Category Archives: kailash Vijayvargiya

पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल में अब हिंसा की राजनीति नहीं चलेगी!

पश्चिम बंगाल इन दिनों राजनीतिक हत्याओं का गढ़ बन गया है। देश के किसी राज्य में राजनीतिक हत्याओं पर यदि अचंभा नहीं होता, तो वो पश्चिम बंगाल ही है। यहाँ राजनीतिक झड़पों में बढ़ोतरी के पीछे ख़ास तौर पर तीन कारण माने जा रहे हैं। ये हैं बेरोज़गारी, कानून व्यवस्था का ध्वस्त होना और भाजपा की जड़ों का मजबूत होना। अब यहाँ भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। ये साफ़-साफ़ बदले की राजनीतिक कार्रवाई संकेत है। इस राज्य में बरसों से राजनीतिक कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याएं होती रही है। जब कांग्रेस का राज था तब भी, जब वामपंथी सरकार आई तब भी और फिलहाल जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार है तब भी यहाँ कुछ नहीं बदला। अब यहाँ भाजपा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ताओं की हत्याएं की जा रही है। अभी तक जिस भी पार्टियों के कार्यकर्ताओं पर हमले हुए, वे खामोश क्यों रहे, उन्होंने विरोध का साहस क्यों नहीं किया? ये बहस का अलग मुद्दा हो सकता है! लेकिन, भारतीय जनता पार्टी अन्य पार्टियों की तरह कायरता नहीं दिखाएगी! हम अपने कार्यकर्ताओं पर होने वाले हर हमले का आगे बढ़कर विरोध करेंगे। हमारे कार्यकर्ताओं पर अब यदि हमले होते हैं या उनकी हत्या जैसी नृशंसता होती है, तो हम सड़क पर उतरेंगे! इसका नजारा हमने दिखा भी दिया। फिलहाल पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा और उत्पीड़न चरम पर हैऔर हम पूरी ताकत से इसका विरोध करेंगे।
यहाँ का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वामपंथियों के राज में हुई हिंसा से घबराकर ही यहाँ की जनता ने तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को सत्ता की चाभी सौंपी थी। लेकिन, इसके बाद भी राज्य में कानून व्यवस्था नहीं सुधरी! क्योंकि, सारे हुड़दंगी वामपंथी कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए! आश्चर्य नहीं कि वे उसी तरीके से काम करेंगे, जो वे करते रहे हैं। मतलब यह कि राज्य में बेलगाम राजनीतिक हिंसा का दौर अभी थमा नहीं है! राजनीतिक हत्याएं मुख्य रूप से लोकतंत्र और कानून के खिलाफ सत्ता की मनमानी का हथियार है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को बड़े और कड़े कदम उठाना थे, पर ऐसा नहीं किया जा रहा। दरअसल, राजनीतिक हिंसा जैसी समस्याओं का समाधान राज्य के शासन ढांचे में संपूर्ण बदलाव से ही संभव है। स्पष्टतः ये पश्चिम बंगाल संवैधानिक मशीनरी के असफल होने का संकेत है। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा की घटनाओं से राज्य के हालातों को समझा गया था। अभी भी ये सिलसिला थमा नहीं है। अब तो ये राजनीतिक हिंसा स्कूलों तक पहुँच गई। देश में ऐसा कभी हुआ नहीं था, पर इस राज्य में हो रहा है। लेकिन, ये हिंसात्मक राजनीति अब सहन नहीं होगी। यहाँ के युवा जाग गए हैं, वे अच्छी तरह समझ गए कि अब इस सरकार को उखाड़ फैंकने का वक़्त आ गया है! … और इंतजार नहीं!

इस राज्य में जल्दी ही

‘दो पत्ती’ मुरझाएगी और भाजपा का ‘कमल’ खिलेगा!

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें

अपना वोट देकर विकास की गति को निरंतरता दें
लोकतंत्र के महायज्ञ का पावन दिन है। आपका दिया एक वोट प्रदेश के आने वाले 5 साल का भविष्य तय करेगा! प्रदेश में किस पार्टी सरकार रहेगी, इस बात निर्णय आपका यही वोट तय करेगा। अपने इस वोट के महत्व को पहचानिए! इस लोकतांत्रिक कार्रवाई में सभी को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना चाहिए। मतदान करना हर भारतीय नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, कोशिश की जाना चाहिए कि हर स्थिति में इसका उपयोग हो! लोकतंत्र प्रति सजग और जागरूक लोग इसमें अहम भूमिका अदा कर सकते हैं। उन्हें ऐसे लोगों को मताधिकार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, जो चुनाव वाले दिन वोट डालने के बजाए घरों में रहना या मौज-मस्ती पसंद करते हैं। बेहतर होगा कि लोग अपने घरों से निकलकर मताधिकार का प्रयोग करेंगे, तभी अच्छे जनप्रतिनिधि चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचेंगे। मतदाताओं के जागरूक होने पर ही देश में एक अच्छी सरकार बनेगी, प्रदेश के विकास को आगे बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत भी है। इस सत्य को भी स्वीकारा जाए कि मतदान नहीं करने वाले लोग बनने वाली सरकार पर कोई आरोप, प्रत्यारोप भी नहीं लगा सकते। क्योंकि, चुनी हुई सरकार में उनकी हिस्सेदारी जो नहीं थी। युवा लोग अपने आसपास के क्षेत्रों में इस बात का बीड़ा उठाएं कि कोई भी मतदान से वंचित न हो!
प्रदेश के मतदाता 28 नवंबर को मतदान तो करें ही, इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका वोट सही उम्मीदवार और सही पार्टी चुने! क्योंकि, आपका सही फैसला ही प्रदेश और देश में विकास की धारा को गति देगा! मतदान से पहले अपने मन-मस्तिष्क में यह विचार अवश्य कर लें कि आपको निरंतर विकास करने वाली सरकार चाहिए या प्रदेश को बर्बाद करने वाली पार्टी की सरकार? भावनात्मक अपीलों से प्रभावित होकर आपको ऐसा कोई फैसला नहीं करना है, जिस पर बाद में आपको अफ़सोस हो! क्योंकि, विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसके लिए लम्बा समय और कठिन श्रम लगता है। बीते डेढ़ दशकों में प्रदेश का चेहरा जिस तरह बदला है, वो किसी से छुपा नहीं है। सरकार ने लोगों की मूलभूत जरूरतें पूरी करने की हर हरसंभव कोशिश की है। सड़क, बिजली, पानी, सबको भोजन और सबको छत देने के लिए कई योजनाएं बनाई और क्रियांवित की गईं! मध्यप्रदेश को बीमारू राज्य की फेहरिस्त से उबारकर विकास की धारा में ले आना आसान चुनौती नहीं था, पर ये चमत्कार भी हुआ। आज मध्यप्रदेश हर क्षेत्र में विकास कर रहा है। लेकिन, इस विकास का जारी रहना बहुत जरुरी है! यदि विकास पहिया धीमा हो गया या थम गया तो उसका फिर गति पकड़ना मुश्किल होगा! ऐसे कई अनुत्तरित सवालों का एक ही जवाब है कि मध्यप्रदेश में उसी पार्टी की सरकार को फिर मौका दें, जो विकास के प्रति संकल्पित है।

ये है अमिताभजी की दिलदारी

दुनिया में जो भी महान व्यक्ति हुए हैं, वे सिर्फ अपनी सामाजिक पहचान से नहीं, बल्कि अपने कर्म और सदाशयता की वजह से महान कहलाए! महान लोगों की इस सूची में मेरे नजरिए से एक नाम है हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन का!

