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बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर लगे रोक, भारत की सभ्यता, कला और संस्कृति से समृद्ध भारतीय फिल्म उद्योग को किसी नकलची जैसे नाम की जरूरत नहीं ..

बॉलीवुड जैसे शब्दों के प्रयोग पर रोक लगे

भारतीय फिल्मों की आज दुनियाभर में धूम मची हुई है। बाहुबलि दो और दंगल ने कमाई के मामले रिकार्ड तोड़ दिए। दंगल ने 1600 करोड़ से ज्यादा तो बाहुबलि दो ने लगभग २ हजार करोड़ का कारोबार किया । भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) के अनुसार भारतीय फिल्म उद्योग का कारोबार 165 अरब से ज्यादा का हो गया है। दो दर्जन से ज्यादा भाषाओं और बोलियों में भारत में फिल्में बनती हैं। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार द्वारा भारतीय सिनेमा जगत को उद्योग का दर्जा देने के बाद बहुत बदलाव आया है। भारतीय सिनेमा को संगठित माफिया से मुक्ति मिली है। अपराधियों के निवेश करने पर रोक लगी है। भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय भाषाओं में बन रही फिल्में नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। नई-नई तकनीक, कहानी और लोगों के बीच पहुंच बनाने के कारण फिल्में लोकप्रिय हो रही हैं।

कारोबार के नए कीर्तिमान स्थापित करने के बावजूद भारतीय सिनेमा पर विदेशी फिल्में और खासतौर पर हॉलीवुड की नकल करने के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में भारतीय सिनेमा की जानी-मानी हस्ती सुभाष घई ने एक मुलाकात में बताया कि मुंबई के सिनेमा जगत को बॉलीवुड कहने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीबीसी ने एक बार मुंबइयां फिल्मों को हॉलीवुड की नकल बताते हुए बॉलीवुड बताया था। मुंबई के फिल्म जगत ने बीबीसी के मजाक को अपनाते हुए मुंबई फिल्म जगत को बॉलीवुड कहना शुरु कर दिया। मीडिया ने इसे तेजी से बढ़ाया। हैरानी की बात है कि दादा साहब फाल्के, वी शांताराम, सत्यजीत रे, राजकपूर से लेकर नए-नए फिल्मकार दुनिया में भारतीय सिनेमा की एक अलग पहचान बनाने मे कामयाब हुए हैं और वहीं हम गुलामी के प्रतीक और नकलची होने का तमगा लगाए बॉलीवुड शब्द को ढोने पर खुश हो रहे हैं। मुंबई फिल्मजगत की नकल करते हुए तेलुगू फिल्म जगत को टॉलीवुड, तमिल फिल्म इंडस्ट्री कॉलीवुड, मलयाली फिल्मी दुनिया को मॉलीवुड, कन्नड़ फिल्म उद्योग को सैंडलवुड और पंजाबी फिल्म जगत को पॉलीवुड कहा जा रहा है। इस सबसे यही साबित हो रहा है कि भारतीय फिल्में हॉलीवुड की नकलची है।

दुनियाभर में भारतीय फिल्मों की साख बढ़ रही है और हम खुद गुलाम मानसिकता के कारण अपने को नकलची साबित कर रहे हैं। बड़े बजट की फिल्मों की तुलना अगर हम छोटे बजट की फिल्मों के साथ करें तो स्थिति बहुत अच्छी है। छोटे बजट की फिल्में भी अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। भारतीय फिल्मों की पुरानी कहानियों को छोड़ कर छोटे बजट की नई-ऩई फिल्मों ने बेहतर प्रदर्शन नए-ऩए कलाकारों को आगे बढ़ने का मौका दिया है। ऐसे में हमें अपनी मौलिकता को बढावा देने के लिए बॉलीवुड, टॉलीवडु, क़ॉलीवुड, मॉलीवुड से जैसे गुलामी के प्रतीक शब्दों से निजात पाना होगा। हम ऐसे शब्द प्रयोग करें, जिससे भारत की सभी भाषाओं और बोलियों की फिल्मों को प्रतिष्ठा मिले।

