन भी बॉलीवुड शब्द से बहुत चिढ़ते हैं। मुलाकात में सुभाष घई ने भी बॉलीवुड शब्द को लेकर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी फिल्म जगत के अलावा अन्य फिल्मों के लोग भी बॉलीवुड जैसे तमगे को बदलकर भारतीय फिल्म जगत जैसा शब्द चाहते हैं। अब समय आ गया है कि गुलाम मानसिकता के प्रतीक बॉलीवुड के प्रयोग को पूरी तरह बंद कर दें। इस कार्य में फिल्म उद्योग के लोगों की बड़ी भूमिका होगी। उन्हें तुंरत इस शब्द का प्रयोग बंद करके भारतीय फिल्में, हिन्दी फिल्में, मराठी फिल्में, बंगाली फिल्में, तमिल, तेलुगू, मलायम, कन्नड की फिल्में, भोजपुरी, पंजाबी, गुजराती, असमी, ओडिसी आदि फिल्में कहना शुरु करेंगे तो हमारी भाषाओं और बोलियों को दुनियाभर में ज्यादा मान-सम्मान मिलेगा। गुलाम मानसिकता से निकलने के लिए मीडिया के लोगों को भी आगे आना होगा। मीडिया ने भी हॉलीवुड की तर्ज पर बनने वाली फिल्मों के मजाक उड़ाने के सिलसिले को बॉलीवुड जैसे शब्दों के इस्तेमाल को बढ़ाया है । फिल्म उद्योग से जुड़े सभी लोगों को भारतीय फिल्मों की अस्मिता को बचाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस दिशा में कार्य करना होगा।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जिस तरह 1998 में भारतीय सिनेमा को उद्योग का दर्जा देकर कई नई दिशा दी, उसी तरह अब भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड की नकलची होने के आरोप से निकालने के लिए इस तरह के शब्दों पर रोक लगाने की शुरुआत करनी होगी। हम सब जानते हैं कि संगठित अपराधियों के चंगुल में फंसे भारतीय सिनेमा को उबारने के लिए राजग सरकार ने उद्योग का दर्जा दिया है। उद्योग का दर्जा मिलने के बाद फिल्मों के निर्माण में बैंकों से पैसा मिलने लगा तो गैरकानूनी धंधे में लगे लोगों का निवेश कम होता गया। फिल्म जगत माफिया सरगनाओं से भी मुक्ति मिली है। अब यही सही समय है कि फिल्म उद्योग को गुलामी के प्रतीक को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर हॉलीवुड की नकलची होने के तमगे से बचाना होगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं।)

राहुल जी, स्वस्थ राजनीति करने के लिए आप भी फिटनेस मन्त्र को अपनाइए.ये देश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य के लिए है बिना किसी नुकसान के ...

फिटनेस अच्छी सेहत के लिए है … राजनीति के लिए नहीं

केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने लोगों को फिट रखने के लिए एक मुहिम शुरु की है। उन्होंने ट्वीटर पर एक वीडियो अपलोड किया है। इस वीडियो में वह अपने दफ्तर में व्यायाम करते दिखाई दे रहे हैं। हम फिट तो इंडिया फिट हैशटेग से उन्होंने फिटनेस चैलेंज शुरु किया है। चैलेंज के लिए राठौड़ ने लोगों से व्यायाम करते हुए अपना-अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर जारी करने की अपील की है। उनका कहना है कि ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली है। प्रधानमंत्री के लगातार देश की जनता के लिए काम करने की सक्रियता से प्रेरित राज्यवर्धन कहते हैं कि प्रधानमंत्री में जबरदस्त ऊर्जा है। प्रधानमंत्री दिन-रात लगातार काम करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री से प्रेरित होकर चाहता हूं सभी लोग अपना व्यायाम करते हुए वीडियो बनाए और दूसरों को प्रेरित करें। हम सब स्वस्थ रहें, इस ध्येय को लेकर ही राज्यवर्धन ने यह मुहिम शुरु की है।