परदे पर तीन दशक तक इस अभिनेता ने ‘एंग्रीमैन’ की भूमिका निभाई! लेकिन, निजी जीवन में अमिताभजी की पहचान एक ऐसे व्यक्ति का रही है, जो गुमनाम रहकर लोगों की मदद करते हैं। बॉलीवुड के ये महानायक जीवन में नए-नए प्रयोग करने के लिए भी जाने जाते हैं। वे अपनी परदे की पहचान से अलग भी कई ऐसे काम ऐसे करते हैं, जो उनकी शख्‍स‍ियत को कई गुना बढ़ा देता है। वे समाज सेवा के क्षेत्र में भी नए प्रयोग करते रहते हैं। किसानों के प्रति उनकी संवेदना का भाव तो इतना प्रबल है कि वे उनका दर्द नहीं देख पाते। उन्होंने पहले कर्नाटक, आँध्रप्रदेश, महाराष्ट्र के किसानों के कर्ज चुकाए। अब वे अपने जन्म स्थली राज्य उत्तरप्रदेश के किसानों की मदद के लिए आगे आए हैं। ये अमिताभ के धनवान होने का नहीं, बल्कि उनके संवेदनशील और उनके बड़प्पन का प्रतीक है। देश में पैसे वाले तो हज़ारों हैं, पर ऐसा दिलवाला कोई नहीं, जिसका दिल किसानों की पीड़ा समझता हो!

उन्होंने उत्तर प्रदेश के 1,398 किसानों का 4.05 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज चुकाने का फैसला किया है। अपने इस कदम के लिए अमिताभजी ने बैंक ऑफ इंडिया के साथ ‘ओटीएस’ यानी ‘वन टाइम सेटलमेंट’ किया है। 26 नवंबर को वे किसानों से मिलकर उन्हें खुद बैंक के कर्ज मुक्ति पत्र सौंपेंगे। इसके लिए अमिताभजी ने करीब 70 किसानों को मुंबई बुलवाया और इसके लिए ट्रेन का एक पूरा डिब्बा अपनी तरफ से बुक किया। इससे पहले उन्होंने महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के सैकड़ों किसानों का भी कर्ज चुकाया था।

नियमित लिखे जाने वाले अपने ब्लॉग में इस महान एक्टर ने लिखा भी है। ‘किसानों को बैंक का कर्ज चुकाने में परेशानी हो रही थी! कर्ज का बोझ बढ़ने की वजह से वे खुदकुशी जैसा बड़ा कदम उठाने को मजबूर हो रहे थे। किसानों को इस कदम से रोकने का एक ही रास्ता था कि उनका कर्ज चुका दिया जाए!’

मुझे याद है कि अमिताभजी अपने इस काम को प्रचारित करना नहीं चाहते थे। लेकिन, ‘केबीसी’ शो में आए एक अतिथि ने अमिताभजी की इस अच्छाई का जिक्र कर दिया था। उन्होंने उसी समय बताया था कि कर्नाटक में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान, वे कहीं रुके थे। सुबह उन्होंने अखबार देखा तो एक किसान की खुदकुशी की खबर पढ़ी। उससे मन विचलित हो गया और तभी फैसला किया था कि इनके लिए कुछ करूँगा, इसीलिए इस काम शुरुआत कर्नाटक से हुई।

उन्होंने किसानों के अलावा देश के लिए सीमा पर जान न्यौछावर करने वाले शहीदों के 44 परिवारों की भी सरकारी एजेंसियों के जरिए आर्थिक मदद की। उन्होंने अपने ब्लॉग में इस बारे में लिखा था ‘ये बहुत संतोषजनक अनुभव’ रहा था। ये महान अभिनेता ‘कौन बनेगा करोड़पति कर्मवीर’ में पहुंचे अजीत सिंह की भी वह मदद करेंगे। अजीत सिंह लड़कियों को वेश्यावृत्ति में धकेले जाने से बचाने में जुटे हैं। इसके अलावा अमिताभजी ने सरबनी दास रॉय को भी मदद देने का निर्णय लिया है, जो मानसिक रूप से बीमार लोगों की मदद करती हैं। अमिताभजी का ये कदम ऐसे लोगों के लिए प्रेरणा है, जो समाज के लिए कुछ करना तो चाहते हैं, पर उन्हें वो राह नजर नहीं आती, जो किसी के आँसू पौंछने तक पहुंचे!

मध्यप्रदेश में चौथी बार इसलिए बनेगी भाजपा सरकार!

मध्यप्रदेश में चौथी बार इसलिए बनेगी भाजपा सरकार!

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार सच और झूठ का फैसला होना है। सच वो जो प्रदेश की जनता ने 15 साल में देखा है और झूठ वो कांग्रेस हमेशा बोलती आई है। कांग्रेस का वचन-पत्र उसी झूठ का प्रतीक है। प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का आधार बहुत मजबूत है। इतना मजबूत कि उसे झूठे वादे डिगा नहीं सकते।

डेढ दशक तक जनता के सुख-दुःख में सहभागी रही मध्यप्रदेश सरकार ने अपने वादों और घोषणाओं से आगे जाकर काम किए हैं। प्रदेश में चौथी बार भाजपा ही अपनी सरकार बनाएगी, इसमें कोई शक नहीं! मुझे विश्वास है कि प्रदेश सरकार के कामकाज से जनता में उसके प्रति विश्वास प्रबल हुआ है। जनता का यही विश्वास इस बार के विधानसभा चुनाव में उसकी जीत का आधार बनेगा।

भाजपा हमेशा ही राजनीति से परे हटकर विकास का ध्यान रखती आई है। क्योंकि, विकास ही किसी सरकार के कामकाज के मूल्यांकन का सबसे बड़ा पैमाना होता है। सिर्फ मध्यप्रदेश ही नहीं, जहाँ भी भाजपा सरकारें हैं, वहाँ विकास को लेकर कभी कोताही नहीं बरती गई। लगातार तीन बार मध्यप्रदेश के मतदाताओं द्वारा भाजपा को सरकार बनाने का मौका देना ही इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है, कि जनता के दिल में भाजपा के प्रति विश्वास काफी गहरा है। इतना गहरा कि ये प्रतिद्वंदी के झूठे प्रलोभनों और दिवा स्वप्नों से भी वो डिगने वाला नहीं!

