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पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल इन दिनों राजनीतिक हत्याओं का गढ़ बन गया है। देश के किसी राज्य में राजनीतिक हत्याओं पर यदि अचंभा नहीं होता, तो वो पश्चिम बंगाल ही है। यहाँ राजनीतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे ख़ास तौर पर तीन कारण माने जा रहे हैं। ये हैं बेरोज़गारी, कानून व्यवस्था का ध्वस्त होना और भाजपा की जड़ों का मजबूत होना। अब यहाँ भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। ये साफ़-साफ़ बदले की राजनीतिक कार्रवाई संकेत है। इस राज्य में बरसों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याएं होती रही है। जब कांग्रेस का राज था तब भी, जब वामपंथी सरकार आई तब भी और फिलहाल जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार है तब भी यहाँ कुछ नहीं बदला। अब यहाँ भाजपा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की जा रही है। अभी तक जिस भी पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, वे खामोश क्यों रहे, उन्होंने विरोध का साहस क्यों नहीं किया? ये बहस का अलग मुद्दा हो सकता है! लेकिन, भारतीय जनता पार्टी अन्य पार्टियों की तरह कायरता नहीं दिखाएगी! हम अपने कार्यकर्ताओं पर होने वाले हर हमले का आगे बढ़कर विरोध करेंगे। हमारे कार्यकर्ताओं पर अब यदि हमले होते हैं या उनकी हत्या जैसी नृशंसता होती है, तो हम सड़क पर उतरेंगे! इसका नजारा हमने दिखा भी दिया। फिलहाल पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा और उत्पीड़न चरम पर हैऔर हम पूरी ताकत से इसका विरोध करेंगे।
यहाँ का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वामपंथियों के राज में हुई हिंसा से घबराकर ही यहाँ की जनता ने तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को सत्ता की चाभी सौंपी थी। लेकिन, इसके बाद भी राज्य में कानून व्यवस्था नहीं सुधरी! क्योंकि, सारे हुड़दंगी वामपंथी कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए! आश्चर्य नहीं कि वे उसी तरीके से काम करेंगे, जो वे करते रहे हैं। मतलब यह कि राज्य में बेलगाम राजनीतिक हिंसा का दौर अभी थमा नहीं है! राजनीतिक हत्याएं मुख्य रूप से लोकतंत्र और कानून के खिलाफ सत्ता की मनमानी का हथियार है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को बड़े और कड़े कदम उठाना थे, पर ऐसा नहीं किया जा रहा। दरअसल, राजनीतिक हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान राज्य के शासन ढांचे में संपूर्ण बदलाव से ही संभव है। स्पष्टतः ये पश्चिम बंगाल संवैधानिक मशीनरी के असफल होने का संकेत है। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा की घटनाओं से राज्य के हालातों को समझा गया था। अभी भी ये सिलसिला थमा नहीं है। अब तो ये राजनीतिक हिंसा स्कूलों तक पहुँच गई। देश में ऐसा कभी हुआ नहीं था, पर इस राज्य में हो रहा है। लेकिन, ये हिंसात्मक राजनीति अब सहन नहीं होगी। यहाँ के युवा जाग गए हैं, वे अच्छी तरह समझ गए कि अब इस सरकार को उखाड़ फैंकने का वक़्त आ गया है! … और इंतजार नहीं!

इस राज्य में जल्दी ही

‘दो पत्ती’ मुरझाएगी और भाजपा का ‘कमल’ खिलेगा!

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें
लोकतंत्र के महायज्ञ का पावन दिन है। आपका दिया एक वोट प्रदेश के आने वाले 5 साल का भविष्य तय करेगा! प्रदेश में किस पार्टी सरकार रहेगी, इस बात निर्णय आपका यही वोट तय करेगा। अपने इस वोट के महत्व को पहचानिए! इस लोकतांत्रिक कार्रवाई में सभी को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। मतदान करना हर भारतीय नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, कोशिश की जाना चाहिए कि हर स्थिति में इसका उपयोग हो! लोकतंत्र प्रति सजग और जागरूक लोग इसमें अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। उन्हें ऐसे लोगों को मताधिकार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, जो चुनाव वाले दिन वोट डालने के बजाए घरों में रहना या मौज-मस्ती पसंद करते हैं। बेहतर होगा कि लोग अपने घरों से निकलकर मताधिकार का प्रयोग करेंगे, तभी अच्छे जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचेंगे। मतदाताओं के जागरूक होने पर ही देश में एक अच्छी सरकार बनेगी, प्रदेश के विकास को आगे बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत भी है। इस सत्य को भी स्वीकारा जाए कि मतदान नहीं करने वाले लोग बनने वाली सरकार पर कोई आरोप, प्रत्यारोप भी नहीं लगा सकते। क्योंकि, चुनी हुई सरकार में उनकी हिस्सेदारी जो नहीं थी। युवा लोग अपने आसपास के क्षेत्रों में इस बात का बीड़ा उठाएं कि कोई भी मतदान से वंचित न हो!
प्रदेश के मतदाता 28 नवंबर को मतदान तो करें ही, इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका वोट सही उम्मीदवार और सही पार्टी चुने! क्योंकि, आपका सही फैसला ही प्रदेश और देश में विकास की धारा को गति देगा! मतदान से पहले अपने मन-मस्तिष्क में यह विचार अवश्य कर लें कि आपको निरंतर विकास करने वाली सरकार चाहिए या प्रदेश को बर्बाद करने वाली पार्टी की सरकार? भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होकर आपको ऐसा कोई फैसला नहीं करना है, जिस पर बाद में आपको अफ़सोस हो! क्योंकि, विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके लिए लम्बा समय और कठिन श्रम लगता है। बीते डेढ़ दशकों में प्रदेश का चेहरा जिस तरह बदला है, वो किसी से छुपा नहीं है। सरकार ने लोगों की मूलभूत जरूरतें पूरी करने की हर हरसंभव कोशिश की है। सड़क, बिजली, पानी, सबको भोजन और सबको छत देने के लिए कई योजनाएं बनाई और क्रियांवित की गईं! मध्यप्रदेश को बीमारू राज्य की फेहरिस्त से उबारकर विकास की धारा में ले आना आसान चुनौती नहीं था, पर ये चमत्कार भी हुआ। आज मध्यप्रदेश हर क्षेत्र में विकास कर रहा है। लेकिन, इस विकास का जारी रहना बहुत जरुरी है! यदि विकास पहिया धीमा हो गया या थम गया तो उसका फिर गति पकड़ना मुश्किल होगा! ऐसे कई अनुत्तरित सवालों का एक ही जवाब है कि मध्यप्रदेश में उसी पार्टी की सरकार को फिर मौका दें, जो विकास के प्रति संकल्पित है।

उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा

सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर विशेष
उनके हर फैसले में नीतिगत दृढ़ता का नजारा
– कैलाश विजयवर्गीय
आज आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती है। इस महान भारतीय आत्मा को शत-शत नमन। भारतीय राजनीतिक इतिहास में सरदार पटेल के अमूल्य योगदान को भुलाया नहीं जा सकेगा। वे राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी तो थे ही, देश की आजादी के संघर्ष में भी उन्होंने जो योगदान दिया। उससे कहीं ज्यादा समर्पण उन्होंने आजाद भारत को एक करने में लगाया। जिस अदम्य उत्साह और असीम शक्ति से उन्होंने नव गणराज्य की शुरूआती समस्याओं का समाधान खोजा, उसी का नतीजा है कि उन्होंने हर भारतीय के दिल में अमिट स्थान बना लिया। उनकी नीतिगत दृढ़ता के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें ‘सरदार’ और ‘लौह पुरुष’ की उपाधि दी थी।
आज उन्हें विशेष रूप से याद करने का कारण ये भी है कि उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाने के लिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद के नजदीक उनकी विशाल प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ का अनावरण करने जा रहे हैं। उनकी 182 मीटर ऊँची ये प्रतिमा भी उसी लौहे की बनी है, जैसे उनके इरादे थे। अनावरण के साथ ही ये दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा में दर्ज हो जाएगी, ठीक सरदार पटेल के इरादों की तरह! यह प्रतिमा नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर बनी है। इसकी आधारशिला 31 अक्तूबर, 2013 को सरदार पटेल की 138 वीं वर्षगांठ के मौके पर रखी गई थी। तब आज के हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इसे मणिकांचन संयोग ही माना जाना चाहिए, कि आज जब ये प्रतिमा अनावृत हो रही है, सरकार पटेल की ही तरह नीतिगत दृढ़ता के धनी नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। इस लौह प्रतिमा के लिए हमारी भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश के किसानों, मजदूरों से लोहा इकट्ठा करने का अभियान चलाया था। प्रतिमा बनाने वाली कंपनी एलएंडटी के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एवं प्रबंध निदेशक एस एन सुब्रमण्यन के मुताबिक ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ जहां राष्ट्रीय गौरव और एकता का प्रतीक है, वहीं यह भारत के इंजीनियरिंग कौशल तथा परियोजना प्रबंधन क्षमताओं का सम्मान भी है।
स्वतंत्रता संग्राम से लगाकर एकीकृत भारत के निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल ने जिस तरह की भूमिका निभाई, इतिहास के उस कालखंड को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनका जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव प्रेरणा के रूप में देश के सामने है और हमेशा रहेगा। राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का उन्होंने युवावस्था में जो निर्णय लिया था, उस पथ पर वे जीवन पर्यन्त नि:स्वार्थ भाव से चले। आज के युवाओं के लिए उनका जीवन प्रेरणास्पद है।
उनके जीवन का एक प्रसंग जो मैंने कहीं पढ़ा है, मुझे हमेशा स्मरण हो आता है। जिस तरह भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म कौशल को योग रूप में समझाया है। अर्थात अपने दायित्व का पूरी कुशलता, क्षमता के साथ निर्वहन करना चाहिए। सरदार पटेल ने भी इसी आदर्श को आजीवन अपनाया। वे जब वकील के रूप में अपना दायित्व निभा रहे थे, उसमें भी उन्होंने मिसाल कायम की। वे जब एक मामले में न्यायाधीश के सामने जिरह कर रहे थे, तभी उन्हें एक टेलीग्राम मिला! जिसे उन्होंने देखा और जेब में रख लिया, चेहरे पर कोई भाव लाए बिना! पहले अपने वकील धर्म का पालन किया, उसके बाद घर जाने का फैसला लिया। उस टेलीग्राम में उनकी पत्नी के निधन की सूचना थी। यह उनके लौह पुरुष होने का एक उदाहरण है। इस बात का परिचय उनके आजादी के बाद के कार्यों से ही नहीं मिला, बल्कि यह उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी, जिसका प्रभाव उनके हर कदम में जीवनभर दिखाई दिया।
आजादी के बाद भारतीय रियासतों के विलय की अहम् जिम्मेदारी सरदार पटेल को सौंपी गई थी। उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए छोटी-बड़ी 600 रियासतों का भारत में विलय कराया। देशी रियासतों का विलय आजाद भारत की पहली सबसे बड़ी उपलब्धि थी। निर्विवाद रूप से इसका पूरा श्रेय ही सरदार पटेल को जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे देश की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे। वे जानते थे, कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक संतुलित विकास को कोई खतरा नहीं है। गांव से शहरों की और पलायन भी नहीं होगा। रोजगार के अवसर गांव में ही उपलब्ध होंगे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को वैचारिक एवं क्रियात्मक रूप में एक नई दिशा देने के कारण भी सरदार पटेल को राजनीतिक इतिहास में एक गौरवपूर्ण स्थान मिला है। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उनके कठोर व्यक्तित्व में संगठन कुशलता, राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट निष्ठा थी। ऐसे महान व्यक्ति को एक बार फिर प्रणाम!

