यह कैसी रोक – दिवाली पर शोक

Why Bans On Hindu Festivals?

दीपावली की रात धूम-धड़ाका न हो। गलियों में उत्साह से भरे बच्चे बम-पटाखे छोड़ते हुए शोर न मचाए।
आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी का नजारा न हो। कैसा लगेगा?

ऐसा नजारा दिवाली पर शोक में डूबे परिवारों में ही होता है। भारत की सुप्रीम कोर्ट ने प्रूदषण रोकने के लिए दिल्ली और एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर ही रोक लगा दी।

अदालतें हिन्दुओं के पर्व-त्यौहार, परंपराओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में क्यों दखल देती हैं?
होली और दिवाली हमारे दो ऐसे पर्व हैं, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत का उल्लास बताते हैं।

होली मस्ती का त्यौहार है, तो दिवाली धूम-धड़ाके का।

दोनों ही पर्व खुशी, प्यार और एक-दूसरे का ध्यान रखने का संदेश देते हैं। होली हो घर में कपड़े पहनकर बैठे रहिए।
कोई रंग-गुलाल न लगाए तो कैसे माहौल होगा। पर्यावरण के नाम पर या पानी बचाने के नाम पर होली न खेलों।
रंग न लगाओं, गुलाल न लगाओ।
ब्रज में होली में कितना रंग-गुलाल उड़ता है, टेसू के फूलों से बने रंगों से होली न खेलें तो कैसा लगेगा।
राधा और कान्हा की होली के गीत गाएँ तो, पर रंग-गुलाल न उड़े तो होली का उल्लास पैदा होगा?

दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर लगी रोक से दिल्ली की प्रदूषित वायु एकदम स्वच्छ हो जाएगी।
दिल्ली वाले पटाखे इंदौर से खरीद कर ले जा सकते हैं और फोड़ भी सकते हैं। आखिरकार अदालतें हो या सरकारें, हिन्दुओं के त्यौहारों पर ही दखल क्यों देती हैं? जन्माष्टमी पर दही-हांडी का मामला हो तो भी अदालत डंडा चला देती है। गोविंदाओं की उम्र तय करती है।

तमिलनाडु के जलीकट्टू मनाने का मामला हो तो भी अदालत आड़े आ जाती है।

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर रोक लगा देती है तो साथ ही विजयदशमी पर शस्त्र पूजन और बाहर लेकर चलने पर प्रतिबंध लगा देती हैं।

श्रीराम की शोभायात्रा हो भगवान के हाथ में धनुष-बाण और हनुमान के हाथ में गदा की जगह छड़ी हो तो कैसा लगेगा।

ऐसे फैसलों से भारतीय पर्वों को मनाने की परंपराओं को समाप्त करने की कोशिश हो रही है।

पिछले साल 11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित कर दी थी।
इस वर्ष 12 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपने उक्त आदेश को अस्थायी तौर पर वापस लेते हुए पटाखों की बिक्री की कुछ शर्तों के साथ इजाजत दे दी थी।

पटाखों की बिक्री पर रोक के लिए फिर अदालत में चुनौती दी गई। वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर तक पहुंचने के आधार पर पटाखों की बिक्री रोक दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि दिवाली के बाद इस बात की भी जांच की जाएगी कि पटाखों पर रोक के बाद हवा में कुछ सुधार हुआ है या नहीं।

अदालत ने कहा है कि 1 नवंबर के बाद पटाखों की बिक्री फिर से शुरू की जा सकती है।
पटाखा विक्रेताओं को दिए नए और पुराने दोनों ही लाइसेंस रद्द कर दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली में पटाखों की बिक्री के लिए पुलिस की निगरानी में लाइसेंस दिए जाएं।
ज्यादा से ज्यादा 500 अस्थाई लाइसेंस ही दिए जा सकेंगे। दिवाली से पहले दिल्ली-एनसीआर में आतिशबाजी की दुकानें सज गई। दुकानदारों ने करोड़ों रुपयों का माल दुकानों में भर लिया और अदालत ने रोक लगा दी। अब दिवाली के बाद पटाखें कौन खरीदेगा। पटाखा कारोबारियों के तो बर्बाद होने की नौबत हो गई। दिवाली से पहले ही उनका दिवाला निकल गया।