इस बार प्रतिद्वंदी कांग्रेस को ये ग़लतफ़हमी है कि प्रदेश की जनता भाजपा को हटाकर उसे मौका देगी! सपने देखना बुरी बात नहीं है। कांग्रेस नेताओं को भी ऐसे सपने देखने का पूरा हक़ है, लेकिन वे खुद मूल्यांकन करें कि जनता ऐसा क्यों करे? केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल और मध्यप्रदेश में डेढ़ दशक के भाजपा सरकार के कार्यकाल की तुलना क्या कांग्रेस की किसी भी सरकार कार्यकाल से की जा सकती है? आपसे भी सवाल करूँ तो आपका जवाब भी वही होगा जो मैं सोचता हूँ।

भाजपा सरकार की सबसे बड़ी खासियत ये है कि उसका कामकाज जनता को दिखाई देता है। जब भाजपा सरकार जनता की जरुरत और भावना के अनुरूप काम कर रही है, तो फिर जनता किसी ऐसी पार्टी को सरकार बनाने का मौका क्यों दे, जिसके एक बड़े नेता को ‘बंटाढार’ का तमगा मिला हुआ है! एक समय था जब देशभर में मध्यप्रदेश ख़राब सड़कों के लिए बदनाम था, आज वो स्थिति नहीं है। बिजली को लेकर शहर में स्टूडेंट से लगाकर गाँव के किसान तक परेशान थे! आज मध्यप्रदेश में बिजली का उत्पादन इतना है कि हम दूसरे राज्यों को रोशन कर रहे हैं। समाज में झूठ की गंदगी फैलाने, लोगों को भरमाने और झूठे वादे करने वालों की कमी नहीं है। चुनाव की इस फ़िज़ां में चारों तरफ झूठ के बादल छाए हुए हैं। ऐसे कई नेता हैं, जो जनता को मूर्ख बनाने के लिए झूठ का सहारा ले रहे हैं। ऐसे में उम्मीद की किरण सिर्फ भाजपा ही है जिसने जो वादा किया वो पूरा किया!

*नवरात्रि के 9 दिन और नारी शक्ति की आराधना*

माता दुर्गा को शक्ति का भंडार माना जाता है। यही कारण है कि उनकी पूजा से अनंत ऊर्जा की प्राप्ति होती है। नवरात्रि की पूजक माता दुर्गा के नौ रूप हैं, सभी रूप अपने अंदर शक्ति को समेटे हैं। शक्ति साधना के इस पर्व में 9 देवियों की, तीन महादेवियों की दश महाविद्या की साधना आदि का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है कि नवरात्रि में माता दुर्गा के 9 शक्ति रूपों की आराधना करने से विशेष फल प्राप्त होता है। भक्ति करने वाले के जीवन में सकारात्मकता संचारित होती है। हिन्दू धर्मग्रंथों और शास्त्रों के मुताबिक शक्ति पूजन के बिना देव पूजा भी अधूरी है। शक्ति की आराधना के बिना तो शिव को भी शव के सदृश समझा गया हैं। इस शक्ति की महत्ता का अहसास इसी एक सच से लग जाता है। शक्ति के बिना तो योग सिद्धि की भी प्राप्ति संभव नहीं। यही कारण कि नवरात्रि में शक्ति स्वरूप माता दुर्गा की पूजा ही शुभ मानी गई है।
कहा जाता है कि समाज में शक्ति की प्रतीक नारी के प्रति संवेदनाओं का विस्तार जरुरी है। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का हम सम्मान करें। परिवार में रहने वाली माता, पत्नी, बेटी, बहन या अन्य रिश्तों में हम शक्ति गुण ढूंढें और उनका सम्मान करें। इसलिए कि नारी में जितनी शक्ति, ऊर्जा, दृढ़ता और समर्पण होता है, उसका पुरुष में सर्वथा अभाव होता है। आज नारी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से ही समाज में स्वयं को स्थापित कर सकी है। शास्त्रों ने इसी मातृशक्ति की आराधना के लिए हमें साल में 9 विशेष दिन दिए हैं। देखा जाए तो वास्तव नौ-दुर्गा के ये दिन नारी शक्ति के सम्मान का उत्सव है। दुर्गा पूजा का ये उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान और शक्ति का स्मरण कराता है, साथ ही समाज के अन्य शक्ति केंद्रों को भी नारी शक्ति के सम्मान के लिए प्रेरित करता है।
शक्ति का आशय ऊर्जा। ऊर्जा को यदि अपने मुताबिक संचालित करना है, तो उस पर आधिपत्य करना जरुरी है। शक्ति को जीतकर उसे हम अपने अधीन कर सकते हैं! लेकिन, यह संभव नहीं था! यही कारण है कि ऊर्जा से कृपा पाने के लिए उसे माता शब्द से उद्धृत किया गया। इसका सबसे बड़ा लाभ ये हुआ कि शक्ति में वात्सल्य का भाव जागा और ऐसी स्थिति में सिर्फ स्तुति से ही माता की कृपा प्राप्त होने लगी। इसलिए वैदिक साहित्य और भारतीय आध्यात्म शक्ति की उपासना प्रायः माता के रूप में की गई है। शक्ति के तामसिक रूपों में हाकिनी, यक्षिणी, प्रेतिनी आदि की पूजा भी तांत्रिक और साधक माता रूप में ही करते हैं। क्योंकि, माता शब्द से उनकी आक्रामकता में कमी आती है। भक्ति में कोई त्रुटि होने पर भी माता भक्त को पुत्र समझकर क्षमा कर देती है।
बंगाल में नारी-पूजा की परंपरा प्राचीनकाल से प्रचलित है। इसलिए वहां शक्ति की पूजा करने वाले शाक्त संप्रदाय का काफी असर है। दूसरी और वहां वैष्णव संत भी हुए हैं, जो राम और कृष्ण की आराधना में यकीन रखते हैं। पहले इन दोनों संप्रदायों में अकसर विवाद होते थे। लेकिन, धीरे-धीरे शाक्तों और वैष्णव संप्रदाय में सामंजस्य कायम हुआ। सदियों पहले राम को दुर्गा की आराधना करते हुए दिखाने से भी विवाद हुए! लेकिन, समय, काल और परिस्थितियों ने दोनों संप्रदायों के बीच समरसता कायम की। इससे भगवान राम का नायकत्व तो स्थापित हुआ ही, शक्ति रूपा नारी की अहमियत भी बरकरार रही। पिछली पांच शताब्दियों में दुर्गा पूजा और दशहरा न केवल बंगाल बल्कि देश के दूसरे इलाकों का भी महत्वपूर्ण त्यौहार बन चुका है। क्योंकि, शक्ति का पूजन जिस अपरिमित ऊर्जा का संचार करता है, वो कहीं और से प्राप्त नहीं की जा सकती!

एक साथ चुनाव की जरूरत

एक साथ चुनाव की जरूरत

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की विधानसभाओं के चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर ज्यादातर राजनीतिक दल चुनावी मोड में हैं। इन तीन विधानसभा चुनावों के बाद देश एक बार फिर जल्दी ही लोकसभा के लिए चुनावी मोड में होगा। अगले वर्ष सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना, ओडिसा और आंध्र प्रदेश विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होंगे। अगले वर्ष ही कुछ समय बाद हरियाणा और महाराष्ट्र की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। 2020 में झारखंड, दिल्ली और बिहार में विधानसभा के चुनाव होंगे। 2021 में जम्मू-कश्मीर,असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुद्दूचेरी में विधानसभाओँ के चुनाव होंगे। लोकसभा और विधानसभा के चुनावों के अलावा सभी राज्यों में स्थानीय निकायों के चुनाव भी होगें। यानी हर दो-तीन महीने बाद देश चुनावी मोड में होगा, सरकारें साइलेंट मोड में होंगी और नौकरशाही फ्लाइट मोड में चलेगी। ऐसी स्थिति से बचाने के लिए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के विचार पर देश में बहस छेड़ी गई है। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह ने इसी मुद्दे पर विधि आयोग को एक पत्र सौंपा है। इस पत्र में उन्होंने महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए लिखा है वहां 365 दिनों में से 307 दिनों तक चुनावों के कारण आचार संहिता लगी रही। इस कारण विकास कार्यों में रुकावट आई और ऐसी स्थिति कई राज्यों में रही। श्री शाह ने सुझाव दिया है कि एक साथ चुनाव कराने से प्रशासनिक व्यय में कमी आएगी और विकास कार्यों में तेजी आएगी। साथ ही राजनीतिक दलों के चुनावी खर्च में भी कमी आएगी।

लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का सुझाव नया नहीं है। देश में 1952, 1957, 1962 और 1967  के आम चुनावों के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव होते रहे हैं। 1967 के लोकसभा चुनाव के साथ हुए विधानसभा चुनावों में बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु और केरल में कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था। आठ विधानसभाओं में पहली बार विपक्ष की संविद सरकारें बनीं। 1967 से पहले देश में गैर कांग्रेसवाद का नारा बुलंद हुआ था। विपक्ष ने मिलजुलकर कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने दिया। संयुक्त विपक्ष की सरकारें ज्यादा समय तक नहीं चल पाईं तो मध्यावधि चुनाव की शुरुआत हुई। 1969 में कांग्रेस टूटने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा देते हुए लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने का फैसला लिया और 1971 में पांचवीं लोकसभा के चुनाव हुए। इस तरह लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने की परम्परा समाप्त हो गई। इंदिरा कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत मिला तो 18 विधानसभाओं को भंग करके मध्यावधि चुनाव कराए गए। 1977 में लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कई राज्यों की विधानसभाओं को भंग करके चुनाव कराए गए। 1980 में जनता पार्टी के विघटन और इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद फिर से विधानसभाओं को भंग करके चुनाव कराए गए। इस स्थिति में एक साथ चुनाव का कराने का सबसे पहले चुनाव आयोग ने 1983 में सुझाव दिया। 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का सुझाव दिया। समय-समय पर कुछ राजनीतिज्ञ भी एक साथ चुनाव कराने का सुझाव देते रहे। 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी ने चुनावों में बढ़ते खर्च के मद्देजनर लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव कराने का सुझाव दिया। श्री आडवाणी ने 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले भी एक देश-एक चुनाव का सुझाव दिया। 2012 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी को पत्र भेजकर चुनाव सुधार के लिए कदम उठाने की अपील की थी। इस मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह से भी चर्चा की थी। तब श्री सिंह ने इस मुद्दे पर सहमति जताई थी। श्री आडवाणी ने बार-बार होने वाले मध्यावधि चुनावों को लेकर भी लोकसभा और विधानसभाओं की अवधि तय करने का सुझाव भी दिया था। तब चुनाव आयोग या केंद्र सरकार ने इस सुझाव पर कोई ध्यान नहीं दिया। 2015 में ससंदीय समिति ने भी एक साथ चुनाव कराने के लिए अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी देश की जनता के सामने यह सुझाव रखा और सभी राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर चर्चा करने का अनुरोध किया। डा.प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति रहते हुए कुछ अवसरों पर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर सहमति जताई। राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने भी इस मुद्दे पर सहमति जताई। भाजपा अध्यक्ष श्री अमित शाह ने चुनावी खर्च में तेजी से हो रही बढ़ोतरी को लेकर भी एक साथ चुनाव कराने का सुझाव आगे बढ़ाया है। चुनाव में खर्चों में बढ़ोतरी को लेकर सभी दल इसमें कटौती करने के पक्ष में हैं। 1952 के लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों पर दस करोड़ खर्च हुए थे। 2014 के लोकसभा चुनाव पर ही सरकार ने 4500 करोड़ खर्च किए। एक अनुमान के अनुसार राजनीतिक दलों की तरफ से 30 हजार करोड़ खर्च करने का हिसाब लगाया गया है। 1999 से लेकर 2014 के आम चुनावों के दौरान 16 बार ऐसा हुआ है कि छह महीनों के भीतर ही विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं।

मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष एकजुट होने की कोशिश में हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, कम्युनिस्ट, तेलुगूदेशम पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी एक राष्ट्र-एक चुनाव के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात करने वाली समाजवादी पार्टी ने एक साथ चुनाव कराने पर रजामंदी जताई है। तेलंगाना राष्ट्र समिति, अन्नाद्रमुक, बीजू जनता दल और शिरोमणि अकाली दल भी एक साथ चुनाव कराने पर सहमत हैं। कुछ दल इस मसले पर संविधान संशोधन की जरूरत बता रहे हैं। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने वीवीपीएटी मशीनों की कमी के आधार पर एक साथ चुनाव कराने में असमर्थता जताई है। 1952 में हुए लोकसभा और विधानसभाओं के चनाव की तुलना में आज हमारे पास ज्यादा संसाधन हैं। देश में और राज्यों में कई गुणा सुरक्षा बल हैं। परिवहन के साधन बहुत बढ़े हैं। पहले के मुकाबले सूचना तेजी से दी जा सकती हैं। चुनावों पर नजर रखने के पूरे संसाधन हैं। कांग्रेस और कुछ दलों को लगता है कि एक साथ चुनाव हुए तो नरेंद्र मोदी का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। मोदी के नाम पर राजग के दलों को राज्यों में लाभ हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक राष्ट्र-एक चुनाव का सुझाव देश की तेजी से विकास करने और चुनाव खर्च में कमी लाने के मकसद से की है। राजनीति के शिखर पुरुष पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल विहारी वाजपेयी ने 1996 में विश्वासमत के दौरान कहा था कि ‘सत्ता का खेल तो चलेगा..सरकारें आएंगी जाएंगी। पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी भी इसी उदेश्य को लेकर आगे बढ़ रही है। चुनाव में जनता किसे चुनेगी, यह जनता का अधिकार है। हमारा कर्तव्य है कि हम देश को तेजी से तरक्की के रास्ते पर लाने के लिए एक राष्ट्र-एक चुनाव के सुझाव पर एकजुट हों।

अतुलनीय अटल जी कैलाश विजयवर्गीय

अतुलनीय अटल जी

प्रशंसकों ने तो श्रद्धांजलि दी ही, साथ पूरे देश को उनका जाना झकझोर गया। विदेशों में उनके प्रशंसकों को उनका जाना खल रहा है। पाकिस्तान की जनता भी उनके न रहने से स्तब्ध रह गई। सभी को लगा कि उनके बीच से एक ऐसी महान शख्सियत चली गई, जिसने भारतीय राजनीति को नये आयाम दिए। विश्व में कूटनीति की नई परिभाषा गढ़ी। अटल इरादों के विशाल ह्रद्य वाले अटलजी राजनीति में शुचिता, पवित्रता,नैतिकता, पारदर्शिता और सौहार्दता के लिए देशवासियों के मन में हमेशा छाये रहेंगे। 12 साल से मौन अटलजी के महाप्रयाण पर करोड़ों लाखों ने उन्हें विदाई दी। महाप्रयाण के अवसर पर नम हुईं करोड़ों आंखें हमें बताती हैं कि अटलजी का न रहना, एक राजनीतिक युग के समाप्त होने जैसा है। अटलजी ने चाहे 12 साल से एक शब्द नहीं बोला था, पर भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय करोड़ों कार्यकर्ताओं के पास उनसे जुड़ा कोई न कोई संस्मरण जरूर था। गांव-देहात के कार्यकर्ता हो या प्रदेश की राजधानी के कार्यकर्ता हो या दिल्ली के। सभी अटलजी का जिक्र आते ही अपने-अपने संस्मरण सुनाने लगते। कितना विशाल संपर्क था अटलजी का। एक बार जिस शहर में गए, वहां सैंकड़ों लोगों के दिलों में बस जाते थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसा आकर्षण था, जो बरबस ही सबको अपनी ओर खींच लेता था। उनके विरोधी भी उनकी इस बात के कायल थे। भाजपा के विरोधी दलों के नेताओं के पास भी अटलजी के सहयोग के बहुत से संस्मरण हैं। भाजपा के धुर विरोधी रहे लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने तो अपनी किताब में अटलजी के महान व्यक्तित्व का उल्लेख किया है। माकपा के प्रमुख नेता रहे सोमनाथ चटर्जी का जो काम तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी टालती रहीं, उसे अटलजी ने दो घंटे में कर दिखाया।