भारतीय राजनीति के बाजीगर, जिन्होंने हारना नहीं सीखा

“भारतीय राजनीति के बाजीगर, जिन्होंने हारना नहीं सीखा”

जब कभी भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाहजी के रणनीतिक कौशल, चुनाव प्रबंधन, नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्धता, प्रतिद्वंदी पर आक्रामक हमले जैसी उनकी कुशलता पर एक पूरा अध्याय लिखा पड़ेगा। क्योंकि, वे इस सभी विधाओं के पारंगत खिलाड़ी हैं। उन्हें हारना नहीं आता! हारकर जीतना भी वे जानते हैं। यदि उन्हें भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, तो उन्हें चुनाव प्रबंधन का बाजीगर भी कहना होगा। उन्होंने पार्टी को हमेशा चुनाव के लिए तैयार रहना भी सिखा दिया। वे कभी विश्राम नहीं करते। उनकी प्रबल इच्छाशक्ति ने पार्टी में अलग ही ऊर्जा का संचार किया है। आरएसएस के कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को उन्होंने जिस तरह साकार किया है, वो उनके भविष्य के मजबूत इरादों का संकेत है।

– कैलाश विजयवर्गीय
भारतीय जनता पार्टी देश में अगले पचास साल तक सत्ता में रहेगी। ये बात कहने का साहस और आत्मविश्वास यदि किसी में है तो वो हैं पार्टी अध्यक्ष श्री अमित शाह। उनकी ये बात सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं में ही उत्साह का संचार नहीं करती, बल्कि विपक्ष के लिए भी एक चुनौती है। राजनीतिक रूप से मुखर मानी जाने वाली भाजपा आज पहले की अपेक्षा ज्यादा संगठित और अनुशासित मानी जाती है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं अमित शाहजी का अपना तरीका है। श्री शाह को आज भाजपा का सबसे ताकतवर अध्यक्ष माने जाने का कारण ये है कि वे न केवल रणनीतिकार हैं, बल्कि पार्टी के प्रभावशाली प्रचारक भी हैं। उन्होंने पार्टी को हमेशा इलेक्शन मोड़ में रहना सिखा दिया। मैंने काफी नजदीक से देखा है कि एक चुनाव ख़त्म होने के बाद वे कभी विश्राम की मुद्रा में दिखाई नहीं दिए। उनकी इसी ऊर्जा ने पार्टी को हमेशा मैदान में बनाए रखा है।
कामकाज के नजरिए से भी देखा जाए तो अमित शाह पिछले करीब दस अध्यक्षों से बिलकुल अलग हैं। भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष अटलबिहारी वाजपेयी 18 साल तक पार्टी के कर्ताधर्ता रहे। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने पार्टी की बागडोर संभाली। पहली बार जब एनडीए सत्ता में आई, तो कुशाभाऊ ठाकरे, जना कृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण पार्टी के अध्यक्ष बने। इन दिग्गजों को पार्टी के मुखिया की कुर्सी पर बैठाने के पीछे विचारधारा यह थी कि पार्टी के नेता सरकार और राजनीति संभालें और आरएसएस के लोग पार्टी और संगठन के बीच एक सेतु का काम करें। श्री नितिन गडकरी और श्री राजनाथ सिंह दो ऐसे अध्यक्ष रहे हैं, जिन्होंने राजनीति और संगठन दोनों को संभाला। इन दोनों को आरएसएस का साथ भी बखूबी से सहयोग मिला। लेकिन, पार्टी अध्यक्ष के तौर पर श्री अमित शाह का नजरिया थोड़ा अलग हैं। वे रणनीतिक रूप से आक्रामक हैं और कार्यकर्ताओं की सुनते भी हैं। उनके फैसलों और उन फैसलों को कार्य रूप में परिणित करने में वजन दिखाई देता है। साथ ही आरएसएस में भी उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी वैचारिक और नीतिगत जुगलबंदी का फ़ायदा जितना पार्टी को अपने विस्तार में मिला, उतना ही संघ को भी मिला।
अपने स्पष्ट दृष्टिकोण और रणनीति के अद्भुत कौशल के कारण ही उन्हें 2010 में भाजपा का महासचिव और उसके पश्चात लोकसभा चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। चुनाव के नजरिए से समय कम था, पर जिनकी इच्छाशक्ति प्रबल हो, उनके लिए लक्ष्य कभी मुश्किल नहीं होता। अमितजी ने बहुत थोड़े समय में उत्तर प्रदेश में भाजपा को पुनर्जीवित किया। इसका सबूत 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब भाजपा और उसके सहयोगियों ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 लोकसभा सीटों पर झंडा गाड़ दिया। सिर्फ संख्यात्मक रूप से ही सीटें नहीं बढ़ाई, बल्कि भाजपा के मत प्रतिशत में भी ढाई गुना वृद्धि की। 2014 का लोकसभा चुनाव तो पूरी तरह श्री नरेंद्र मोदी और श्री अमित शाह के रणनीतिक कौशल का ही परिणाम था। प्रचार, जनसंपर्क, अभियान और नए मतदाताओं की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेकर एक ऐसी रणनीति बनाई गई, जिसने इन चुनावों में भाजपा को अभूतपूर्व विजय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