महात्मा गांधी हमेशा अरस्तु के इस कथन से कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है, लोगों को स्वस्थ और स्वच्छ रहने की प्रेरणा देते थे। महात्मा गांधी ने स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और संयम से जीने का मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि स्वस्थ वहीं है जिसे कोई बीमारी न हो। उन्होंने लोगों को ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की प्रेरणा दी। स्वच्छ रहने के साथ ही उन्होंने शरीर को सही रखने के लिए सप्ताह में एक दिन उपवास करने और शाहाकारी बनने के लिए लोगों को मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि दिन में इतना परिश्रम करें कि रात को लेटते ही नींद आ जाए। ओलंपिक में रजत पदक हासिल करने वाले राज्यवर्धन ने स्वस्थ रहने के लिए लोगों को हम फिट तो इंडिया फिट मुहिम चलाई है। अपनी मुहिम के लिए उन्होंने विराट कोहली, रितिक रोशन और सायना नेहवाल को चैलेंज दिया था। उनके चैलेंज को स्वीकार करते हुए विराट कोहली ने कसरत की और मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए महेंद्र सिंह धोनी, अपनी पत्नी और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज दिया। विराट ने लिखा भी कि ”मैं राठौर सर का दिया फिटनेस चैलेंज स्वीकार करता हूं। अब मैं ये चैलेंज अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा, हमारे पीएम नरेंद्र मोदी और धोनी भाई को देता हूं। विराट कोहली की इस पहल पर सबसे पहले पीएम मोदी का ट्वीट आया और उन्होंने लिखा कि विराट का चैलेंज स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है कि विराट का चैलेंज स्वीकार है। मैं जल्द ही वीडियो के जरिए अपना फिटनेस चैलेंज शेयर करूंगा।

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह चैलेंज स्वीकार करना नहीं भा रहा है। राहुल गांधी ने फिटनेस मंत्र पर राजनीति शुरु कर दी है। अपने को महात्मा गांधी का अनुयायी बताने वाले कांग्रेस के नेता राज्यवर्धन की लोगों को स्वस्थ रखने की मुहिम से पता नहीं क्यों इतने परेशान हो गए हैं ? राहुल गांधी ने हम फिट तो इंडिया फिट’ चैलेंज अब राजनीतिक चैलेंज में तब्दील कर दिया। राहुल गांधी ने कहा कि “मुझे यह देखकर खुशी हुई कि आपने विराट कोहली का चैलेंज मंजूर किया। एक चैलेंज मेरी तरफ से भी। पेट्रोल-डीजल के दाम घटाएं, नहीं तो फिर कांग्रेस देशभर में आंदोलन करेगी और आपको ऐसा करने के लिए मजबूर करेगी, आपके जवाब का इंतजार रहेगा। राहुल गांधी को राजनीति करने के लिए केवल आलोचना ही करनी है। होना तो यह चाहिए था कि देश के लोगों को जागरूक करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को प्रधानमंत्री की पहल का स्वागत करना चाहिए। महात्मा गांधी जानते थे कि गांवों में रहने वाले गरीब लोग रोजी-रोटी के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं और उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रहता है। इसीलिए उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा पर जोर दिया। लोगों को संयमित जीवन का मंत्र दिया।

हमारे देश में स्वस्थ रहने के लिए जागरुकता बढ़ी है। हर शहर में सुबह-शाम पार्कों में सैर करने वालों की संख्या बढ़ी है। लोगों की योग और ध्यान में लगातार दिलचस्पी बढ़ी है। दफ्तरों में भी फिट रहने के लिए जिम बनाए गए हैं। भागदौड़ की जिंदगी में लोग स्वस्थ रहे इसके लिए बार-बार जागरूकता बढ़ाई जा रही है। हम देख रहे हैं कि भागदौड़ की जिंदगी में युवा बीमार हो रहे हैं। युवाओं में मधुमेह और दिल की बीमारी बढ़ी है। हाल ही में 13 साल के एक बच्चे की मधुमेह से मौत हो गई। ऐसे हालातों में स्वस्थ रहने के लिए अगर खेल मंत्री स्वस्थ रहने का मंत्र दे रहे हैं तो इसमें आलोचना की करने का क्या बात है? राहुल की देखादेखी राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव भी राजनीति करने लगे। युवा नेताओं का तमगा लगाने वाले इन नेताओं को कम से कम सेहत के मुद्दे पर तो राजनीति नहीं करना चाहिए। लगता तो यही है कि गांधीजी के नाम पर राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता उनके स्वस्थ रहने के मूलमंत्र को भूल गए। राहुल गांधी आप भी रोजाना व्यायाम करें ताकि स्वस्थ शरीर के साथ आपका मस्तिष्क भी स्वस्थ रहे। देश की सेहत के लिए यह बहुत जरूरी है।

लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक विषयों पर बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया। कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी। कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कर्नाटक में शपथ ग्रहण पर नहीं लगी रोक