अटलजी के व्यक्तित्व और कृतित्व की तुलना हम किसी से नहीं कर सकते। महात्मा गांधी हो या पंडित जवाहर लाल नेहरू। डा.श्यामाप्रसाद मुखर्जी हो या पंडित दीनदयाल उपाध्याय। इनमें से किसी से भी अटलजी की तुलना नहीं हो सकती। अटलजी की तुलना अगर होगी तो स्वयं अटलजी से ही होगी। अटल वाकई बहुत बड़े थे। भारतीय राजनीति में उन्होंने स्वयं को बेशक कभी बहुत बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न नहीं किया पर उनके कार्यों और विचारों के आधार पर हम उन्हें बहुत बड़ा मानते हैं। पहली बार ही लोकसभा में पहुंच कर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को चुनौती देने वाले अटल बिहारी वाजपेयी को सुनकर उन्हें कहना पड़ा था यह युवक अवश्य प्रधानमंत्री बनेगा। राजनीति में कभी उन्होंने पद पाने की लालसा नहीं जताई। भाजपा में तो वे प्रारम्भ से ही एक स्वाभाविक पसंद थे। भाजपा का हर कार्यकर्ता और शुभचिंतक ही नहीं देश की जनता की भी चाहत थी कि अटलजी लालकिले से झंडा फहरायें। 13 दिन की सरकार चलाने के बाद देशवासियों ने उन्हें 13 महीने और फिर पांच साल सरकार चलाने का अवसर दिया। यह अवसर उनके विचारों और कार्यों के कारण ही मिला। देश की समस्याओं को लेकर चिंता करने वाले और उनका हल निकालने में जुटे रहने वाले अटलजी उदास पलों में भी लोगों को हास्य से भर देते थे। उनका कहना था कि चुनौतियों का हंसकर सामना करेंगे तो चिंताएं भी ज्यादा देर तक नहीं टिकेगी।

अटलजी पर प्रधानमंत्री रहते हुए कोई दाग नहीं लगा पाया। इसी तरह हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल रहा। साढ़े चार साल के कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार पर कोई उंगली नहीं उठा पाया। अटलजी के व्यक्तित्व के तमाम पहलू हमें मोदीजी में दिखाई देते हैं। लोगों को यह जानकारी नहीं थी कि मोदीजी अटलजी के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा चिंतित रहते थे। रोजाना वे अटलजी के स्वास्थ्य की रिपोर्ट लेते। महीने में एक बार उन्हें देखने घर जाते और परिवार को उनके शीघ्र स्वस्थ होने का ढांढस बताते। पूरे देश की जनता ने देखा कि अटलजी के निधन के बाद अंतिम यात्रा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रोटोकाल को तोड़ते हुए सुरक्षा नियमों की परवाह न करते हुए पैदल चलते रहे। एक पुत्र की भांति उन्होंने अटलजी को विदाई दी। देश हैरान कि ऐसा इस देश में किसी ने नही देखा कि अपने आदर्श रहे एक महान व्यक्तित्व को किसी प्रधानमंत्री ने ऐसी विदाई दी हो। मोदी के साथ उनके मंत्रिमंडल के सभी साथी और सांसद भी साथ थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी साथ-साथ चलते रहे। ऐसे नजारे ने भी माहौल को और भावुक बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने जिस गति से आधार बढ़ाया है, उसे देखकर हर कोई यही कहता है कि अटल-अडवाणी ने दो सदस्यों की भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया तो मोदी-शाह की जोड़ी ने पार्टी को देश के हर कोने में पहुंचा दिया। सचमुच अटलजी के एकदम सही उत्तराधिकारी नरेंद्र मोदी को देशवासियों ने राष्ट्र को विकास के मार्ग पर ले जाने के लिए नेतृत्व सौंपा है। अटलजी की लेखनी, वाणी और कर्म हमारे लिए हमेशा प्रेरणा के माध्यम रहेंगे। आने वाली पीढ़ियों के लिए अटलजी एक नए सशक्त और समृद्ध भारत की नींव रखने के लिए जाने जाएंगे।

सोमनाथ चटर्जी की अंतिम कसक-पश्चिम बंगाल में मर गया है लोकतंत्र

सोमनाथ चटर्जी की अंतिम कसक-पश्चिम बंगाल में मर गया है लोकतंत्र

लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी हमेशा लोकतंत्र के पक्षधर रहे। अंतिम सांस लेने तक वे दो साल से बीमारी से जूझ रहे थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान लोकतंत्र पर हुए आघात को लेकर उन्होंने अपनी बीमारी की हालत में भी बार-बार चिंता जताई थी। पश्चिम बंगाल में कुछ समय पहले हुए पंचायत चुनावों में विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन न करने की ममता बनर्जी सरकार की कारगुजारी पर सोमनाथ चटर्जी ने कहा था कि राज्य में कोई लोकतंत्र नहीं रह गया है और राज्य उस स्थिति की तरफ बढ़ रहा है, जहां संविधान के अनुच्छेद 356 को लागू करने की मांग की जा सकती है। यह अवश्विसनीय है। यहां तक कि लोगों को उनके न्यूनतम अधिकारों से भी जबरन वंचित किया जा रहा है। यहां लोकतंत्र नाममात्र भी नहीं बचा है। यह न केवल खेदजनक है, बल्कि गहरी चिंता का विषय है। तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की गुंडागर्दी, ममता सरकार के प्रशासनिक और पुलिस के अधिकारियों की विवशता और राज्य चुनाव आयोग की मनमानी को लेकर दुखी हुए सोमनाथ दा ने तो राज्य चुनाव आयुक्त को तीन बार हटाने की मांग भी कर दी थी। पश्चिम बंगाल की हालत पर यह उनकी अंतिम टिप्पणी थी कि जिस तरह पंचायत चुनाव कराया जा रहा है उससे लगता है कि बच्चों का खेल हो रहा है। सरकार जो बोल रही है राज्य चुनाव आयोग वही सब कर रहा है। उनका कहना था कि राज्य चुनाव आयुक्त को चुनाव में सुरक्षा इंतजामों की जानकारी भी नहीं है। उनका कहना था कि राज्य चुनाव आयुक्त मजबूर हैं तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