संगठनात्मक क्षमताओं के कारण ही उन्हें चुनाव का कुशल रणनीतिकार समझा जाता है। अमितजी की गिनती उन चुनिंदा राजनीतिज्ञों में होती है, जिनका राजनीतिक इतिहास प्रभावशाली रहा है। पार्टी में उन्हें अपने सिद्धांतों और आदर्शों पर अडिग रहने के लिए भी जाना जाता है। अमितजी में न केवल बेहतरीन संगठनात्मक क्षमता है, बल्कि वे आक्रामक सामरिक योजना के लिए भी जाते हैं। वे ऐसे जमीनी नेता हैं, जो अपने आदर्शों के प्रति दृढ़तापूर्वक प्रतिबद्ध रहे हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं रही, लेकिन उनके परिवार में मानवीयता का समावेश था, जिससे उनके भीतर समाज सेवा की इच्छा जागृत हुई। 14 साल की उम्र में ‘तरुण स्वयसेवक’ के रूप में उन्होंने आरएसएस की सदस्यता ग्रहण की थी। इसके बाद तो उनके जीवन की दिशा ही बदल गई।
अमितजी को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कट्टर समर्थक माना जाता है। लेकिन, इन दोनों की शख़्सियत का मूल्यांकन किया जाए तो कई मामलों में दोनों एकदम जुदा हैं। लोगों को जहाँ मोदीजी की स्पष्ट वाकपटुता और आक्रामक भाषण शैली प्रभावित करती है, वहीँ अमितजी को बंद कमरे में सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर समझा जाता हैं। मैंने कई बार देखा कि वे नेताओं की भीड़ से अलग रहना ही पसंद करते हैं। उनका ये एकाकीपन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। जहाँ तक राजनीतिक रणनीति की बात है, तो वे कभी भी किसी योजना को अधूरा नहीं छोड़ते! वे ज़मीनी हकीकत को विस्तार से जानकर ही किसी योजना को अंतिम रूप देते हैं। उनकी इसी कार्यशैली का नतीजा है कि भाजपा को हर चुनाव में बेहतरीन नतीजे मिले हैं।
आज लोग मानते हैं कि भाजपा का सबसे बड़ा पावर सेंटर अमित शाहजी हैं। यदि ऐसा माना जाता है तो इसमें गलत भी क्या है! नरेंद्र मोदी को यदि दिमाग मान लिया जाए तो अमित शाहजी उसी दिमाग की रक्तवाहिनियां हैं, जो उनके विचारों और योजनाओं को भाजपा रूपी शरीर के हर कोने तक पहुंचाती है। ऊर्जावान दिमाग और संगठनात्मक शक्ति की इस अनमोल जोड़ी ने आरएसएस के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के सपने को काफ़ी हद तक पूरा करके भी दिखाया है। आज यदि देश का ज्यादातर हिस्सा भाजपा के झंडे से रंगा नजर आ रहा है तो इसके पीछे कहीं न कहीं इसी जोड़ी का हाथ है। ये अमितजी की ही रणनीति थी कि पार्टी ने असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में जीत हांसिल की। वे कभी हार नहीं मानते और हारी हुई बाजी जीतना भी उन्हें आता है। क्योंकि, वे राजनीति के बाजीगर जो हैं। गोवा में कांग्रेस को पीछे छोड़कर वहाँ सरकार बनाने में कारनामा उनकी आक्रामक शैली और त्वरित फैसले का सबसे बेहतरीन उदाहरण माना जा सकता है। बिहार का विधानसभा चुनाव हारकर भी उन्होंने उस हार को जीत में कैसे बदला, ये भी देश देख चुका है। उन्हें शतरंज खेलना बहुत पसंद है। वे गुजरात चेस एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं। माना जाता है कि शतरंज खिलाड़ी प्रतिद्वंदी का दिमाग पढ़कर योजना बनाने में माहिर होता है और अमितजी की इस काबलियत का कोई सानी नहीं है। उनकी हर चाल प्रतिद्वंदी को रक्षात्मक होने के लिए मजबूर कर देती है। आने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल होने वाला लोकसभा चुनाव उनकी संगठनात्मक क्षमताओं का परिचायक होगा। आज अमित शाहजी का जन्मदिन है। इस पावन दिन पर उन्हें बधाइयाँ और शुभकामनाएं।

लोकतंत्र का काला अध्याय पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव ,हिंसा

प बंगाल- लोकतंत्र की हत्या

दुनियाभर में भारतीय लोकतंत्र की शक्ति का डंका बजता है। इतने बड़े लोकतांत्रिक देश में पश्चिम बंगाल में होने वाले पंचायत के चुनावों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को नामांकन भरने के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने पर फटकारा भी। राज्य चुनाव आयोग की पहले नामांकन की तारीख बढ़ाने और फिर वापस लेने के फैसले पर भी सवाल उठाये। पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन भी नहीं किया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में पंचायत के चुनाव के दौरान आम लोगों के लोकतांत्रिक और मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। चुनाव में नामांकन भरने के दौरान हिंसा का सहारा लेकर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सरकार और पुलिस के संरक्षण में राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को नामांकन भरने से रोका। भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों के उम्मीदवारों को डराने के लिए बम फेंके गए, सरेआम पिटाई की गई, दलों के दफ्तर फूंक दिए गए। राज्य चुनाव आयोग द्वारा नामांकन भरने से रोकने की शिकायतों के बावजूद राज्य चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों को 34 फीसदी से ज्यादा यानी 20 हजार पंचायत सीटों पर निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया। यह भारतीय लोकतंत्र में इतिहास में एक काला अध्याय माना जाएगा।