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया।

कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी।

कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

माननीय नरेंद्र मोदी जी ने बंगाल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को लेकर चिंता प्रकट कर इस ओर सभी को एकजुट हो विचार करने पर ध्यान आकर्षित किया है।

पश्चिम बंगाल- लोकतंत्र के सीने में घाव ,चिंतनीय।PM नरेंद्र मोदी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा, आगजनी, बमधमाके, लूटमार, सरकारी तंत्र की मनमानी आदि को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के मतदान के दिन ही 19 लोगों की मौत हुई। उसके अगले दिन हुई हिंसा में पांच और लोग मारे गए। मतदान के दिन ऐसा कोई इलाका नहीं था जहां हिंसा न हुई हो। खूनी चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री ने यह अपील भी की है कि लोकतंत्र के सीने पर घाव देने वाले विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा। उन्होंने नामांकन से लेकर मतदान तक की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई और कहा कि पंचायत चुनाव में लोकतंत्र की हत्या की गई है। बंगाल की पिछली शताब्दी को देखें जिसने  देश को मार्गदर्शन देने का काम किया है। ऐसी महान भूमि को राजनीतिक स्वार्थ के लिए लहुलूहान कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल की जनता का दुख सबके सामने रखा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी, मनमानी और विपक्षी दलों पर अत्याचारों को लेकर सभी राजनीतिक दल आक्रोश जता रहे हैं। रोजाना जगह-जगह विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। मतदान के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता, प्रशासन और पुलिस हत्या, आगजनी, बम धमाके आदि की घटनाओं को मामूली बता रहे हैं।

दुनियाभर में भारत के लोकतंत्र के उदाहरण दिए जाते हैं, लेकिन यहां हाल ही में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में धनबल के बढ़ते इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद की गई। साथ ही 24.43 लाख रुपये की 5 लाख 26 हजार 766 लीटर शराब जब्त की गई है। इसके अलावा व्हिस्की की 8640 बोतलें भी जब्त की गई हैं। चुनाव आयोग के अनुसार चार करोड़ से ज्यादा का सोना भी पकड़ा गया।14 करोड़ 91 लाख 62 हजार 715 रुपये कीमत के अन्य सामान भी बरामद किए गए हैं। 219 वाहनों को जब्त भी किया गया है। कर्नाटक के राजराजेश्वरी नगर विधानसभा क्षेत्र के एक फ्लैट से दस हजार मतदाता पहचान पत्र बरामद होने के बाद चुनाव आयोग ने इस सीट पर मतदान स्थगित कर दिया है। अब इस सीट पर 28 मई को मतदान होगा। आयोग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिये तमाम वस्तुयें बांटने और भारी मात्रा में फर्जी मतदाता पहचान पत्रों की बरामदगी जैसी अन्य घटनाओं की शिकायतें शुरुआती जांच में ठीक पाये जाने के बाद यह फैसला किया है। राजनीतिक दलों के बीच कुर्सी कब्जाने की होड़ के कारण चुनाव में धन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुना खर्च हुआ है। जाहिर है चुनाव आयोग की सख्ती से सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद होने के बावजूद चुनाव में धन का इस्तेमाल हुआ।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि कोई चुनाव जीते, कोई हारे लेकिन ‘लोकतंत्र के सीने पर घाव उभारने के विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा, सभी को सोचने पर मजबूर करता है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में 34 फीसदी सीटों पर विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन ही नहीं करने दिया गया। नामांकन न करने देने और अन्य शिकायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट को पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि निष्पक्षता नहीं बरती जा रही है। मतदान के दौरान हिंसा रोकने के निर्देश देने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने पूरे इंतजाम नहीं किए। यह सब बूथों पर जबरन कब्जा करने के लिए किया गया। बूथों पर कब्जे के दौरान तमाम स्थानों पर पुलिस वाले मूकदर्शक बने रहे।

मतदान के दिन विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को जिंदा जला दिया गया। कुछ स्थानों पर हिंसा मतदान के दो दिन बाद भी जारी है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों की चेतावनी न मानने वाले लोगों के घरों को जलाया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वालों को धमकी के कारण दूसरे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों में लौटने से डर रहे है। भाजपा के अलावा माकपा के प्रमुख नेताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का विरोध किया है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी सरकार की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं पर बड़े नेता चुप क्यों हैं?