दस बार लोकसभा के सदस्य रहे सोमनाथ चटर्जी 2004 से 2009 तक लोकसभा के अध्यक्ष रहे। 1996 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का खिताब पाने वाले सोमनाथ चटर्जी अपनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के रवैये से भी नाखुश थे। 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का कम्युनिस्टों ने विरोध किया था। सर्वसम्मति से लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए सोमनाथ चटर्जी को माकपा की तरफ से इस्तीफा देने के लिए विवश किया गया था। 2004 में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से लोकसभा अध्यक्ष के लिए उनका नामांकन किया गया था। लोकसभा अध्यक्ष बनाने के दूसरे प्रस्ताव का पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने समर्थन किया था। 2008 में कम्युनिस्टों के मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-एक सरकार से समर्थन लेने के बाद 22 जुलाई 2008 को विश्वास मत के दौरान किए गए लोकसभा के संचालन के लिए बहुत तारीफ हुई। विदेशी सरकारों के इशारे पर राजनीति करने वाली माकपा को सोमनाथ चटर्जी का यह रवैया कि लोकसभा अध्यक्ष किसी पार्टी का नहीं होता है, भाया नहीं। कहा जाता है कि चीन के दखल के बाद माकपा ने उन्हें पार्टी से निकाला। इसके बाद सोमनाथ चटर्जी राजनीति में सक्रिय नहीं रहे। जो गलती आपातकाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ के दवाब में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन करके की थी, उसी तरह की गलती माकपा ने 2008 में चीनी दवाब में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का विरोध करके की। नतीजा 2011 में पश्चिम बंगाल की जनता ने कम्युनिस्टों को सत्ता से बाहर कर दिया।

यह भी उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लोकसभा की सदस्य रहते हुए राज्य की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार पर मुस्लिम घुसपैठियों की मदद देने का आरोप लगाते हुए सोमनाथ चटर्जी पर टिप्पणी की थी। ममता ने लोकसभा से इस्तीफा भी दिया था। जिस तरह से ममता ने इस्तीफा दिया, उसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। सोमनाथ चटर्जी मजदूरों के अधिकारों के लिए हमेशा लड़ते रहे। गरीबों के मुद्दे को उन्होंने संसद में बड़ी मजबूती से उठाया। बार-बार कमजोर वर्गों की आवाज संसद में उठाते रहे। सोमनाथ दा संसद में बहस के दौरान राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों को बड़ी गंभीरता, पूरे तथ्यों और जोरदार ढंग से रखते थे। संसद में उन्हें बड़े ध्यान से सुना जाता था। सोमनाथ चटर्जी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भी प्रशंसक रहे थे। अपनी किताब में उन्होंने आपातकाल के बाद विदेश मंत्री बने वाजपेयी द्वारा उनका पासपोर्ट एक दिन में दिलाने में मदद करने पर प्रशंसा की थी। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने उनका पासपोर्ट दोबारा नहीं बनने दिया था। आपातकाल से दुखी सोमनाथ लोकतंत्र की दुर्दशा के कारण विदेश जाना चाहते थे पर पासपोर्ट की अवधि समाप्त होने के कारण उनका पासपोर्ट नहीं बन पा रहा था। आपातकाल का विरोध करने वाले कुछ ही कम्युनिस्ट थे, जिनमें सोमनाथ चटर्जी प्रमुख थे। सोमनाथ चटर्जी ने पंचायत चुनाव के दौरान ममता सरकार की मनमानी और तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की गुंडागर्दी के कारण राष्ट्रपति शासन लगाने का सुझाव दे दिया था। उनकी टिप्पणी के बाद अब तो साफ लग रहा है कि ममता सरकार का जाना ही पश्चिम बंगाल की जनता की उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

संसद में राहुल की नौटंकी

संसद में राहुल की नौटंकी

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण खत्म करते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट पर जाकर उनके गले पड़ते हैं। इसके बाद अपनी सीट पर आते हैं और कांग्रेस के सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ कुटिल मुस्कान फेंकते हुए एक आंख मारते हैं। लोकसभा का यह पूरा नजारा देश ने देखा। लोगों को लगा यह संसद है या कॉलेज की कैंटीन। सच में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रित गठबंधन की सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर जिस तरह लोकसभा में बहस की शुरुआत हुई, उससे तो यही लगा कि विपक्ष के नेताओं के पास मुद्दे ही नहीं है। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन पर राफेल सौदे पर बेसिरपैर के आरोप लगाए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने इस मुद्दे पर निर्मला सीतारमन को सफाई का मौका दिया तो उन्होंने कागजात दिखाते हुए बताया कि यूपीए सरकार और फ्रांस सरकार के बीच सौदे की शर्तों को गोपनीय रखने का करार हुआ था। राहुल गांधी के पास निर्मला सीतारमन की सफाई पर कोई जवाब देते नहीं बना। राहुल को केवल नौटंकी करनी थी, उन्होंने की और सिंधिया को तरफ यही देखकर आंख मारी कि बना दिया पप्पू।
लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा शुरुआत करते जिस तरह तेलुगू देशम पार्टी के सांसद जयदेव गल्ला ने कहा कि हम धमकी ने श्राप दे रहे हैं, उससे यही लगता है कि अविश्वास प्रस्ताव की कोई जरूरत ही नहीं थी। भाजपा के राकेश सिंह ने आंकड़ों के साथ मजबूती से अपनी बात रखी। देश की जनता जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक आधार पर किसी प्रदेश, इलाके, वर्ग या समुदाय के साथ कोई भेदभाव नहीं करते हैं। उनका ही नारा है सबका साथ-सबका विकास। तेलुगू देशम के सदस्यों ने राजनीतिक समीकरणों के कारण ही मोदी सरकार पर हमला बोला है। आंध्र प्रदेश के साथ बुंदेलखंड से भी ज्यादा भेदभाव हुआ, इससे तो पूरे विपक्ष की धार को उन्होंने भौंथरा बना दिया। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड का जिस तरह से विकास हुआ, वह देश के सामने है। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड का योगी सरकार में तेजी से विकास हो रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में कहा कि भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने उनके भाषण पर उन्हें बधाई दी। राहुल गांधी इस कथन पर भाजपा के सदस्य केवल मुस्करा ही सकते थे। अकाली बादल की हरसिमरत कौर पर उन्होंने मुस्कराने की बात कही। उनकी इस बाद हरसिमरत ने कहा कि पप्पी-झप्पी लगने का इलाका नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्षी दलों के हमलों के बीच सहज रूप से मुस्कराते रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि विपक्ष के नेता जुमलेबाजी की बात करते रहे। केंद्र सरकार पर कोई ठोस आरोप नहीं लगा पाया। राहुल गांधी ने महिलाओं पर अत्याचार की बात की। उनका कहना था कि दुनिया में महिलाओं पर अत्याचार के मामलों में छवि खराब हुई। राहुल जी यह भूल गए कि जितना ध्यान मोदी सरकार ने महिलाओं पर दिया, आज तक किसी सरकार ने नहीं दिया। पांच करोड़ परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन देकर उन्हें धुएं से मुक्ति दिलाई है। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक और हलाला जैसी कुरीतियों से बचाया गया है। अविश्वास चर्चा पर विपक्षी दलों की बहस को देखकर यही लगा कि इन दलों के पास मोदी सरकार और भाजपा के खिलाफ कोई मुद्दा नहीं है। सदन में बहस को गिरता स्तर देखकर यही लगता है कि विपक्ष के नेता क्या चौराहे पर भाषण दे रहे हैं।
नाजुक मौकों पर सटीक निर्णय-मोदी के कायल हुए लोग