अगस्त में पूरे देश में बड़े जोश-खरोश से बकर-ईद मनाई गई। हम सबने मुबारकबाद दी।

पर्यावरण का झंडा उठाने वालों ने लाखों बकरें कटने का सवाल उठाया क्या।

गायें कटने से रोके तो बहुत से लोगों को तकलीफ होती है।
खान-पान पर रोक नहीं लगाई जा सकती है तो हमारे पर्वों पर क्यों रोक लगाई जाती है।

पर्यावरण की चिंता करनी है तो पूरे साल करो।
पौधे लगाओ, पेड़ों को बचाओं, पानी की बर्बादी पूरे साल रोको।
खास दिन ही पानी की चिंता होती है क्यों बताओ?

खास दिन ही पर्यावरण की चिंता होती क्यों, खास दिन ही जलीकट्टू पर जानवरों को बचाने का ख्याल क्यों होता है।

पिछले साल राजस्थान सरकार ने ऊंटों को बचाने के लिए रोक लगाई तो कितना हल्ला मचा था।

केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने जानवरों की बिक्री के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए तो क्यों हल्ला मचाया गया था।
इस साल बकरीद पर उत्तर प्रदेश में ऊंटों के काटने पर रोक लगाई तो एक समुदाय ने जमकर विरोध किया। उत्तर प्रदेश में अवैध बूचड़खाने बन्द किए गए तो कितना तमाशा किया गया।

जैन पर्व के दौरान मांस की बिक्री पर रोक लगाई जाती है तो कितना विरोध होता है।

पर्यावरण को लेकर कल यज्ञ-हवन करने पर भी रोक लगाई जा सकती है। हवन में भी लकड़ी जलती है और धुआं निकलता है। बारी तो अब हिन्दुओं के अंतिम संस्कार पर भी रोक लगाने की आ सकती है। मिट्टी का शरीर मिट्टी में ही मिलना है तो फिर कब्रिस्तान बढ़ाने की क्या जरूरत है। कब्रिस्तान की बढ़ती जरूरतों के कारण सरकारी जमीनों पर कब्जे किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में तो सरकारी जमीनों पर कब्जा कराने के लिए अखिलेश की समाजवादी सरकार ने जमकर पैसा लुटाया।

पर्यावरण के नाम पर हिन्दुओं की चिता जलाने पर भी रोक लगाई जा सकती है। पर्यावरण की चिंता सभी को करनी है। केवल एक दिन पर्यावरण बचाने के नाम पर त्यौहारों पर पाबंदी न हो।

हिन्दू तो पर्यावरण के सबसे बड़े पुजारी हैं। गाय को माता मानते हैं, नदियों की पूजा करते हैं, पेड़-पौधों की पूजा करते हैं। कुछ पेड़ों को तो काटना भी पाप माना जाता है। जानवरों की बलि का विरोध हिन्दू ही करते हैं।

ऐसे में अमावस्या की रात को पटाखों पर लगी पाबंदी ने काली रात ही बना दी है। दिवाली धूम-धड़ाके का, खुशियां बांटने का, एक-दूसरे का ध्यान रखने का और अमावस्या की रात को उजियारा बनाने का त्यौहार है।

अदालत हो या सरकारें, जनमानस की भावनाओं को ध्यान में रखने की जरूरत है।
जहां तक सरकारों का सवाल है, आतिशबाजी बनाने या बेचने का लाइसेंस देन का काम उनका का ही है।

कितने धमाके वाले, कितनी देर चलने वाले, कितनी रोशनी देने वाले पटाखे बने या बेचे जाएं, उस पर नियम बनाएं, न कि रोक लगाने की प्रवृति को बढ़ाया जाए। त्यौहार भी अपनी मर्जी का है, जिसे पटाखे चलाने हो चलाए, न चलाने हो तो घर का दरवाजा बंद करके बैठे जाएं।

बच्चों के उल्लास पर रोक न लगाएं, यही एक दिन होता गली में एक साथ मिलजुलकर धूम-धड़ाका करने का।

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