अब समय आ गया है कि रक्तरंजित चुनावों को लेकर सभी को सोचना है। क्या कोई शासक दल कुर्सी कब्जाने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेता रहेगा ? तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वाले लोगों को घऱों में रहना दूभर हो गया है। उनके कारोबार को बंद कराया जा रहा है। घरों को जलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में लहूलुहान लोकतंत्र की तरफ देश का ध्यान आकर्षित किया है। प्रधानमंत्री की चिंता को लेकर अब समाज के सभी वर्गों को इस मुद्दे पर सोचना होगा।

लोकतंत्र का काला अध्याय पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव ,हिंसा

प बंगाल- लोकतंत्र की हत्या

दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र की शक्ति का डंका बजता है। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत के चुनावों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को नामांकन भरने के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने पर फटकारा भी। राज्य चुनाव आयोग की पहले नामांकन की तारीख बढ़ाने और फिर वापस लेने के फैसले पर भी सवाल उठाये। पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन भी नहीं किया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में पंचायत के चुनाव के दौरान आम लोगों के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। चुनाव में नामांकन भरने के दौरान हिंसा का सहारा लेकर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सरकार और पुलिस के संरक्षण में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को नामांकन भरने से रोका। भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों के उम्मीदवारों को डराने के लिए बम फेंके गए, सरेआम पिटाई की गई, दलों के दफ्तर फूंक दिए गए। राज्य चुनाव आयोग द्वारा नामांकन भरने से रोकने की शिकायतों के बावजूद राज्य चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को 34 फीसदी से ज्यादा यानी 20 हजार पंचायत सीटों पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र में इतिहास में एक काला अध्याय माना जाएगा।

इस तरह से पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक गुंडों ने हिंसा फैलाकर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को चुनाव में हिस्सा न लेने देने के लिए प्रशासन और पुलिस ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का पूरा साथ दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की सरकार में महिलाओं की इज्जत भी लगातार तार-तार हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी की ताजा घटना ने सब को झकझोर कर रख दिया है। नादिया की एक महिला भाजपा प्रत्याशी के घर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने मारपीट की। प्रत्याशी के न मिलने पर उनकी छह महीने की गर्भवती देवरानी के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं इस कृकत्य को छिपाने के लिए सरकारी अस्पताल ने ममता बनर्जी के डर से उसका इलाज करने से भी मना कर दिया। इस गर्भवती महिला का इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा है और बच्चे के जीवित बचने की संभावना न के बराबर है। चुनाव में जीत का परचम फहराने के लिए तृणमूल समर्थकों द्वारा दलितों और अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या कर ममता बनर्जी पंचायत चुनाव में किसी भी तरह जीत दर्ज कर अगले लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर दावा पेश करने वाली हैं। हैरानी की बात है कि हाई कोर्ट के तमाम निर्देशों के बावजूद पंचायत चुनाव में सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। हत्या, मारपीट, बमबारी और बलात्कार की लगातार जारी घटनाओं के बीच सरकारी संरक्षण में तृणमूल समर्थकों ने पंचायत चुनाव में एक तिहाई सीटों पर जीत हासिल कर ली है। कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए सत्ता हासिल करने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अब उन्हें भी विरोधियों का खात्मा करने की नीति में पीछे छोड़ दिया है।

राज्य चुनाव आयोग ने जानकारी दी है कि तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में 34.2 फीसदी सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है। इसी तरह का खेल 2003 के पंचायती चुनावों में कम्युनिस्टों की सरकार के समय खेला गया था। तब कम्युनिस्टों ने 11 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबले के जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी कम्युनिस्टों से तीन गुणा ज्यादा बढ़ गई हैं, इस कारण कम्युनिस्टों के मुकाबले उनका पतन भी जल्दी होगा। अबकी बार तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में लगभग 20 हजार सीटों पर जीत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सभी जिलों में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वाममोर्चो के कार्यकर्ताओं को चुनाव में नामांकन करने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया। जहां-जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नामांकन भरा, वहां उन्हें भगाने की कोशिश की गई। घरों में तोड़फोड़ की गई। बड़ी संख्या में भाजपा समर्थकों को दूसरी जगह जाकर शरण लेनी पड़ रही है। तृणमूल समर्थकों की बमबारी, हत्या, बलात्कार आदि की घटनाओं के बावजूद भाजपा ने पंचायत चुनाव में नामांकन करने में कम्युनिस्टों को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा की बढ़ती ताकत के कारण निर्विरोध जीते गए हमारे उम्मीदवारों को धमकाकर तृणमूल में शामिल करने की कोशिश की जा रही है।