बॉलीवुड शब्द से फिल्मी जगत की जानी-मानी हस्तियां खुश है ऐसा भी नहीं है। अमिताभ बच्चन, कमल हासन जैसे बड़े कलाकार पहले ही बॉलीवुड शब्द को लेकर खुश नहीं है। अमिताभ बच्चन तो कई बार इस शब्द को लेकर नाखुशी जता चुके हैं। कमल हासन भी बॉलीवुड शब्द से बहुत चिढ़ते हैं। मुलाकात में सुभाष घई ने भी बॉलीवुड शब्द को लेकर अपनी नाराजगी जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दी फिल्म जगत के अलावा अन्य फिल्मों के लोग भी बॉलीवुड जैसे तमगे को बदलकर भारतीय फिल्म जगत जैसा शब्द चाहते हैं। अब समय आ गया है कि गुलाम मानसिकता के प्रतीक बॉलीवुड के प्रयोग को पूरी तरह बंद कर दें। इस कार्य में फिल्म उद्योग के लोगों की बड़ी भूमिका होगी। उन्हें तुंरत इस शब्द का प्रयोग बंद करके भारतीय फिल्में, हिन्दी फिल्में, मराठी फिल्में, बंगाली फिल्में, तमिल, तेलुगू, मलायम, कन्नड की फिल्में, भोजपुरी, पंजाबी, गुजराती, असमी, ओडिसी आदि फिल्में कहना शुरु करेंगे तो हमारी भाषाओं और बोलियों को दुनियाभर में ज्यादा मान-सम्मान मिलेगा। गुलाम मानसिकता से निकलने के लिए मीडिया के लोगों को भी आगे आना होगा। मीडिया ने भी हॉलीवुड की तर्ज पर बनने वाली फिल्मों के मजाक उड़ाने के सिलसिले को बॉलीवुड जैसे शब्दों के इस्तेमाल को बढ़ाया है । फिल्म उद्योग से जुड़े सभी लोगों को भारतीय फिल्मों की अस्मिता को बचाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ होकर इस दिशा में कार्य करना होगा।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जिस तरह 1998 में भारतीय सिनेमा को उद्योग का दर्जा देकर कई नई दिशा दी, उसी तरह अब भारतीय सिनेमा को हॉलीवुड की नकलची होने के आरोप से निकालने के लिए इस तरह के शब्दों पर रोक लगाने की शुरुआत करनी होगी। हम सब जानते हैं कि संगठित अपराधियों के चंगुल में फंसे भारतीय सिनेमा को उबारने के लिए राजग सरकार ने उद्योग का दर्जा दिया है। उद्योग का दर्जा मिलने के बाद फिल्मों के निर्माण में बैंकों से पैसा मिलने लगा तो गैरकानूनी धंधे में लगे लोगों का निवेश कम होता गया। फिल्म जगत माफिया सरगनाओं से भी मुक्ति मिली है। अब यही सही समय है कि फिल्म उद्योग को गुलामी के प्रतीक को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होकर हॉलीवुड की नकलची होने के तमगे से बचाना होगा।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं और सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते हैं।)

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया। कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी। कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कर्नाटक में शपथ ग्रहण पर नहीं लगी रोक

भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री की शपथ ले ली है। देर रात सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ी है। जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ा है। इस मामले में देर रात याचिका स्वीकार करना, सुबह तक सुनवाई करना और फैसला देना, वाकई एक ऐतिहासिक क्षण है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरा मौका है जब आधी रात को अदालती कार्यवाही चली। इससे पहले 29 जुलाई 2015 को पहली बार आधी रात को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर और बाद में राष्ट्रपति से याकूब मेनन की याचिका खारिज होने के बाद फांसी से ठीक पहले आधी रात को प्रशांत भूषण समेत 12 वकील सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के घर पहुंचे थे। उन्होंने याकूब मेमन की फांस पर रोक लगाने की मांग की। उनकी इस मांग पर तत्कालीन चीफ जस्टिस एच एल दत्तू ने वर्तमान मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच गठित की। देर रात को ही जज सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और मामले की सुनवाई शुरू हुई। तीन जजों की इस बेंच ने याकूब की फांसी की सजा को बरकरार रखा था। कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर ही रात में अर्जी डाली गई, बेंच बनी, कार्यवाही हुई और फैसला दिया गया।

कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला के बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने सुप्रीम कोर्ट में रात 11.35 बजे अर्जी लगाई थी। कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की दो अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार देर रात मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के आवास पर पहुंचे। कुछ देर बाद सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिकारी भी उनके आवास पर पहुंच गए। मुख्य न्यायाधीश ने रात पौने दो बजे सुनवाई करने का फैसला किया और जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस अर्जन कुमार सीकरी और जस्टिस शरद अरविंद बोबडे को इस मामले की सुनवाई सौंपी। रात 1.55 बजे सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सुनवाई शुरु की। न्यायाधीशों ने कांग्रेस और जेडीएस के तर्क सुनने के बाद येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को माना है कि विश्वास मत साबित करने के लिए दिए गए 15 दिन के समय पर सुनवाई हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण का समय बढ़ाने से भी इंकार कर दिया। अभी कांग्रेस और जेडीएस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। सत्ताच्युत कांग्रेस बौखलाहट में देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़ा कर रही है। कभी चुनाव आयोग पर हमला करती है तो कभी जांच एजेंसियों पर सवाल उठाती है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने के प्रस्ताव से उन्होंने न्याय पालिका की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सत्ता से बेदखल होती जा रही कांग्रेस देश के राजनीतिक परिद्श्य से भी सिमटती जा रही है। अब कांग्रेस की सरकारें केवल पंजाब, पुद्दुचेरी और मिजोरम में बची हैं। भाजपा और सहयोगी दलों की 21 राज्यों में सरकारें हैं। इस समय भाजपा के विधायकों की संख्या 1518 है। कांग्रेस के मौजूदा विधायक 727 हैं। 1989 में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 1877 थी।

कांग्रेस और जेडीएस की येदियुरप्पा को शपथ दिलाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के जज जस्टिस सीकरी और जस्टिस बोबडे उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करने वाली सांविधानिक पीठ में थे। संवैधानिक पीठ गठन करने को लेकर भी कांग्रेस ने सवाल उठाये थे। दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज किए जाने के उपराष्ट्रपति के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को कांग्रेस ने वापस ले लिया था। सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस और जेडीएस की याचिका खारिज होने के बाद यह साफ हो गया है कि अब कर्नाटक विधानसभा में बहुमत का फैसला होगा। न्यायालय के फैसले को लेकर तो आलोचना हो सकती है पर किसी फैसले को लेकर न्यायपालिका को निशाना बनाना, किसी भी तरह से उचित नहीं है। कांग्रेस को न्यायपालिका के साथ ही जनता की अदालत के फैसले का भी आदर करना चाहिए।

माननीय नरेंद्र मोदी जी ने बंगाल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को लेकर चिंता प्रकट कर इस ओर सभी को एकजुट हो विचार करने पर ध्यान आकर्षित किया है।

पश्चिम बंगाल- लोकतंत्र के सीने में घाव ,चिंतनीय।PM नरेंद्र मोदी

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा, आगजनी, बमधमाके, लूटमार, सरकारी तंत्र की मनमानी आदि को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव के मतदान के दिन ही 19 लोगों की मौत हुई। उसके अगले दिन हुई हिंसा में पांच और लोग मारे गए। मतदान के दिन ऐसा कोई इलाका नहीं था जहां हिंसा न हुई हो। खूनी चुनावों को लेकर प्रधानमंत्री ने यह अपील भी की है कि लोकतंत्र के सीने पर घाव देने वाले विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा। उन्होंने नामांकन से लेकर मतदान तक की प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई और कहा कि पंचायत चुनाव में लोकतंत्र की हत्या की गई है। बंगाल की पिछली शताब्दी को देखें जिसने  देश को मार्गदर्शन देने का काम किया है। ऐसी महान भूमि को राजनीतिक स्वार्थ के लिए लहुलूहान कर दिया गया। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल की जनता का दुख सबके सामने रखा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी, मनमानी और विपक्षी दलों पर अत्याचारों को लेकर सभी राजनीतिक दल आक्रोश जता रहे हैं। रोजाना जगह-जगह विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं। मतदान के बाद भी भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता, प्रशासन और पुलिस हत्या, आगजनी, बम धमाके आदि की घटनाओं को मामूली बता रहे हैं।