इस तरह से पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के दौरान सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के समर्थक गुंडों ने हिंसा फैलाकर लोकतंत्र की हत्या कर दी है। विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को चुनाव में हिस्सा न लेने देने के लिए प्रशासन और पुलिस ने तृणमूल कांग्रेस के गुंडों का पूरा साथ दिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी की सरकार में महिलाओं की इज्जत भी लगातार तार-तार हो रही है। तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी की ताजा घटना ने सब को झकझोर कर रख दिया है। नादिया की एक महिला भाजपा प्रत्याशी के घर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने मारपीट की। प्रत्याशी के न मिलने पर उनकी छह महीने की गर्भवती देवरानी के साथ बलात्कार किया। इतना ही नहीं इस कृकत्य को छिपाने के लिए सरकारी अस्पताल ने ममता बनर्जी के डर से उसका इलाज करने से भी मना कर दिया। इस गर्भवती महिला का इलाज एक निजी अस्पताल में चल रहा है और बच्चे के जीवित बचने की संभावना न के बराबर है। चुनाव में जीत का परचम फहराने के लिए तृणमूल समर्थकों द्वारा दलितों और अल्पसंख्यकों को भी निशाना बनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या कर ममता बनर्जी पंचायत चुनाव में किसी भी तरह जीत दर्ज कर अगले लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर दावा पेश करने वाली हैं। हैरानी की बात है कि हाई कोर्ट के तमाम निर्देशों के बावजूद पंचायत चुनाव में सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। हत्या, मारपीट, बमबारी और बलात्कार की लगातार जारी घटनाओं के बीच सरकारी संरक्षण में तृणमूल समर्थकों ने पंचायत चुनाव में एक तिहाई सीटों पर जीत हासिल कर ली है। कम्युनिस्टों की गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए सत्ता हासिल करने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने अब उन्हें भी विरोधियों का खात्मा करने की नीति में पीछे छोड़ दिया है।

राज्य चुनाव आयोग ने जानकारी दी है कि तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में 34.2 फीसदी सीटों पर निर्विरोध जीत हासिल की है। इसी तरह का खेल 2003 के पंचायती चुनावों में कम्युनिस्टों की सरकार के समय खेला गया था। तब कम्युनिस्टों ने 11 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबले के जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी कम्युनिस्टों से तीन गुणा ज्यादा बढ़ गई हैं, इस कारण कम्युनिस्टों के मुकाबले उनका पतन भी जल्दी होगा। अबकी बार तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायतों में लगभग 20 हजार सीटों पर जीत हासिल की है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने सभी जिलों में भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और वाममोर्चो के कार्यकर्ताओं को चुनाव में नामांकन करने से रोकने के लिए हिंसा का सहारा लिया। जहां-जहां भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नामांकन भरा, वहां उन्हें भगाने की कोशिश की गई। घरों में तोड़फोड़ की गई। बड़ी संख्या में भाजपा समर्थकों को दूसरी जगह जाकर शरण लेनी पड़ रही है। तृणमूल समर्थकों की बमबारी, हत्या, बलात्कार आदि की घटनाओं के बावजूद भाजपा ने पंचायत चुनाव में नामांकन करने में कम्युनिस्टों को भी पीछे छोड़ दिया है। भाजपा की बढ़ती ताकत के कारण निर्विरोध जीते गए हमारे उम्मीदवारों को धमकाकर तृणमूल में शामिल करने की कोशिश की जा रही है।

 

पश्चिम बंगाल में 3,358 ग्राम पंचायतों की 48,650 सीटों, 341 पंचायत समितियों की 9,217 सीटों और 20 जिला परिषदों की 825 सीटों 14 मई को होने वाले चुनाव पर कलकत्ता हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद संशय है। लेकिन पंचायत चुनाव में दाखिल नामांकन पत्रों को देखे तो तृणमूल की तरफ से एक हजार, भाजपा ने 782, माकपा ने 537 और कांग्रेस की तरफ से 407 पर्चे सही पाए गए हैं। पंचायत समितियों के लिए तृणमूल कांग्रेस के 12,590 उम्मीदवार, भाजपा के 6,149, माकपा के 4400 और कांग्रेस के 1740 उम्मीदवार मैदान में हैं। ग्राम पंचायतों के लिए तृणमूल ने 58,978, भाजपा ने 27,935, माकपा ने 17,319 और कांग्रेस ने 7,313 नामांकन दाखिल किए हैं। उम्मीदवारों की संख्या में तो भाजपा ने कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों को पीछे छोड़ ही दिया है साथ ही तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का जवाब देने में में भाजपा ने पूरी हिम्मत दिखाई है। भाजपा के कार्यकर्ता तृणमूल समर्थकों की तमाम कोशिशों के बावजूद नामांकन पत्र भरने में सफल रहे हैं पर तृणमूल उम्मीदवारों के 34 फीसदी सीटों पर बिना मुकाबला जीतने की घोषणा से पूरी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से पर्याप्त सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही  है। केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात करने की बजाय दूसरे राज्यों से फोर्स मांगी जा रही है। पंचायत चुनाव के लिए 58 हजार से ज्यादा बूथों पर मतदान होगा और राज्य के पास 46 हजार हथियार वाले और 12 हजार लाठीदार पुलिस वाले हैं। सरकार के पास एक बूथ पर दो सुरक्षाकर्मी तैनात करने का इंतजाम भी नहीं है। जब नामांकन भरने के दौरान जितनी हिंसा तृणमूल समर्थकों ने फैलाई है, उससे अंदाजा लगा सकते हैं कि मतदान के दिन क्या हो सकता है। तृणमूल कांग्रेस की तरफ से पूरी कोशिश हो रही है कि विरोधियों का चुनाव से सफाया कर दिया जाए। हिंसा की तमाम घटनाओं के खिलाफ जगह-जगह भाजपा, माकपा और कांग्रेस की तरफ से धरना-प्रदर्शन भी हुए पर वामदलों और कांग्रेस के बड़े नेताओं की चुप्पी क्या साबित कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी बार-बार ममता बनर्जी की तारीफ तो कर रहे हैं पर अपने कार्यकर्ताओं की पिटाई पर चुप क्यों हैं। इसी तरह वामदलों के नेताओं ने भी ममता सरकार पर कोई हमला नहीं बोला है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की ममता सरकार की मनमानी का जवाब दे रही है। ममता बनर्जी के पूरी तरह से राहुल गांधी को नकारने के बावजूद उनकी चुप्पी क्या साबित कर रही है। शायद विपक्षी दलों की एकता के नाम पर राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में अपने कार्यकर्ताओं की बलि देना भी मंजूर कर लिया है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र की हत्या को लेकर उठे सवालों का जवाब वहां की जनता आने वाले दिनों में जरूर देगी।