 

पश्चिम बंगाल में 3,358 ग्राम पंचायतों की 48,650 सीटों, 341 पंचायत समितियों की 9,217 सीटों और 20 जिला परिषदों की 825 सीटों 14 मई को होने वाले चुनाव पर कलकत्ता हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद संशय है। लेकिन पंचायत चुनाव में दाखिल नामांकन पत्रों को देखे तो तृणमूल की तरफ से एक हजार, भाजपा ने 782, माकपा ने 537 और कांग्रेस की तरफ से 407 पर्चे सही पाए गए हैं। पंचायत समितियों के लिए तृणमूल कांग्रेस के 12,590 उम्मीदवार, भाजपा के 6,149, माकपा के 4400 और कांग्रेस के 1740 उम्मीदवार मैदान में हैं। ग्राम पंचायतों के लिए तृणमूल ने 58,978, भाजपा ने 27,935, माकपा ने 17,319 और कांग्रेस ने 7,313 नामांकन दाखिल किए हैं। उम्मीदवारों की संख्या में तो भाजपा ने कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों को पीछे छोड़ ही दिया है साथ ही तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का जवाब देने में में भाजपा ने पूरी हिम्मत दिखाई है। भाजपा के कार्यकर्ता तृणमूल समर्थकों की तमाम कोशिशों के बावजूद नामांकन पत्र भरने में सफल रहे हैं पर तृणमूल उम्मीदवारों के 34 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबला जीतने की घोषणा से पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पर्याप्त सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही  है। केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने की बजाय दूसरे राज्यों से फोर्स मांगी जा रही है। पंचायत चुनाव के लिए 58 हजार से ज्यादा बूथों पर मतदान होगा और राज्य के पास 46 हजार हथियार वाले और 12 हजार लाठीदार पुलिस वाले हैं। सरकार के पास एक बूथ पर दो सुरक्षाकर्मी तैनात करने का इंतजाम भी नहीं है। जब नामांकन भरने के दौरान जितनी हिंसा तृणमूल समर्थकों ने फैलाई है, उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि मतदान के दिन क्या हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से पूरी कोशिश हो रही है कि विरोधियों का चुनाव से सफाया कर दिया जाए। हिंसा की तमाम घटनाओं के खिलाफ जगह-जगह भाजपा, माकपा और कांग्रेस की तरफ से धरना-प्रदर्शन भी हुए पर वामदलों और कांग्रेस के बड़े नेताओं की चुप्पी क्या साबित कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी बार-बार ममता बनर्जी की तारीफ तो कर रहे हैं पर अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई पर चुप क्यों हैं। इसी तरह वामदलों के नेताओं ने भी ममता सरकार पर कोई हमला नहीं बोला है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की ममता सरकार की मनमानी का जवाब दे रही है। ममता बनर्जी के पूरी तरह से राहुल गांधी को नकारने के बावजूद उनकी चुप्पी क्या साबित कर रही है। शायद विपक्षी दलों की एकता के नाम पर राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की बलि देना भी मंजूर कर लिया है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या को लेकर उठे सवालों का जवाब वहां की जनता आने वाले दिनों में जरूर देगी।

BJP

विचारधारा का बढ़ता दायरा

भारतीय जनता पार्टी 38 वर्ष में 11 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के साथ आज दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। भाजपा के तौर पर हमारी राजनीतिक यात्रा चाहे 38 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई हो वास्तव में हमारी राजनीतिक जड़े 1951 में जनसंघ की स्थापना के समय से ही पूरे देश में विकसित होती रहीं हैं। 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक परम पूज्यनीय गुरु गोलवलकर जी की प्रेरणा से 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। डॉ.मुखर्जी पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में उद्योग और आपूर्ति मंत्री थे। डॉ. मुखर्जी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली और नेहरू के बीच हुए समझौते से नाराज होकर 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। 1951-52 के पहले आमचुनाव में डॉ.मुखर्जी सहित जनसंघ के तीन सदस्य चुने गए थे।

 