नाजुक मौकों पर सटीक निर्णय-मोदी के कायल हुए लोग

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों के प्रति संवेदनशीलता की झलक देश ने पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की रैली के दौरान पंडाल गिरने से घायलों को अस्पताल जाकर उनकी हालत देखने और हौंसला बंधाने पर देखी। पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के ऐतिहासिक शहर मेदिनीपुर में 16 जुलाई को आयोजित भाजपा की विशाल रैली कई मायनों में ऐतिहासिक रही। प्रधानमंत्री ने जिस तरह से रैली में पंडाल गिरने से घायल हुए लोगों को लेकर संवेदनशीलता दिखाई, उसे लेकर लोग कायल हुए हैं। प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को देखने का यह पहला अवसर नहीं है, ऐसी बातें हम लोग पहले भी कई बार देख चुके हैं। संवदेनशीलता के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबो, किसानों, मजदूरों और महिलाओँ को अपनी नीतियों और योजनाओं में प्राथमिकता दी है। रैली में घायलों के इलाज और उनकी देखरेख की व्यवस्था पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष को सौंपकर ही प्रधानमंत्री रवाना हुए। रवाना होने के बाद भी प्रधानमंत्री लगातार घायलों की जानकारी लेते रहे। यह सब बातें मीडिया के माध्यम से जन-जन तक पहुंची और लोगों ने प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता को महसूस भी किया। रैली के दौरान पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने और अस्पताल पहुंचाने की संवेदनशीलता को भाजपा की रैली के दौरान मंच पर उपस्थित हम सब ने उनकी नाजुक मौके पर सूझबूझ, धैर्यता, कर्तव्यपरायणता और तुरंत फैसले की क्षमता को नजदीक से देखा। प्रधानमंत्री मोदी की छवि हमेशा उचित निर्णय लेने की रही है। संकट के समय सही फैसले लेकर वे हमेशा बाजी पलट देते हैं।

राजनीतिक हमलों को लेकर सटीक जवाब देने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने मंच से पंडाल गिरने के दौरान और बाद में जिस तरह सूझबूझ से निर्णय लिया और सुरक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए, उससे एक बड़ा हादसा टल गया और कई लोगों की जानें बच गईं। पंडाल गिरने और लोगों के घायल होने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपनी दूरदर्शिता के कारण किसी तरह की भगदड़ होने या अफरातफरी मचने का माहौल नहीं बनने दिया। हम लोगों को भी नाजुक मौके पर उनकी सूझबूझ, धैर्य और दृढ़ता के साथ कार्य करने से सीख मिलती है। हमें यह तो पता ही है कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं है। किसी कार्ययोजना में प्रधानमंत्री न की बजाय की संभावनाओं पर विचार करते हैं। हमने यह भी देखा है कि मोदीजी रैली में अतिउत्साही लोगों को खंभों पर चढ़ने से भी रोकते हैं। याद कीजिए पटना की 27 अक्टूबर 2013 को गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ‘हुंकार रैली’ की। रैली के पहले गांधी मैदान में पांच और पटना जंक्शन पर दो बम धमाके हुए। इन धमाकों में आधा दर्जन लोग मारे गए थे और 83 घायल हुए थे। उस समय गांधी मैदान खचाखच भरा हुआ था। अचानक धमाकों पर धमाकों होने लगे। मोदीजी धैर्य के साथ भाषण देते रहे। कोई भगदड़ नहीं मची। अगर भगदड़ मचती तो कई जाने जा सकती थीं।

लोगों ने यह तो देखा कि मेदिनीपुर में कृषक कल्याण सभा को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान मंच के बाईं ओर मुख्य प्रवेश द्वार के बगल में लगाया गया पंडाल अचानक गिर गया। उस समय सभा में ढाई लाख से ज्यादा लोग मौजूद थे। गिरने वाले पंडाल के नीचे ही 20 हजार से ज्यादा लोग बैठे हुए थे। इनमें महिलाओं की तादाद भी बहुत थी। पंडाल गिरने से 24 महिलाएं घायल हुईं है। सभा के दौरान रिमझिम बारिश के बीच प्रधानमंत्री मोदी मंच पर पहुंचे। दोपहर 12.30 बजे प्रधानमंत्री मंच पर पहुंचे, उस समय तक कॉलेजिएट मैदान खचाखच भर गया था। लोग उत्सुकता से प्रधानमंत्री को सुनने का इंतजार कर रहे थे। रैली के लिए तीन पंडाल बनाए गए थे। तीनों पंडालों के खचाखच भरने और भारी संख्या में लोगों के मैदान के बाहर जमा होने के कारण हम सब बहुत प्रसन्न थे। भाजपा की तरफ से इतनी विशाल रैली अभी तक पश्चिम बंगाल में नहीं हुई थी।

प्रधानमंत्री मोदी जब भाषण दे रहे थे तो उन्होंने पंडाल गिरते देख लिया था। अपने भाषण के बीच पंडाल गिरते हुए देखकर उन्होंने यह आभास नहीं होने दिया कि बड़ी दुर्घटना हो गई है। प्रधानमंत्री ने भाषण जारी रखते हुए लोगों से कहा भी कि कोई खास बात नहीं है। अपने भाषण के दौरान ही अपने सुरक्षा अधिकारियों और स्वास्थ्य सेवाओं में लगे अधिकारियों को तुरंत उन्होंने कुछ ही पलों में संदेश भी पहुंचा दिया। लोगों ने देखा कि अचानक प्रधानमंत्री ने कुछ सैंकिड के लिए एक सुरक्षा अधिकारी के कान में कुछ फुसफुसाया और फिर भाषण देने लगे। प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए घायलों को निकालने का काम बिना शोरशराबे के शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री के निर्देश पर उनके साथ चलने वाले स्वास्थ्य विभाग के दस्ते ने भी घायलों का इलाज तुरंत शुरु कर दिया। प्रधानमंत्री भाषण देते रहे और उन्हें घायलों की हर खबर लगातार अधिकारी पर्ची के माध्यम से देते रहे। भाषण के दौरान प्रधानमंत्री पर्ची पर नजर डालते हुए अपना भाषण देते रहे। प्रधानमंत्री ने एक पंडाल में जमा हुए 20 हजार लोगों के अलावा दो अन्य पंडालों में बैठे 2.30 लाख लोगों को इस दुर्घटना का आभास तक नहीं होने दिया। मंच पर बैठे लोगों को धुकधुकी लगी हुई थी कि कहीं भगदड़ न मच जाए, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। अगर भगदड़ मच जाती तो एक बड़ी दुर्घटना हो सकती है। भागती भीड़ के कारण कुछ भी हो सकता था। कुछ लोग कुचल भी सकते थे। 55 मिनट बाद प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ। तुरंत मंच से उतरकर प्रधानमंत्री प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को साथ लेते हैं और अस्पताल पहुंच जाते हैं। बिना सुरक्षा इंतजामों के बीच प्रधानमंत्री अस्पताल पहुंचने पर लोग हैरान हो जाते हैं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनके प्रधानमंत्री उनका हालचाल पूछने अस्पताल पहुंच गए। प्रधानमंत्री ने अपनी इन्हीं खूबियों के कारण किसी तरह की अफरातफरी का माहौल ही नहीं बनने दिया। प्रधानमंत्री ने घायलों से उनका हालचाल जाना, उन्हें हिम्मत बंधाई और आटोग्राफ दिए। प्रधानमंत्री ने वाकई जनता का दिल जीत लिया। इसका एक दुखद पहलू यह भी है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस इस दौरान कहीं भी नहीं दिखाई। पश्चिम बंगाल सरकार कोई सबक लेने के बजाय इस मुद्दे पर राजनीति करने पर आमादा है।

भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय पश्चिम बंगाल के प्रभारी हैं।

राहुल जी, स्वस्थ राजनीति करने के लिए आप भी फिटनेस मन्त्र को अपनाइए.ये देश की जनता के बेहतर स्वास्थ्य के लिए है बिना किसी नुकसान के ...