BJP

विचारधारा का बढ़ता दायरा

भारतीय जनता पार्टी 38 वर्ष में 11 करोड़ से ज्यादा सदस्यों के साथ आज दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। भाजपा के तौर पर हमारी राजनीतिक यात्रा चाहे 38 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुई हो वास्तव में हमारी राजनीतिक जड़े 1951 में जनसंघ की स्थापना के समय से ही पूरे देश में विकसित होती रहीं हैं। 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक परम पूज्यनीय गुरु गोलवलकर जी की प्रेरणा से 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी। डॉ.मुखर्जी पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में उद्योग और आपूर्ति मंत्री थे। डॉ. मुखर्जी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली और नेहरू के बीच हुए समझौते से नाराज होकर 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। 1951-52 के पहले आमचुनाव में डॉ.मुखर्जी सहित जनसंघ के तीन सदस्य चुने गए थे।

 

जम्मू-कश्मीर में हर भारतीय से अनुमति पत्र लेने के निर्णय के विरोध में डॉ.मुखर्जी ने 1953 में सत्याग्रह प्रारम्भ किया और बिना अनुमति कश्मीर पहुंचे। कश्मीर में गिरफ्तारी के बाद 22 जून 1953 में वे देश के लिए न्यौछावर हो गए। डॉ.मुखर्जी के बलिदान के बाद देश में हजारों कार्यकर्ताओं ने जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के लिए अपना खून बहाया। आज भाजपा के 15 राज्यों में मुख्यमंत्री हैं और छह राज्यों में हम मिलीजुली सरकारें चला रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बार-बार कहा है कि यह सब हमारे कार्यकर्ताओं के बलिदान और परिश्रम के कारण हुआ है।

 

विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा ही कार्यकर्ताओं की एकमात्र पार्टी है। देश में एकमात्र लोकतांत्रिक दल भाजपा ही है। कांग्रेस समेत ज्यादातर दल आज वंशवाद और जातिवाद के आधार पर राजनीति में टिके रहने की कोशिश रहे हैं तो भाजपा सबका साथ-सबका विकास नारे को लेकर चप्पे-चप्पे पर छा रही है।

 

देश में आज राष्ट्रपति,  उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और 15 राज्यों में मुख्यमंत्री भाजपा के कार्यकर्ता हैं। छह राज्यों में सहयोगी दलों की सरकारें हैं लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। राज्यसभा में 69 सदस्यों के साथ भाजपा सबसे बड़ा राजनीतिक दल है। राज्यसभा में पहली बार भाजपा के 69 सदस्य पहुंचे हैं। यह सब भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं की तपस्या का परिणाम है। हमारे नेताओं और कार्यकर्ताओं के समर्पण, बलिदान और त्याग के कारण ही आज हम इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

 

डॉ.मुखर्जी के बाद जनसंघ को विस्तार को कुछ झटका तो लगा पर कार्यकर्ताओं के दम पर पार्टी बढ़ती रही है। जनसंघ को दूसरा झटका पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बलिदान से लगा। देश की आजादी के बाद देश की एकता और अखंडता के लिए किसी भी राजनेता का ये पहला बलिदान था। पंडित दीनदयालजी की हत्या के बाद माननीय अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदर सिह भंडारी, प्यारेलाल खंडेलवाल और अन्य नेताओं के मार्गदर्शन में जनसंघ आगे बढ़ती रही। 1975 में आपातकाल में सबसे ज्यादा अत्याचार राष्ट्रीय सेवक संघ और जनसंघ के कार्यकर्तांओं ने सहे। 1977 में देश में लोकतंत्र की स्थापना की खातिर जनसंघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। लंबे राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 6 अप्रैल 1980 को भाजपा की स्थापना हुई और अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। भाजपा डॉ.मुखर्जी के आदर्शों और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के मार्ग पर आगे बढ़ती रही। भाजपा पर इस दौरान कई संकट आए पर धीरे-धीरे भाजपा का असर पूरे देश में बढ़ता रहा।

 