जम्मू-कश्मीर में हर भारतीय से अनुमति पत्र लेने के निर्णय के विरोध में डॉ.मुखर्जी ने 1953 में सत्याग्रह प्रारम्भ किया और बिना अनुमति कश्मीर पहुंचे। कश्मीर में गिरफ्तारी के बाद 22 जून 1953 में वे देश के लिए न्यौछावर हो गए। डॉ.मुखर्जी के बलिदान के बाद देश में हजारों कार्यकर्ताओं ने जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना खून बहाया। आज भाजपा के 15 राज्यों में मुख्यमंत्री हैं और छह राज्यों में हम मिलीजुली सरकारें चला रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बार-बार कहा है कि यह सब हमारे कार्यकर्ताओं के बलिदान और परिश्रम के कारण हुआ है।

 

विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा ही कार्यकर्ताओं की एकमात्र पार्टी है। देश में एकमात्र लोकतांत्रिक दल भाजपा ही है। कांग्रेस समेत ज्यादातर दल आज वंशवाद और जातिवाद के आधार पर राजनीति में टिके रहने की कोशिश रहे हैं तो भाजपा सबका साथ-सबका विकास नारे को लेकर चप्पे-चप्पे पर छा रही है।

 

देश में आज राष्ट्रपति,  उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और 15 राज्यों में मुख्यमंत्री भाजपा के कार्यकर्ता हैं। छह राज्यों में सहयोगी दलों की सरकारें हैं लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। राज्यसभा में 69 सदस्यों के साथ भाजपा सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। राज्यसभा में पहली बार भाजपा के 69 सदस्य पहुंचे हैं। यह सब भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की तपस्या का परिणाम है। हमारे नेताओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण, बलिदान और त्याग के कारण ही आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

 

डॉ.मुखर्जी के बाद जनसंघ को विस्तार को कुछ झटका तो लगा पर कार्यकर्ताओं के दम पर पार्टी बढ़ती रही है। जनसंघ को दूसरा झटका पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बलिदान से लगा। देश की आजादी के बाद देश की एकता और अखंडता के लिए किसी भी राजनेता का ये पहला बलिदान था। पंडित दीनदयालजी की हत्या के बाद माननीय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिह भंडारी, प्यारेलाल खंडेलवाल और अन्य नेताओं के मार्गदर्शन में जनसंघ आगे बढ़ती रही। 1975 में आपातकाल में सबसे ज्यादा अत्याचार राष्ट्रीय सेवक संघ और जनसंघ के कार्यकर्तांओं ने सहे। 1977 में देश में लोकतंत्र की स्थापना की खातिर जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। लंबे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 6 अप्रैल 1980 को भाजपा की स्थापना हुई और अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। भाजपा डॉ.मुखर्जी के आदर्शों और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मार्ग पर आगे बढ़ती रही। भाजपा पर इस दौरान कई संकट आए पर धीरे-धीरे भाजपा का असर पूरे देश में बढ़ता रहा।

 

2004 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के बाद केंद्र पर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का कब्जा रहा। 2014 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने नया इतिहास रचा। लोकसभा में पहली बार भाजपा को 282 सीटों पर कामयाबी तो मिली साथ ही 30 साल बाद किसी राजनीतिक दल को भी सदन में पूर्ण बहुमत मिला। माननीय मोदीजी के नेतृत्व में देश को ऐसी पहली सरकार भी मिली कि जिसके किसी मंत्री पर कोई दाग नहीं लगा पाया।

 

मोदी सरकार ने वोट बैंक की परवाह न करते हुए नोटबंदी, कालेधन के खिलाफ कार्रवाई, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने जैसे फैसले किए। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, महिला, बुजर्ग, बच्चे और समाज के कमजोर तबकों की तरक्की के लिए योजनाओं की शुरुआत की। यही कारण है मोदी सरकार के कार्यों और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जमीनी राजनीतिक रणनीति के कारण पार्टी के 2014 के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में भाजपा की मुख्यमंत्री बने। गोआ और गुजरात में फिर से भाजपा जीती। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा सरकारें हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस अब केवल कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और पुद्दूचेरी तक सिमट गई है। कम्युनिस्टों का लगातार पतन हो रहा है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद कम्युनिस्टों की सरकार अब केवल केरल में है। जाति और मजहब को लेकर राजनीति करने वाले दल भी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान हैं। देश में तीसरे मोर्चे बनाने की कवायद चल रही है।

 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में पार्टी की सरकार बनने के बाद कहा था कि अभी भाजपा का स्वर्ण युग नहीं आया है। उन्होंने कहा है कि केरल, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी का स्वर्ण युग आएगा। इस समय कर्नाटक में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि वहां भाजपा की सरकार बनेगी। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान होकर कभी दिल्ली की तरफ दौड़ लगाती है तो कभी दूसरे राज्यों में विपक्षी नेताओं से फोन पर बात करती हैं। भाजपा के खिलाफ आवाज उठाने वाली ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का गला घोंट दिया है।