फिटनेस अच्छी सेहत के लिए है … राजनीति के लिए नहीं

केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन राठौड़ ने लोगों को फिट रखने के लिए एक मुहिम शुरु की है। उन्होंने ट्वीटर पर एक वीडियो अपलोड किया है। इस वीडियो में वह अपने दफ्तर में व्यायाम करते दिखाई दे रहे हैं। हम फिट तो इंडिया फिट हैशटेग से उन्होंने फिटनेस चैलेंज शुरु किया है। चैलेंज के लिए राठौड़ ने लोगों से व्यायाम करते हुए अपना-अपना वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर जारी करने की अपील की है। उनका कहना है कि ऐसा करने की प्रेरणा उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिली है। प्रधानमंत्री के लगातार देश की जनता के लिए काम करने की सक्रियता से प्रेरित राज्यवर्धन कहते हैं कि प्रधानमंत्री में जबरदस्त ऊर्जा है। प्रधानमंत्री दिन-रात लगातार काम करते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि प्रधानमंत्री से प्रेरित होकर चाहता हूं सभी लोग अपना व्यायाम करते हुए वीडियो बनाए और दूसरों को प्रेरित करें। हम सब स्वस्थ रहें, इस ध्येय को लेकर ही राज्यवर्धन ने यह मुहिम शुरु की है।

महात्मा गांधी हमेशा अरस्तु के इस कथन से कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है, लोगों को स्वस्थ और स्वच्छ रहने की प्रेरणा देते थे। महात्मा गांधी ने स्वस्थ रहने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और संयम से जीने का मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि स्वस्थ वहीं है जिसे कोई बीमारी न हो। उन्होंने लोगों को ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की प्रेरणा दी। स्वच्छ रहने के साथ ही उन्होंने शरीर को सही रखने के लिए सप्ताह में एक दिन उपवास करने और शाहाकारी बनने के लिए लोगों को मंत्र दिया। गांधीजी कहते थे कि दिन में इतना परिश्रम करें कि रात को लेटते ही नींद आ जाए। ओलंपिक में रजत पदक हासिल करने वाले राज्यवर्धन ने स्वस्थ रहने के लिए लोगों को हम फिट तो इंडिया फिट मुहिम चलाई है। अपनी मुहिम के लिए उन्होंने विराट कोहली, रितिक रोशन और सायना नेहवाल को चैलेंज दिया था। उनके चैलेंज को स्वीकार करते हुए विराट कोहली ने कसरत की और मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए महेंद्र सिंह धोनी, अपनी पत्नी और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज दिया। विराट ने लिखा भी कि ”मैं राठौर सर का दिया फिटनेस चैलेंज स्वीकार करता हूं। अब मैं ये चैलेंज अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा, हमारे पीएम नरेंद्र मोदी और धोनी भाई को देता हूं। विराट कोहली की इस पहल पर सबसे पहले पीएम मोदी का ट्वीट आया और उन्होंने लिखा कि विराट का चैलेंज स्वीकार कर लिया है। प्रधानमंत्री ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है कि विराट का चैलेंज स्वीकार है। मैं जल्द ही वीडियो के जरिए अपना फिटनेस चैलेंज शेयर करूंगा।

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह चैलेंज स्वीकार करना नहीं भा रहा है। राहुल गांधी ने फिटनेस मंत्र पर राजनीति शुरु कर दी है। अपने को महात्मा गांधी का अनुयायी बताने वाले कांग्रेस के नेता राज्यवर्धन की लोगों को स्वस्थ रखने की मुहिम से पता नहीं क्यों इतने परेशान हो गए हैं ? राहुल गांधी ने हम फिट तो इंडिया फिट’ चैलेंज अब राजनीतिक चैलेंज में तब्दील कर दिया। राहुल गांधी ने कहा कि “मुझे यह देखकर खुशी हुई कि आपने विराट कोहली का चैलेंज मंजूर किया। एक चैलेंज मेरी तरफ से भी। पेट्रोल-डीजल के दाम घटाएं, नहीं तो फिर कांग्रेस देशभर में आंदोलन करेगी और आपको ऐसा करने के लिए मजबूर करेगी, आपके जवाब का इंतजार रहेगा। राहुल गांधी को राजनीति करने के लिए केवल आलोचना ही करनी है। होना तो यह चाहिए था कि देश के लोगों को जागरूक करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को प्रधानमंत्री की पहल का स्वागत करना चाहिए। महात्मा गांधी जानते थे कि गांवों में रहने वाले गरीब लोग रोजी-रोटी के लिए दिन-रात परिश्रम करते हैं और उन्हें अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रहता है। इसीलिए उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा पर जोर दिया। लोगों को संयमित जीवन का मंत्र दिया।

हमारे देश में स्वस्थ रहने के लिए जागरुकता बढ़ी है। हर शहर में सुबह-शाम पार्कों में सैर करने वालों की संख्या बढ़ी है। लोगों की योग और ध्यान में लगातार दिलचस्पी बढ़ी है। दफ्तरों में भी फिट रहने के लिए जिम बनाए गए हैं। भागदौड़ की जिंदगी में लोग स्वस्थ रहे इसके लिए बार-बार जागरूकता बढ़ाई जा रही है। हम देख रहे हैं कि भागदौड़ की जिंदगी में युवा बीमार हो रहे हैं। युवाओं में मधुमेह और दिल की बीमारी बढ़ी है। हाल ही में 13 साल के एक बच्चे की मधुमेह से मौत हो गई। ऐसे हालातों में स्वस्थ रहने के लिए अगर खेल मंत्री स्वस्थ रहने का मंत्र दे रहे हैं तो इसमें आलोचना की करने का क्या बात है? राहुल की देखादेखी राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव भी राजनीति करने लगे। युवा नेताओं का तमगा लगाने वाले इन नेताओं को कम से कम सेहत के मुद्दे पर तो राजनीति नहीं करना चाहिए। लगता तो यही है कि गांधीजी के नाम पर राजनीति करने वाले कांग्रेस के नेता उनके स्वस्थ रहने के मूलमंत्र को भूल गए। राहुल गांधी आप भी रोजाना व्यायाम करें ताकि स्वस्थ शरीर के साथ आपका मस्तिष्क भी स्वस्थ रहे। देश की सेहत के लिए यह बहुत जरूरी है।

लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक विषयों पर बेबाक राय के लिए जाने जाते हैं।