दुनियाभर में भारत के लोकतंत्र के उदाहरण दिए जाते हैं, लेकिन यहां हाल ही में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव में धनबल के बढ़ते इस्तेमाल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद की गई। साथ ही 24.43 लाख रुपये की 5 लाख 26 हजार 766 लीटर शराब जब्त की गई है। इसके अलावा व्हिस्की की 8640 बोतलें भी जब्त की गई हैं। चुनाव आयोग के अनुसार चार करोड़ से ज्यादा का सोना भी पकड़ा गया।14 करोड़ 91 लाख 62 हजार 715 रुपये कीमत के अन्य सामान भी बरामद किए गए हैं। 219 वाहनों को जब्त भी किया गया है। कर्नाटक के राजराजेश्वरी नगर विधानसभा क्षेत्र के एक फ्लैट से दस हजार मतदाता पहचान पत्र बरामद होने के बाद चुनाव आयोग ने इस सीट पर मतदान स्थगित कर दिया है। अब इस सीट पर 28 मई को मतदान होगा। आयोग की ओर से जारी आदेश में कहा गया है इस सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिये तमाम वस्तुयें बांटने और भारी मात्रा में फर्जी मतदाता पहचान पत्रों की बरामदगी जैसी अन्य घटनाओं की शिकायतें शुरुआती जांच में ठीक पाये जाने के बाद यह फैसला किया है। राजनीतिक दलों के बीच कुर्सी कब्जाने की होड़ के कारण चुनाव में धन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस विधानसभा चुनाव में पिछले चुनाव के मुकाबले दोगुना खर्च हुआ है। जाहिर है चुनाव आयोग की सख्ती से सवा सौ करोड़ की नगदी बरामद होने के बावजूद चुनाव में धन का इस्तेमाल हुआ।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि कोई चुनाव जीते, कोई हारे लेकिन ‘लोकतंत्र के सीने पर घाव उभारने के विषय पर सभी राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और न्यायपालिका को ध्यान देना होगा, सभी को सोचने पर मजबूर करता है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में 34 फीसदी सीटों पर विरोधी दलों के उम्मीदवारों को नामांकन ही नहीं करने दिया गया। नामांकन न करने देने और अन्य शिकायतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अपील की गई। हाई कोर्ट को पश्चिम बंगाल के चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि निष्पक्षता नहीं बरती जा रही है। मतदान के दौरान हिंसा रोकने के निर्देश देने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने पूरे इंतजाम नहीं किए। यह सब बूथों पर जबरन कब्जा करने के लिए किया गया। बूथों पर कब्जे के दौरान तमाम स्थानों पर पुलिस वाले मूकदर्शक बने रहे।

मतदान के दिन विरोधी दलों के कार्यकर्ताओं को जिंदा जला दिया गया। कुछ स्थानों पर हिंसा मतदान के दो दिन बाद भी जारी है। तृणमूल कांग्रेस के गुंडों की चेतावनी न मानने वाले लोगों के घरों को जलाया जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वालों को धमकी के कारण दूसरे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी है। बड़ी संख्या में लोग अपने-अपने घरों में लौटने से डर रहे है। भाजपा के अलावा माकपा के प्रमुख नेताओं ने भी तृणमूल कांग्रेस की गुंडागर्दी का विरोध किया है। पश्चिम बंगाल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी सरकार की तानाशाही का विरोध कर रहे हैं पर बड़े नेता चुप क्यों हैं?

अब समय आ गया है कि रक्तरंजित चुनावों को लेकर सभी को सोचना है। क्या कोई शासक दल कुर्सी कब्जाने के लिए निर्दोष लोगों की जान लेता रहेगा ? तृणमूल कांग्रेस का समर्थन न करने वाले लोगों को घऱों में रहना दूभर हो गया है। उनके कारोबार को बंद कराया जा रहा है। घरों को जलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में लहूलुहान लोकतंत्र की तरफ देश का ध्यान आकर्षित किया है। प्रधानमंत्री की चिंता को लेकर अब समाज के सभी वर्गों को इस मुद्दे पर सोचना होगा।