 

भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को झूठे मामले बनाकर जेल भेजा जा रहा है। भाजपा कार्यकर्तोओं पर जानलेवा हमले किए जा रहे हैं। हमारे कई कार्यकर्ताओं हिंसक वारदातों में बलिदान हुए हैं। कर्नाटक, केरल जैसे राज्यों में भी हमारे कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक में कहा भी है कि कार्यकर्ताओं का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

 

भाजपा स्थापना दिवस पर देशहित हेतु सदैव बलिदान देने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को भावभीनी श्रद्धाजंलि। साथ ही भाजपा की राजनीतिक यात्रा में भागीदार बने, करोड़ो साथियों को नए संघर्ष हेतु शुभकामनाएं।

 

आईए! देश में नई राजनीति का प्रारम्भ करने वाले मोदी और शाह की अगुवाई में हम अभी से आगामी आमचुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए एकजुट होकर लग्न के साथ कार्य करें।

आओ, नव संवत पर उत्सव मनाएं!

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हमारा नव संवत प्रारम्भ होगा। 18 मार्च 2018 को भारत के विभिन्न प्रांतों में नवदुर्गा की आराधना के साथ ही नव संवत्सर मनाया जाएगा। आप सभी को नव संवत 2075 की बहुत बहुत शुभकामनाएं। आजकल कुछ कारणों से अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार हर साल 31 दिसंबर की रात को नया साल मनाने की परम्परा तेजी से बढ़ी है। हम लोग रात के गहरे अंधकार में नए साल का स्वागत करते हैं। क्या रात को हम नए वर्ष की शुरुआत कर सकते हैं? कुछ वर्षों से यह बात भी देखने में आई हैं कि बड़ी संख्या में अंग्रेजों के नए साल पर बधाई या शुभकामना के संदेश में लोगों ने यह भी कहा कि अपना नया वर्ष तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरु होगा। नव संवत्सर का शुभारम्भ आईये हम उत्सव मनाकर करें।

भारत में नव संवत को पर्व या त्योहार की तरह मनाने की प्राचीन परम्परा है, जो कुछ कारणों से हम भूल गए। हिन्दू पंचांग पर आधारित विक्रम संवत या संवत्सर उज्जनीयि के सम्राट विक्रमादित्य ने प्रारंभ किया था। कल्प, मनवंतर, युग, संवत्सर आदि कालगणना का आधार माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि भारत का सबसे प्राचीन संवत है कल्पाब्ध। सृष्टि संवत और प्राचीन सप्तर्षि संवत का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। युग भेद से सतयुग में ब्रह्म-संवत, त्रेता में वामन-संवत और परशुराम-संवत तथा श्रीराम-संवत, द्वापर में युधिष्ठिर संवत और कलि काल में कलि संवत एवं विक्रम संवत प्रचलित हुए। पुराणों में उल्लेख है सतयुग का प्रारम्भ नव संवत से ही हुआ था। इसका उल्लेख अथर्ववेद तथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलता है। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि से कलियुग संवत का प्रारम्भ हुआ था। पुराणों में बताया गया है कि नव संवत को ही भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। भगवान राम का राज्याभिषेक भी नव संवत के दिन हुआ था।

यह माना जाता है कि इन सबके आधार पर सम्राट विक्रमादित्य ने संवत्सर को काल गणना के आधार पर प्रारम्भ कराया था। हैं। संवत्सर यानी 12 महीने का कालविशेष। उस समय उज्जनीयि के नागारिकों के लिए सम्राट की तरफ से कई घोषणाएं की थी। गरीबों को उपहार दिए गए। ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। पुराणों में वर्णन है कि नव संवत पर देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों आदि की पूजन किया जाता था। पूजन के माध्यम से हम सुख, समृद्धि, शांति, आरोग्य और सामर्थ्य की कामना करते हैं। नव संवत पर देवी उपासना से रोगों से मुक्ति है, शरीर स्वस्थ रहता है। भारत के प्रांतों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक प्रथम सर संघचालक परम पूज्यनीय डॉ. केशवराव हेडगेवार का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 1946 (1 अप्रैल 1889) को हुआ था।