2004 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के बाद केंद्र पर कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार का कब्जा रहा। 2014 में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़े गए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने नया इतिहास रचा। लोकसभा में पहली बार भाजपा को 282 सीटों पर कामयाबी तो मिली साथ ही 30 साल बाद किसी राजनीतिक दल को भी सदन में पूर्ण बहुमत मिला। माननीय मोदीजी के नेतृत्व में देश को ऐसी पहली सरकार भी मिली कि जिसके किसी मंत्री पर कोई दाग नहीं लगा पाया।

 

मोदी सरकार ने वोट बैंक की परवाह न करते हुए नोटबंदी, कालेधन के खिलाफ कार्रवाई, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने जैसे फैसले किए। गांव, गरीब, किसान, मजदूर, महिला, बुजर्ग, बच्चे और समाज के कमजोर तबकों की तरक्की के लिए योजनाओं की शुरुआत की। यही कारण है मोदी सरकार के कार्यों और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जमीनी राजनीतिक रणनीति के कारण पार्टी के 2014 के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में भाजपा की मुख्यमंत्री बने। गोआ और गुजरात में फिर से भाजपा जीती। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी भाजपा सरकारें हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस अब केवल कर्नाटक, पंजाब, मिजोरम और पुद्दूचेरी तक सिमट गई है। कम्युनिस्टों का लगातार पतन हो रहा है। त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनने के बाद कम्युनिस्टों की सरकार अब केवल केरल में है। जाति और मजहब को लेकर राजनीति करने वाले दल भी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान हैं। देश में तीसरे मोर्चे बनाने की कवायद चल रही है।

 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिपुरा में पार्टी की सरकार बनने के बाद कहा था कि अभी भाजपा का स्वर्ण युग नहीं आया है। उन्होंने कहा है कि केरल, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी का स्वर्ण युग आएगा। इस समय कर्नाटक में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि वहां भाजपा की सरकार बनेगी। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा की बढ़ती ताकत से परेशान होकर कभी दिल्ली की तरफ दौड़ लगाती है तो कभी दूसरे राज्यों में विपक्षी नेताओं से फोन पर बात करती हैं। भाजपा के खिलाफ आवाज उठाने वाली ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का गला घोंट दिया है।

 

भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को झूठे मामले बनाकर जेल भेजा जा रहा है। भाजपा कार्यकर्तोओं पर जानलेवा हमले किए जा रहे हैं। हमारे कई कार्यकर्ताओं हिंसक वारदातों में बलिदान हुए हैं। कर्नाटक, केरल जैसे राज्यों में भी हमारे कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कर्नाटक में कहा भी है कि कार्यकर्ताओं का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

 

भाजपा स्थापना दिवस पर देशहित हेतु सदैव बलिदान देने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को भावभीनी श्रद्धाजंलि। साथ ही भाजपा की राजनीतिक यात्रा में भागीदार बने, करोड़ो साथियों को नए संघर्ष हेतु शुभकामनाएं।

 

आईए! देश में नई राजनीति का प्रारम्भ करने वाले मोदी और शाह की अगुवाई में हम अभी से आगामी आमचुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए एकजुट होकर लग्न के साथ कार्य करें।

आओ, नव संवत पर उत्सव मनाएं!

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हमारा नव संवत प्रारम्भ होगा। 18 मार्च 2018 को भारत के विभिन्न प्रांतों में नवदुर्गा की आराधना के साथ ही नव संवत्सर मनाया जाएगा। आप सभी को नव संवत 2075 की बहुत बहुत शुभकामनाएं। आजकल कुछ कारणों से अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार हर साल 31 दिसंबर की रात को नया साल मनाने की परम्परा तेजी से बढ़ी है। हम लोग रात के गहरे अंधकार में नए साल का स्वागत करते हैं। क्या रात को हम नए वर्ष की शुरुआत कर सकते हैं? कुछ वर्षों से यह बात भी देखने में आई हैं कि बड़ी संख्या में अंग्रेजों के नए साल पर बधाई या शुभकामना के संदेश में लोगों ने यह भी कहा कि अपना नया वर्ष तो चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरु होगा। नव संवत्सर का शुभारम्भ आईये हम उत्सव मनाकर करें।

भारत में नव संवत को पर्व या त्योहार की तरह मनाने की प्राचीन परम्परा है, जो कुछ कारणों से हम भूल गए। हिन्दू पंचांग पर आधारित विक्रम संवत या संवत्सर उज्जनीयि के सम्राट विक्रमादित्य ने प्रारंभ किया था। कल्प, मनवंतर, युग, संवत्सर आदि कालगणना का आधार माना जाता है। पुराणों में वर्णन है कि भारत का सबसे प्राचीन संवत है कल्पाब्ध। सृष्टि संवत और प्राचीन सप्तर्षि संवत का उल्लेख भी पुराणों में मिलता है। युग भेद से सतयुग में ब्रह्म-संवत, त्रेता में वामन-संवत और परशुराम-संवत तथा श्रीराम-संवत, द्वापर में युधिष्ठिर संवत और कलि काल में कलि संवत एवं विक्रम संवत प्रचलित हुए। पुराणों में उल्लेख है सतयुग का प्रारम्भ नव संवत से ही हुआ था। इसका उल्लेख अथर्ववेद तथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलता है। योगीराज भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की तिथि से कलियुग संवत का प्रारम्भ हुआ था। पुराणों में बताया गया है कि नव संवत को ही भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। भगवान राम का राज्याभिषेक भी नव संवत के दिन हुआ था।