नव संवत को उत्सव की तरह मनाएं। घरों को रंगोली से सजाए। दिन का प्रारम्भ मां दुर्गा की आऱाधना से शुरु करें। रात को घरों में मिट्टी के दिए जलाएं। बंधु-बांधवों के साथ भजन-कीर्तन करें और उपहार के तौर पर प्रसाद बांटे। दिन में परिवार के साथ बैठकर खीर, पूड़ी, हलवा और पकवान ग्रहण करें। प्राचीन भारत की गरिमा को स्मरण करने के लिए गोष्ठियों का आयोजन करें। आईये, नव संवत पर हम सब भारतवासी अपने देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एक साथ मिलजुल कर काम करने का संकल्प लें। यह अवसर ऐसा होगा कि जब हम अपनी जड़ों की तरफ लौटेंगे तो हमें वैज्ञानिक आधार पर बने संवत के अनुसार कार्य प्रारम्भ करने से अपने – अपने लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। इसी संकल्प के साथ एक बार सभी देशवासियों को नव संवत पर बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

– कैलाश विजयवर्गीय

त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय- मोदी-शाह के कार्यों ने दिलाई सबसे बड़ी जीत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति ने त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत गढ धराशायी कर दिया।

मेघालय और नगालैंड में भाजपा गठबंधन की बड़ी जीत हुई है। कांग्रेस का त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सफाया हो गया। त्रिपुरा में तो कांग्रेस को कोई सीट ही नहीं मिली। त्रिपुरा की 20 जनजाति सीटों में कम्युनिस्ट एक भी सीट नहीं जीत पाए।

2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 फीसदी वोट मिले थे और इस बार केवल दो फीसदी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत, अब तक सबसे बड़ी जीत है।

त्रिपुरा में कम्युनिस्टों के सफाये ने साबित कर दिया है कि किसी भी राज्य में अब जनता निरकुंश सरकारों को सहन नहीं करेगी। यह दिखाई दे रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार और ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार भी अब चलता होगी। त्रिपुरा में भाजपा की जीत ने पश्चिम बंगाल और केरल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं का हौंसला बुलंद कर दिया है। हमें पूरी उम्मीद है आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए पूरी ईमानदारी से कार्य किया। असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के बाद अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भी भाजपा की सरकारें होंगी। नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली पूर्वोत्तर के विकास पर ध्यान दिया। पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में रही सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाने वाली राशि का इस्तेमाल ही नहीं किया।
जनता विकास के लिए तरसती रही। मोदी सरकार के कार्यों और नीतियों में आस्था जताते हुए त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड की जनता ने यह एतिहासिक निर्णय सुनाया है। अगर त्रिपुरा की बात करें तो वहां पिछले 25 साल से माकपा की सरकार थी। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने प्रपंच करके अपनी छवि एक साधारण और ईमानदार नेता की बना रखी थी। जनता ने उनके भ्रष्टाचार और निरकुंश होने की पूरी पोल खोल दी है। सभी जानते हैं कि त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पहले ताकत के बल पर चुनावों में धांधली करके जीतते रहे हैं। इस बार जनता ने राज्य में कम्युनिस्टों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए कम्युनिस्टों को चुनावों में धांधली करने का मौका ही नहीं दिया।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी त्रिपुरा में ऐसी चुनावी रणनीति बनाई कि कम्युनिस्ट धराशायी हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को बार-बार त्रिपुरा भेजा। बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों में मंत्रियों ने दौरे किए। जनता से मुलाकात की, उनकी समस्याओं का जाना और निराकरण किया। पहली बार पूर्वोत्तर की जनता ने प्रधानमंत्री को बार-बार इतने नजदीक से देखा।

प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को पूरे देश की पार्टी बना दिया है। ध्यान देने वाली बात है कि 2013 के चुनाव में भाजपा को कम्युनिस्टों के गढ़ में केवल डेढ़ फीसदी वोट मिले थे। इस बार भाजपा गठबंधन को लगभग 50 फीसदी मत मिले हैं।

भाजपा को खुद 42 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह त्रिपुरा की आधी जनता ने भाजपा वोट दिया है। पहले कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल से साफ और अब त्रिपुरा से, बस अब बचे हैं केरल में हैं। अब देश की जनता विकास के एजेंडे पर चलना चाहती है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय की जनता ने बता दिया है कि अब उन्हें विकास करने वाली सरकारें चाहिए। ये तीनों राज्य भी केंद्र सरकार के साथ मिलकर तेजी से विकास की तरफ बढेंगे।