यह माना जाता है कि इन सबके आधार पर सम्राट विक्रमादित्य ने संवत्सर को काल गणना के आधार पर प्रारम्भ कराया था। हैं। संवत्सर यानी 12 महीने का कालविशेष। उस समय उज्जनीयि के नागारिकों के लिए सम्राट की तरफ से कई घोषणाएं की थी। गरीबों को उपहार दिए गए। ब्रह्म पुराण के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने इसी दिन से सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। पुराणों में वर्णन है कि नव संवत पर देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गन्धर्वों, ऋषि-मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशु-पक्षियों आदि की पूजन किया जाता था। पूजन के माध्यम से हम सुख, समृद्धि, शांति, आरोग्य और सामर्थ्य की कामना करते हैं। नव संवत पर देवी उपासना से रोगों से मुक्ति है, शरीर स्वस्थ रहता है। भारत के प्रांतों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक प्रथम सर संघचालक परम पूज्यनीय डॉ. केशवराव हेडगेवार का जन्म चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 1946 (1 अप्रैल 1889) को हुआ था।

नव संवत को उत्सव की तरह मनाएं। घरों को रंगोली से सजाए। दिन का प्रारम्भ मां दुर्गा की आऱाधना से शुरु करें। रात को घरों में मिट्टी के दिए जलाएं। बंधु-बांधवों के साथ भजन-कीर्तन करें और उपहार के तौर पर प्रसाद बांटे। दिन में परिवार के साथ बैठकर खीर, पूड़ी, हलवा और पकवान ग्रहण करें। प्राचीन भारत की गरिमा को स्मरण करने के लिए गोष्ठियों का आयोजन करें। आईये, नव संवत पर हम सब भारतवासी अपने देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एक साथ मिलजुल कर काम करने का संकल्प लें। यह अवसर ऐसा होगा कि जब हम अपनी जड़ों की तरफ लौटेंगे तो हमें वैज्ञानिक आधार पर बने संवत के अनुसार कार्य प्रारम्भ करने से अपने – अपने लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। इसी संकल्प के साथ एक बार सभी देशवासियों को नव संवत पर बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

– कैलाश विजयवर्गीय

त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय- मोदी-शाह के कार्यों ने दिलाई सबसे बड़ी जीत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति ने त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मजबूत गढ धराशायी कर दिया।

मेघालय और नगालैंड में भाजपा गठबंधन की बड़ी जीत हुई है। कांग्रेस का त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में सफाया हो गया। त्रिपुरा में तो कांग्रेस को कोई सीट ही नहीं मिली। त्रिपुरा की 20 जनजाति सीटों में कम्युनिस्ट एक भी सीट नहीं जीत पाए।

2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 फीसदी वोट मिले थे और इस बार केवल दो फीसदी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत, अब तक सबसे बड़ी जीत है।

त्रिपुरा में कम्युनिस्टों के सफाये ने साबित कर दिया है कि किसी भी राज्य में अब जनता निरकुंश सरकारों को सहन नहीं करेगी। यह दिखाई दे रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार और ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार भी अब चलता होगी। त्रिपुरा में भाजपा की जीत ने पश्चिम बंगाल और केरल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी कार्यकर्ताओं का हौंसला बुलंद कर दिया है। हमें पूरी उम्मीद है आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी की सरकार को उखाड़ फेकेंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर पूर्व के राज्यों के लिए पूरी ईमानदारी से कार्य किया। असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के बाद अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में भी भाजपा की सरकारें होंगी। नरेंद्र मोदी सरकार ने पहली पूर्वोत्तर के विकास पर ध्यान दिया। पहले पूर्वोत्तर के राज्यों में रही सरकारों ने केंद्र सरकार द्वारा भेजे जाने वाली राशि का इस्तेमाल ही नहीं किया।
जनता विकास के लिए तरसती रही। मोदी सरकार के कार्यों और नीतियों में आस्था जताते हुए त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड की जनता ने यह एतिहासिक निर्णय सुनाया है। अगर त्रिपुरा की बात करें तो वहां पिछले 25 साल से माकपा की सरकार थी। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने प्रपंच करके अपनी छवि एक साधारण और ईमानदार नेता की बना रखी थी। जनता ने उनके भ्रष्टाचार और निरकुंश होने की पूरी पोल खोल दी है। सभी जानते हैं कि त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पहले ताकत के बल पर चुनावों में धांधली करके जीतते रहे हैं। इस बार जनता ने राज्य में कम्युनिस्टों को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हुए कम्युनिस्टों को चुनावों में धांधली करने का मौका ही नहीं दिया।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी त्रिपुरा में ऐसी चुनावी रणनीति बनाई कि कम्युनिस्ट धराशायी हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों को बार-बार त्रिपुरा भेजा। बाकी पूर्वोत्तर के राज्यों में मंत्रियों ने दौरे किए। जनता से मुलाकात की, उनकी समस्याओं का जाना और निराकरण किया। पहली बार पूर्वोत्तर की जनता ने प्रधानमंत्री को बार-बार इतने नजदीक से देखा।

प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति ने भाजपा को पूरे देश की पार्टी बना दिया है। ध्यान देने वाली बात है कि 2013 के चुनाव में भाजपा को कम्युनिस्टों के गढ़ में केवल डेढ़ फीसदी वोट मिले थे। इस बार भाजपा गठबंधन को लगभग 50 फीसदी मत मिले हैं।

भाजपा को खुद 42 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह त्रिपुरा की आधी जनता ने भाजपा वोट दिया है। पहले कम्युनिस्ट पश्चिम बंगाल से साफ और अब त्रिपुरा से, बस अब बचे हैं केरल में हैं। अब देश की जनता विकास के एजेंडे पर चलना चाहती है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय की जनता ने बता दिया है कि अब उन्हें विकास करने वाली सरकारें चाहिए। ये तीनों राज्य भी केंद्र सरकार के साथ मिलकर तेजी से विकास की तरफ बढेंगे।